तेजी से बढ़ते शहरीकरण, नई सड़कों, पुलों और फोरलेन हाईवे के विस्तार के बीच अक्सर यह चिंता जताई जाती है कि जंगल लगातार सिमटते जा रहे हैं। कंक्रीट के जंगल प्राकृतिक जंगलों पर हावी होते दिखते हैं। लेकिन इसी बदलते परिदृश्य के बीच इंदौर वन मंडल से आई एक खबर ने वन्यजीव प्रेमियों, पर्यावरणविदों और वन विभाग के अधिकारियों को नई उम्मीद दी है। संकेत साफ हैं कि तमाम दबावों के बावजूद जंगलों में बाघों की मौजूदगी बनी हुई है और यह मौजूदगी पहले से कहीं ज्यादा संगठित और मजबूत दिखाई दे रही है।

18 दिसंबर से प्रस्तावित बाघ गणना से पहले की गई तैयारियों और रिहर्सल के दौरान जो तथ्य सामने आए हैं, वे यह बताते हैं कि इंदौर वन मंडल की चार रेंजों में बाघों की गतिविधियां स्पष्ट रूप से दर्ज की जा रही हैं। यह संकेत केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह उस संतुलन की कहानी कहते हैं जिसे बनाए रखने के लिए वन विभाग लगातार प्रयासरत है।
आधुनिक तकनीक से लैस वन विभाग
बाघों की मौजूदगी और उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए इस बार वन विभाग ने आधुनिक तकनीक का व्यापक इस्तेमाल किया है। इंदौर वन मंडल में लगभग 1500 नाइट विजन कैमरे लगाए गए हैं। ये कैमरे सिर्फ तस्वीरें लेने के लिए नहीं, बल्कि जंगल के भीतर होने वाली हर हलचल को समझने के लिए लगाए गए हैं।
रात के अंधेरे में भी स्पष्ट दृश्य देने वाले ये कैमरे बाघों जैसे शर्मीले और सतर्क जानवरों की गतिविधियों को दर्ज करने में बेहद कारगर साबित हो रहे हैं। कैमरों की मदद से न केवल बाघों की संख्या का अनुमान लगाया जा सकता है, बल्कि यह भी समझा जा सकता है कि वे किन रास्तों से गुजरते हैं, किस क्षेत्र को अपना इलाका मानते हैं और उनके व्यवहार में कोई बदलाव तो नहीं आ रहा।
चार रेंज, चौदह बीट और बाघ के पंजों के निशान
रिहर्सल के दौरान इंदौर वन मंडल की चार प्रमुख रेंजों की 14 बीट में बाघ के पंजों के स्पष्ट निशान देखे गए हैं। ये निशान केवल मिट्टी या रेत पर उभरे साधारण पदचिह्न नहीं हैं, बल्कि ये इस बात का प्रमाण हैं कि बाघ इन क्षेत्रों में सक्रिय रूप से विचरण कर रहे हैं।
वन अधिकारियों के अनुसार, पंजों के निशानों की गहराई, आकार और दिशा से यह अनुमान लगाया जाता है कि बाघ कितने बड़े हैं, वे किस दिशा में जा रहे हैं और क्या वे एक ही हैं या अलग-अलग बाघों के निशान हैं। इन संकेतों से यह भी पता चलता है कि जंगल का पारिस्थितिकी तंत्र बाघों के लिए अनुकूल बना हुआ है।
18 दिसंबर से शुरू होगी औपचारिक गणना
हालांकि रिहर्सल के दौरान मिले संकेत उत्साहजनक हैं, लेकिन वन विभाग का मुख्य उद्देश्य 18 दिसंबर से शुरू होने वाली औपचारिक बाघ गणना है। यह गणना न केवल संख्या जानने के लिए की जाती है, बल्कि यह भविष्य की संरक्षण रणनीतियों की नींव भी रखती है।
गणना के दौरान कैमरा ट्रैप, पगमार्क विश्लेषण, मल और खरोंच के निशानों का अध्ययन किया जाएगा। इसके साथ ही वनकर्मियों द्वारा क्षेत्र का पैदल सर्वेक्षण भी किया जाएगा। यह पूरी प्रक्रिया बेहद सावधानी और वैज्ञानिक पद्धति से की जाती है, ताकि आंकड़े अधिकतम सटीक हों।
जंगलों पर बढ़ता दबाव और बाघों की अनुकूलन क्षमता
इंदौर और आसपास के क्षेत्रों में विकास कार्य तेजी से हो रहे हैं। सड़कें, पुल, औद्योगिक क्षेत्र और आवासीय कॉलोनियां जंगलों के आसपास फैल रही हैं। ऐसे में वन्यजीवों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। इसके बावजूद बाघों की मौजूदगी यह दिखाती है कि उन्होंने परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालने की क्षमता विकसित की है।
हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह अनुकूलन क्षमता असीमित नहीं है। यदि जंगलों का अतिक्रमण इसी गति से चलता रहा, तो भविष्य में यह संतुलन बिगड़ सकता है। इसलिए बाघों की मौजूदगी को केवल सफलता के रूप में नहीं, बल्कि एक चेतावनी के रूप में भी देखा जा रहा है कि संरक्षण के प्रयासों को और मजबूत करने की जरूरत है।
वन विभाग के प्रयास और रणनीति
वन विभाग पिछले कुछ वर्षों से बाघ संरक्षण को लेकर लगातार सक्रिय है। गश्त बढ़ाई गई है, संवेदनशील इलाकों में विशेष निगरानी रखी जा रही है और स्थानीय समुदायों को भी संरक्षण से जोड़ा जा रहा है। नाइट विजन कैमरों की तैनाती इसी रणनीति का हिस्सा है।
इन कैमरों से यह भी पता लगाया जा सकता है कि जंगल में कोई अवैध गतिविधि तो नहीं हो रही। शिकारियों की गतिविधियों पर नजर रखने में भी यह तकनीक मददगार साबित हो रही है। इससे न केवल बाघ, बल्कि अन्य वन्यप्राणियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होती है।
स्थानीय समुदाय और जंगल का रिश्ता
इंदौर वन मंडल के आसपास रहने वाले ग्रामीण समुदायों का जंगल से गहरा रिश्ता है। वे जंगल पर निर्भर भी हैं और उसके संरक्षक भी हैं। वन विभाग द्वारा समय-समय पर जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाते हैं, ताकि लोग बाघों और अन्य वन्यजीवों के महत्व को समझें।
ग्रामीणों से मिली जानकारी भी कई बार बाघों की गतिविधियों को समझने में मदद करती है। पंजों के निशान, आवाजें या मवेशियों पर हमले जैसी घटनाओं से भी वन विभाग को महत्वपूर्ण संकेत मिलते हैं।
बाघ संरक्षण का व्यापक महत्व
बाघ केवल एक वन्यजीव नहीं है, बल्कि पूरे जंगल के स्वास्थ्य का प्रतीक है। यदि किसी क्षेत्र में बाघ सुरक्षित हैं और उनकी संख्या स्थिर या बढ़ रही है, तो इसका मतलब है कि वहां का पारिस्थितिकी तंत्र संतुलित है।
इंदौर वन मंडल में बाघों के संकेत यह दर्शाते हैं कि यहां का जंगल अभी भी जीवंत है। यह न केवल मध्य प्रदेश के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए सकारात्मक संदेश है, क्योंकि बाघ संरक्षण भारत की वैश्विक पहचान का भी हिस्सा है।
भविष्य की चुनौतियां और उम्मीदें
हालांकि वर्तमान संकेत उत्साहजनक हैं, लेकिन चुनौतियां कम नहीं हैं। जंगलों का fragmentation, मानव-वन्यजीव संघर्ष और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं। इनसे निपटने के लिए दीर्घकालिक योजना और राजनीतिक इच्छाशक्ति दोनों की जरूरत है।
18 दिसंबर से शुरू होने वाली बाघ गणना से मिलने वाले आंकड़े आने वाले वर्षों की रणनीति तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। उम्मीद की जा रही है कि ये आंकड़े संरक्षण प्रयासों को और मजबूती देंगे।
