इंदौर शहर के अपराध शाखा ने एक हाई-प्रोफाइल फर्जीवाड़े का पर्दाफाश किया है, जिसमें फर्जी डॉक्टरों ने अपने क्लिनिक और डिग्री की आड़ में एक प्रतिष्ठित फाइनेंस कंपनी से करीब 54 लाख रुपये ठगे। यह मामला न केवल इंदौर, बल्कि पूरे मध्य प्रदेश के लिए चेतावनी का संकेत है कि किस तरह से आधुनिक दस्तावेज़ और डिजिटल सत्यापन के दौर में भी ठग अत्याधुनिक तरीके अपनाकर वित्तीय संस्थाओं को अपने जाल में फंसा सकते हैं।

अपराध शाखा के अनुसार, इस फर्जीवाड़े में शामिल आरोपियों ने खुद को योग्य चिकित्सक के रूप में पेश किया और कई महीनों तक कंपनी को भ्रमित किया। इस फर्जीवाड़े में हरिओम बंसल, भूपेंद्र चौहान और प्रदीप कुमार द्विवेदी प्रमुख आरोपित हैं। कंपनी द्वारा ऋण स्वीकृत करने से पहले इनके दस्तावेज़ों और क्लिनिक का सत्यापन किया गया था, लेकिन सत्यापन की प्रक्रिया में भी कई दस्तावेज़ ऐसे थे जो दिखने में वैध प्रतीत होते थे।
हरिओम बंसल ने सुदामा नगर में अपना क्लिनिक खोला और मरीजों का भ्रम पैदा करने के लिए फोटो खिंचवाए। इसके बाद उसने बजाज फाइनेंस से 12 लाख 97 हजार रुपये का ऋण प्राप्त किया। भूपेंद्र चौहान ने अंजनी नगर में क्लिनिक खोला और 31 लाख रुपये का ऋण लिया। वहीं प्रदीप कुमार द्विवेदी ने तुलसी नगर में अपने क्लिनिक का दिखावा कर 10 लाख 44 हजार रुपये की रकम फाइनेंस कंपनी से ठग ली। आरोपितों ने लोन के लिए किरायेदारी अनुबंध प्रस्तुत किया और बाहर क्लिनिक के बोर्ड भी लगवाए।
पुलिस ने बताया कि लोन स्वीकृति के बाद पुनः सत्यापन करने पर यह फर्जीवाड़ा उजागर हुआ। पुलिस आयुक्त संतोष कुमार सिंह ने जांच बैठाई और तीनों आरोपितों के खिलाफ धोखाधड़ी का केस दर्ज किया। शनिवार को मोबाइल लोकेशन के आधार पर प्रदीप को गिरफ्तार किया गया। उसने खुलासा किया कि वह केवल होटल का मामूली कर्मचारी है और गिरोह का मास्टरमाइंड भूपेंद्र है।
पुलिस ने यह भी बताया कि आरोपितों ने असली डॉक्टरों के नामों और उनके पिता के नाम को एडिट कर फर्जी डिग्री और क्लिनिक दस्तावेज़ तैयार किए। क्लिनिक खोलने के लिए पाश कॉलोनियों में किराये के मकान जुटाए और मरीजों को दिखाने के लिए मेडिकल उपकरण और दवाइयां रखीं। आरोपितों ने प्रिस्क्रिप्शन भी लिखे और मरीजों को देखा, ताकि वास्तविक डॉक्टर जैसा प्रभाव पड़े।
इस मामले ने वित्तीय संस्थाओं के लिए एक बड़ा संदेश दिया है कि डिजिटल और फिजिकल सत्यापन की प्रक्रियाओं में और भी सख्ती की जरूरत है। इसके साथ ही यह भी संकेत मिलता है कि धोखाधड़ी करने वाले व्यक्ति कितने रचनात्मक और योजनाबद्ध तरीके अपनाते हैं। पुलिस अभी भी हरिओम और भूपेंद्र की तलाश कर रही है और यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या बजाज फाइनेंस के कर्मचारी भी इस फर्जीवाड़े में शामिल थे।
एडीसीपी राजेश दंडोतिया ने बताया कि इस फर्जीवाड़े में शामिल आरोपितों ने महीनों तक सावधानीपूर्वक योजना बनाई। उन्होंने मिलते-जुलते नामों वाले डॉक्टरों की जानकारी जुटाई और उनके दस्तावेज़ों का फर्जी निर्माण किया। इसके बाद क्लिनिक खोलने के लिए किराये के मकान और बाहर बोर्ड लगाकर पूरे शहर में अपने चिकित्सक होने का भ्रम फैलाया।
यह मामला इंदौर और मध्य प्रदेश में वित्तीय संस्थाओं और नागरिकों के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। इस फर्जीवाड़े ने न केवल कंपनी के करोड़ों के कारोबार पर सवाल उठाए हैं बल्कि यह भी दिखाया कि किस तरह से सामान्य कर्मचारी भी अत्याधुनिक तकनीकों और फर्जी दस्तावेज़ों के सहारे बड़ी ठगी कर सकते हैं।
इस पूरे मामले की जांच जारी है और पुलिस ने चेतावनी दी है कि फर्जी दस्तावेज़ और क्लिनिक खोलने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। यह मामला समाज में जागरूकता फैलाने के साथ-साथ वित्तीय संस्थाओं के लिए भी एक महत्वपूर्ण सबक है कि वे अपने सत्यापन और जांच प्रक्रियाओं को और मजबूत करें।
