डिजिटल युग में जहां तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, वहीं साइबर अपराधियों के लिए भी नए रास्ते खोल दिए हैं। अब ठगी सिर्फ फर्जी कॉल या ईमेल तक सीमित नहीं रही, बल्कि कानून और डर का सहारा लेकर लोगों को मानसिक रूप से तोड़ने की खतरनाक रणनीति अपनाई जा रही है। मध्य प्रदेश के इंदौर से सामने आया यह मामला इसी बढ़ते साइबर खतरे की भयावह तस्वीर पेश करता है, जहां एक रिटायर्ड बैंक अधिकारी को मनी लॉन्ड्रिंग केस में गिरफ्तारी का डर दिखाकर न केवल डिजिटल अरेस्ट किया गया, बल्कि उनसे लाखों रुपये भी ठग लिए गए।

यह घटना इंदौर शहर की है, जहां स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के सेवानिवृत्त डिप्टी मैनेजर को साइबर अपराधियों ने अपना निशाना बनाया। वर्षों तक बैंकिंग सिस्टम को संभालने वाला यह अधिकारी खुद साइबर ठगी के जाल में फंस गया। अपराधियों ने खुद को पुलिस, सीबीआई और अन्य जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर इतना डर पैदा किया कि पीड़ित लगातार पांच दिनों तक वीडियो कॉल पर पूछताछ झेलता रहा।
ठगी की शुरुआत एक अनजान कॉल से हुई
यह पूरा मामला उस समय शुरू हुआ, जब पीड़ित के मोबाइल फोन पर एक अनजान नंबर से कॉल आया। कॉल करने वाले व्यक्ति ने बेहद आत्मविश्वास के साथ बात की और खुद को एक जांच एजेंसी से जुड़ा अधिकारी बताया। शुरुआती बातचीत में ही उसने जेट एयरवेज से जुड़े एक बड़े आर्थिक घोटाले का जिक्र किया और फिर धीरे-धीरे पीड़ित को इस मामले में फंसाने की पटकथा लिखनी शुरू कर दी।
कुछ ही देर बाद पीड़ित के व्हाट्सएप पर जेट एयरवेज के पूर्व चेयरमैन की तस्वीरें भेजी गईं। इन तस्वीरों के जरिए ठगों ने यह दिखाने की कोशिश की कि मामला किसी बड़े और हाई-प्रोफाइल घोटाले से जुड़ा है। इसके बाद वीडियो कॉल पर बातचीत शुरू हुई, जिससे पीड़ित को यह विश्वास हो गया कि सामने वाला व्यक्ति वास्तव में कोई सरकारी अधिकारी है।
मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप और गिरफ्तारी की धमकी
ठगों ने दावा किया कि जेट एयरवेज केस की जांच के दौरान पीड़ित का नाम सामने आया है। उन्होंने कहा कि पीड़ित ने कथित रूप से 20 करोड़ रुपये की मनी लॉन्ड्रिंग में मदद की है और उसके नाम से मुंबई के एक बैंक में खाता खोला गया है। इतना ही नहीं, यह भी कहा गया कि इस मामले में गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुका है और पुलिस किसी भी वक्त उसे गिरफ्तार करने आ सकती है।
एक रिटायर्ड अधिकारी के लिए यह आरोप बेहद चौंकाने वाला था। वर्षों की ईमानदार सेवा के बाद अचानक खुद को अपराधी बताया जाना किसी भी व्यक्ति को मानसिक रूप से झकझोर सकता है। ठगों ने इसी डर और घबराहट का फायदा उठाया।
डिजिटल अरेस्ट का खेल
साइबर अपराधियों ने पीड़ित को बताया कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक वह किसी से संपर्क नहीं कर सकता। उसे परिवार के सदस्यों से बात करने से भी मना कर दिया गया। यह स्थिति किसी डिजिटल अरेस्ट से कम नहीं थी, जहां व्यक्ति शारीरिक रूप से भले ही आजाद हो, लेकिन मानसिक रूप से पूरी तरह बंधक बना लिया गया।
पांच दिनों तक अलग-अलग नंबरों से वीडियो कॉल आती रही। कभी खुद को पुलिस अधिकारी बताया गया, तो कभी सीबीआई या किसी अन्य जांच एजेंसी का अफसर। हर कॉल में वही डर दोहराया जाता कि अगर सहयोग नहीं किया गया तो तुरंत गिरफ्तारी होगी और जेल भेज दिया जाएगा।
खातों के सत्यापन के नाम पर ठगी
लगातार दबाव और डर के बीच पीड़ित को बताया गया कि अगर वह अपने बैंक खातों का सत्यापन करा ले, तो गिरफ्तारी टल सकती है। इसके लिए उससे कहा गया कि वह कुछ रकम बताए गए खाते में ट्रांसफर करे, ताकि यह जांचा जा सके कि उसका पैसा संदिग्ध लेन-देन से जुड़ा है या नहीं।
इसी बहाने पीड़ित से पांच लाख रुपये ट्रांसफर करवा लिए गए। रकम ट्रांसफर होते ही ठगों का हौसला और बढ़ गया। इसके बाद उन्होंने 41 लाख रुपये और ट्रांसफर करने का दबाव बनाना शुरू कर दिया।
बेटे की सतर्कता से बची बड़ी ठगी
डर के मारे पीड़ित रिटायर्ड अधिकारी बैंक से पैसे निकालने पहुंच गया। लेकिन यहां किस्मत ने उसका साथ दिया। बैंक में मौजूद अधिकारियों को इस लेन-देन पर शक हुआ। उन्होंने तुरंत पीड़ित के बेटे को इसकी जानकारी दी।
बेटे ने जब पूरी बात सुनी, तो उसे तुरंत समझ आ गया कि यह साइबर ठगी का मामला है। उसने बिना देर किए बैंक खातों में रखी रकम होल्ड करवाई और अपने पिता को आगे किसी भी तरह का भुगतान करने से रोक दिया।
इसके बाद साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराई गई और संबंधित खातों को फ्रीज कराने की प्रक्रिया शुरू की गई। अगर समय रहते बेटे ने हस्तक्षेप न किया होता, तो पीड़ित 41 लाख रुपये और गंवा सकता था।
मानसिक यातना और बढ़ता साइबर खतरा
यह मामला सिर्फ आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि साइबर अपराधी किस तरह लोगों को मानसिक रूप से तोड़ते हैं। कानून, जांच एजेंसियों और जेल का डर दिखाकर व्यक्ति की सोचने-समझने की क्षमता को खत्म कर दिया जाता है।
खासतौर पर बुजुर्ग और रिटायर्ड लोग ऐसे मामलों में ज्यादा निशाने पर होते हैं, क्योंकि वे कानून का सम्मान करते हैं और सरकारी नाम सुनते ही डर जाते हैं। साइबर अपराधी इसी मनोविज्ञान का फायदा उठाते हैं।
परिवार की भूमिका और सतर्कता की जरूरत
इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि परिवार के सदस्यों के बीच संवाद कितना जरूरी है। अगर पीड़ित शुरू में ही अपने बेटे या किसी करीबी से बात कर लेता, तो शायद पांच लाख रुपये की ठगी भी न होती।
आज के समय में जरूरी है कि लोग यह समझें कि कोई भी जांच एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर पैसे ट्रांसफर करने को नहीं कहती। डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं होती। यह सिर्फ साइबर ठगों का बनाया हुआ जाल है।
यह घटना इंदौर ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक चेतावनी है कि डर के बजाय सतर्कता और जानकारी ही साइबर अपराध से बचने का सबसे बड़ा हथियार है।
