8 दिसंबर 2025 को मध्य प्रदेश के इंदौर शहर से एक चौंकाने वाली खबर सामने आई। एक 62 वर्षीय बुजुर्ग क्लर्क डिजिटल ठगी का शिकार बन गए। ठगों ने उन्हें फर्जी पुलिस और सीबीआई अधिकारी बनकर 11 दिन तक लगातार डराया और धमकाया। इस दौरान उन्होंने बुजुर्ग से उनके बैंक खाते, एफडी, म्यूचुअल फंड और यहां तक कि घर में रखे सोने की जानकारी तक हासिल कर ली। परिणामस्वरूप, बुजुर्ग ने अलग-अलग बैंक खातों में कुल 27 लाख 60 हजार रुपये ट्रांसफर कर दिए।

यह मामला केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं था। ठगों ने बुजुर्ग को मानसिक रूप से भी परेशान किया और धमकाया कि अगर उन्होंने किसी को घटना के बारे में बताया तो उनकी जान को खतरा होगा। इस तरह की डिजिटल ठगी ने एक बार फिर से तकनीकी माध्यमों पर आधारित अपराधों की गंभीरता को उजागर कर दिया।
पहली कॉल: टेलीकॉम विभाग का नाम लेकर डराया गया
एडिशनल डीसीपी राजेश दंडोतिया ने बताया कि 20 नवंबर 2025 को शाम 6 बजे बुजुर्ग क्लर्क के मोबाइल पर कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को टेलीकॉम विभाग का अधिकारी बताया और कहा कि उनके नाम से दूसरी सिम जारी हुई है, जिसका दुरुपयोग हो रहा है।
बुजुर्ग ने इनकार किया तो आरोपी ने धमकी दी कि उन्हें मुंबई के कोलाबा पुलिस स्टेशन में एफआईआर करवानी होगी। यदि वे स्वयं मुंबई नहीं जा सकते, तो आरोपी ने अपने नंबर पर बात करने का सुझाव दिया।
इस बातचीत ने बुजुर्ग में डर पैदा कर दिया और इसी डर का फायदा उठाकर ठगों ने उनकी व्यक्तिगत और वित्तीय जानकारी हासिल करना शुरू किया।
वाट्सएप कॉल और डराने का खेल
फोन कॉल के तुरंत बाद, आरोपी ने वाट्सएप के माध्यम से बुजुर्ग से संपर्क किया। उन्होंने बुजुर्ग का आधार नंबर बताकर दावा किया कि उसी आधार नंबर से सिम इश्यू कराई गई है और बैंक में खाता खोला गया है, जिसमें अवैध रूप से पैसा जमा किया गया है।
बुजुर्ग ने साफ-साफ कहा कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया है। लेकिन आरोपी ने धमकाया कि ऑनलाइन जांच होगी और अगर बुजुर्ग सहयोग नहीं करेंगे, तो गिरफ्तारी होगी। साथ ही धमकी दी गई कि परिवार को कुछ पता चला तो उनकी जान को खतरा होगा। इस तरह, बुजुर्ग लगातार मानसिक दबाव में रहे और ठगों के निर्देशों के अनुसार कार्य करने लगे।
सीबीआई अधिकारी का बहाना और बैंक लेनदेन
21 नवंबर 2025 को आरोपी ने खुद को सीबीआई अधिकारी आनंद कुमार बताकर बुजुर्ग से बातचीत की। उन्होंने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग के केस की जांच चल रही है और बुजुर्ग को बैंक खातों, चल-अचल संपत्ति और निवेश की पूरी जानकारी देनी होगी।
इसके बाद ठगों ने बुजुर्ग को बैंक में एफडी और म्यूचुअल फंड की राशि जमा कराने का निर्देश दिया। 21 नवंबर को बुजुर्ग ने पंजाब नेशनल बैंक में 1 लाख रुपये की एफडी तोड़ी और जमा कराई। इसके बाद 25 नवंबर को म्यूचुअल फंड की 13 लाख रुपये की राशि यूनियन बैंक के खाते में जमा कराई।
27 नवंबर को बंधन बैंक खाते में आरटीजीएस के माध्यम से 12 लाख 90 हजार रुपये जमा कराए। ठगों ने घर में रखे सोने की जानकारी भी 28 नवंबर को मोबाइल नंबर के जरिए हासिल की।
गोल्ड लोन करवाने की चाल
अवैध धन हड़पने के लिए आरोपियों ने बुजुर्ग को गोल्ड लोन लेने के लिए मजबूर किया। बुजुर्ग ने अपने पुश्तैनी गहनों पर 12 लाख 60 हजार का लोन लिया और उसी दिन आरोपियों द्वारा बताए गए बैंक खाते में 13 लाख 50 हजार रुपये जमा कर दिए।
इस प्रकार, बुजुर्ग की मेहनत की कमाई और संपत्ति का बड़ा हिस्सा ठगों के हाथों चला गया।
11 दिन बाद हुआ अहसास और पुलिस कार्रवाई
बुजुर्ग ने अलग-अलग खातों में कुल 27 लाख 60 हजार रुपये ट्रांसफर करने के बाद ही ठगी का अहसास किया। उन्होंने ठगों को वापस कॉल किया, लेकिन कोई भी फोन नहीं उठा रहा था। इसके बाद उन्होंने क्राइम ब्रांच को सूचना दी।
पुलिस ने तुरंत जांच शुरू की और देर रात केस दर्ज किया। एडिशनल डीसीपी राजेश दंडोतिया ने बताया कि तकनीकी जांच में पता चला कि आरोपी लाओस, कंबोडिया, म्यांमार, हांगकांग और चीन से अपराध कर रहे थे। उन्होंने डिजिटल अरेस्ट के नाम पर व्यवस्थित तरीके से बुजुर्गों को निशाना बनाया।
डिजिटल अरेस्ट: भ्रम और वास्तविकता
डीसीपी ने जनता से स्पष्ट किया कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी कोई चीज़ नहीं होती। पुलिस कभी किसी नागरिक को डिजिटल अरेस्ट के नाम पर गिरफ्तार नहीं करती। यह ठगी का नया और खतरनाक तरीका है, जिसमें तकनीकी साधनों और धमकियों का इस्तेमाल कर लोगों को आर्थिक और मानसिक रूप से कमजोर किया जाता है।
सामाजिक और कानूनी संदेश
यह घटना हमें डिजिटल दुनिया में सतर्क रहने की चेतावनी देती है। फर्जी कॉल, वाट्सएप या ईमेल के माध्यम से किसी भी व्यक्ति से व्यक्तिगत या वित्तीय जानकारी साझा करना बेहद जोखिम भरा है। बैंक और सरकार की कोई भी प्रक्रिया कभी भी फोन या वाट्सएप के माध्यम से पूरी नहीं होती।
यह मामला यह भी दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बैठकर अपराध संगठित रूप से किया जा सकता है। इसलिए डिजिटल सुरक्षा, पासवर्ड सुरक्षा, और किसी भी संदिग्ध कॉल से सावधान रहना आवश्यक है।
निष्कर्ष
इंदौर में यह मामला डिजिटल ठगी और साइबर अपराध की गंभीरता को उजागर करता है। बुजुर्ग क्लर्क की मेहनत की कमाई, एफडी, म्यूचुअल फंड और सोने की संपत्ति ठगों के हाथों चली गई। यह घटना यह भी साबित करती है कि तकनीकी माध्यमों का गलत इस्तेमाल कर लोगों को मानसिक और आर्थिक रूप से कमजोर किया जा सकता है।
सुरक्षा और जागरूकता ही ऐसे मामलों से बचाव का एकमात्र रास्ता है।
