इंदौर और खंडवा के बीच रेल संपर्क को आधुनिक और तेज बनाने का सपना लगभग दो दशक से कागजों और अधूरे वादों के बीच उलझा हुआ है। कभी इस मार्ग पर चलने वाली नैरो गेज ट्रेनें दोनों शहरों के बीच की दूरी को भरने का एक सहज और सस्ता साधन थीं, परंतु आज वही ट्रैक इतिहास बन चुके हैं। उनकी जगह आने वाली ब्रॉडगेज लाइन का निर्माण इतना लंबा और जटिल हो गया है कि लोग अब पूछने लगे हैं कि आखिर वह दिन कब आएगा, जब इंदौर से खंडवा की दूरी मात्र दो घंटे में तय हो सकेगी।
साल 2008 में जब इस परियोजना को तकनीकी स्वीकृति मिली थी, तब उम्मीद थी कि अगले कुछ वर्षों में नई रेललाइन धरातल पर उतर जाएगी। लेकिन यह उम्मीद बीतते समय के साथ पहले खिसकती गई और फिर लड़खड़ाती हुई ऐसी मंजिल पर पहुंच गई जहां लक्ष्य और वादा दोनों ही धुंधले दिखने लगे।

पहला लक्ष्य 2024 तय हुआ। फिर इसे बदलकर 2026 कर दिया गया। उसके बाद 2028 का वादा किया गया। लेकिन जिन यात्रियों ने वर्षों से इस लाइन के पुनर्निर्माण का इंतजार किया है, वे अब कहने लगे हैं कि 2030 भी शायद अंतिम वर्ष न हो। इस बीच नैरो गेज लाइन बंद हुए आठ साल से अधिक बीत चुके हैं। दो शहरों के बीच का रेल संपर्क टूट चुका है। और सड़क मार्ग, महंगे किराए और कई घंटों की असुविधाजनक यात्रा ही लोगों का सहारा बन गई है।
इसी देरी के कारण इंदौर और निमाड़ क्षेत्र के लाखों लोग प्रतिदिन एक जटिल यात्रा का सामना करते हैं। सड़कें खुद निर्माणाधीन हैं, ट्रैफिक बढ़ रहा है और बसों तथा निजी वाहनों का किराया कई रूटों पर दो से तीन गुना तक बढ़ चुका है। छोटे कस्बों की अर्थव्यवस्था, जो कभी नैरो गेज लाइन पर फलती-फूलती थी, अब ठहराव का दर्द महसूस कर रही है।
कब से शुरू हुआ इंतजार, कब तक चलेगा: समय सीमा का बदलता गणित
इस परियोजना के इतिहास को देखने पर स्पष्ट होता है कि यह केवल तकनीकी चुनौती नहीं, बल्कि लगातार बदलते लक्ष्य, अधूरे निर्माण पैकेज, अधूरी टेंडर प्रक्रिया, संवेदनशील घाट सेक्शन और प्रशासनिक देरी का एक जटिल मिश्रण है।
रेलवे ने पहले उम्मीद जताई थी कि 2024 तक यह लाइन तैयार हो जाएगी। लेकिन जिस गति से काम आगे बढ़ता रहा, वह लक्ष्य जल्द ही अवास्तविक साबित हुआ। फिर 2026 का लक्ष्य निर्धारित किया गया। थोड़े समय बाद इसे भी बदल दिया गया। अब यह कहा गया कि 2028 में उज्जैन में होने वाले सिंहस्थ से पहले ट्रेनें चलाने का प्रयास होगा।
जनप्रतिनिधियों ने भी जनता के सामने यह भरोसा जताया कि कम से कम खंडवा से सनावद या ओंकारेश्वर तक का हिस्सा शुरू कर दिया जाएगा। लेकिन रेलवे अधिकारियों ने स्पष्ट कर दिया कि घाट सेक्शन, जिसमें लंबी सुरंगें और जटिल इंजीनियरिंग कार्य हैं, पूरे हुए बिना किसी भी हिस्से को ऑपरेशनल करना संभव नहीं है।
आज स्थिति यह है कि रेलवे स्वयं मानता है कि 2030 से पहले इस मार्ग पर ट्रेन दौड़ाना मुश्किल है।
घाट सेक्शन: परियोजना का दिल, और सबसे कठिन हिस्सा
इंदौर–खंडवा ब्रॉडगेज परियोजना के लिए सबसे बड़ा अवरोध घाट सेक्शन है। नर्मदा घाटी का भूगोल अत्यंत संवेदनशील है। यहां की जमीन पथरीली है, पहाड़ों की संरचना नाजुक है और कई जगहों पर सुरंग निर्माण अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। इस क्षेत्र में कुल 19 सुरंगें बनाई जानी हैं, जिनमें से एक सुरंग लगभग 4.1 किलोमीटर लंबी होगी।
इंजीनियरों के अनुसार, इस सुरंग की डिजाइन कई बार बदली गई है क्योंकि सर्वे के दौरान भूभाग अपेक्षाओं से अलग पाया गया। कभी जल-स्रोत सामने आ जाते, कभी मिट्टी का प्रकार उम्मीद से अलग निकलता, कभी ढलान की दिशा बदलती नजर आती। इन सभी कारणों ने परियोजना को कई वर्षों तक पीछे धकेला।
घाट सेक्शन में दो ठेकेदार कंपनियों ने भी काम छोड़ दिया, जिससे नए सिरे से ठेका जारी करना पड़ा। इससे समय और लागत दोनों ही बढ़े।
पुल, ब्रिज, अंडरपास और अधूरी संरचनाएं: क्यों नहीं बढ़ पाता काम
जेसीबी और मशीनें हर मौसम में घाट में नहीं उतर सकतीं। बरसात में क्षेत्र इतना मुश्किल हो जाता है कि महीनों तक काम रोकना पड़ता है। इस मार्ग पर 36 बड़े पुल और 76 छोटे पुल बनने हैं। 12 अंडर-ब्रिज और 3 ओवर-ब्रिज भी परियोजना का हिस्सा हैं।
ईंट, स्टील, सीमेंट, रबर पैड, मशीनरी और रेल उपकरणों की कीमत पिछले वर्षों में इतनी बढ़ गई है कि कुल लागत 5393 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच चुकी है।
वन विभाग से अनापत्ति प्रमाण-पत्र (NOC) प्राप्त करने में भी कई वर्ष लगे। जब यह प्रमाण-पत्र मिल गया, तब तक डिजाइनों में सुधार, पुनःसर्वे और पुनःयोजना बनाना आवश्यक हो गया।
कागजों पर देखा जाए तो यह 160 किलोमीटर की लाइन है। लेकिन हकीकत यह है कि लगभग 60 किलोमीटर हिस्सा आज भी वैसा ही पड़ा है जैसा वर्षों पहले बंद हुआ था।
महू से पातालपानी तक: सबसे अधिक उलझनें
महू से पातालपानी और उसके आगे मुख्तियारा तक का हिस्सा अभी भी कई तकनीकी समस्याओं से गुजर रहा है। ऊंचाई, ढलान, पेड़ों की कटाई, पर्यावरणीय संतुलन और सुरंगों की संरचना जैसे कारणों से यहां बार-बार डिजाइन बदले गए।
कुछ हिस्सों की मिट्टी इतनी कमजोर है कि वहां नई तकनीक लागू करनी पड़ी। कुछ जगहों पर पहाड़ काटने के बाद ही पता चला कि चट्टानें संरचनात्मक रूप से स्थिर नहीं हैं।
इन सभी कारणों ने परियोजना को न केवल धीमा किया बल्कि वित्तीय भार भी बढ़ाया।
परियोजना पर राजनीति, उम्मीदें और वादे
इंदौर और खंडवा क्षेत्र के सांसदों, विधायकों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने पिछले वर्षों में कई बार जनता को आश्वासन दिया कि काम तेज गति से हो रहा है।
इंदौर क्षेत्र के प्रतिनिधियों का कहना है कि जैसे ही शेष तकनीकी बाधाएं दूर होंगी, काम तेजी से आगे बढ़ेगा। उनके अनुसार, फंड उपलब्ध है और परियोजना को प्राथमिकता दी जा रही है।
वे यह भी मानते हैं कि डबलिंग यानी दो ट्रैक के निर्माण की योजना भविष्य में इस मार्ग को उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक महत्वपूर्ण लिंक बना देगी। हालांकि यह भी सच है कि डबलिंग का विचार इस परियोजना को और पीछे धकेल सकता है।
रेलवे अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल डबलिंग केवल तैयारी के चरण में है और इससे मुख्य परियोजना पर बड़ा प्रभाव नहीं पड़ेगा।
छोटे कस्बों पर प्रभाव: बंद हुई लाइन और ठहर गई जिंदगी
नैरो गेज लाइन बंद होने के बाद मोरटक्का, सिमरोल, सनावद और बगलामुखी जैसे कस्बों में स्थानीय बाजारों पर गहरा असर पड़ा। छोटा व्यवसाय प्रभावित हुआ। स्कूल और कॉलेज जाने वाले छात्रों की आवाजाही महंगी हो गई। किसानों को उत्पाद शहर तक पहुंचाने में अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है।
व्यापारियों के अनुसार बस किराए कई रूटों पर पहले की तुलना में तीन गुना तक बढ़ गए हैं। कई परिवारों ने मजबूरी में शहर का रुख किया है क्योंकि पुराने रूट के बंद हो जाने से उनके काम में लगातार गिरावट आई।
यह केवल एक रेल परियोजना नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था, रोजगार और शिक्षा से जुड़ा मुद्दा बन चुका है।
जिम्मेदार क्या कहते हैं
जनप्रतिनिधियों का दावा है कि 2028 या उसके एक-दो वर्ष बाद तक ट्रेनें चलने लगेंगी। रेलवे अधिकारी कहते हैं कि बाधाएं अब लगभग समाप्त हैं, काम तेजी से हो रहा है और निर्माण प्रक्रिया व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ रही है।
लेकिन जमीन पर स्थिति अभी भी शंकाओं से घिरी हुई है। कुछ टेंडर अभी बाकी हैं, कुछ मशीनें अभी तक साइट पर नहीं पहुंची हैं और घाट सेक्शन में कई महीनों का काम शेष है।
जनता का धैर्य टूट रहा है, लेकिन उम्मीद अभी भी जिंदा है।
निष्कर्ष: इंदौर-खंडवा ब्रॉडगेज परियोजना कब पूरी होगी?
कागजों और वादों में यह परियोजना सुंदर लग सकती है, लेकिन धरातल पर यह कई तकनीकी, प्रशासनिक और आर्थिक चुनौतियों से घिरी हुई है। 2030 तक ट्रेनें चलेंगी या नहीं, इसका जवाब अभी भी अनिश्चित है।
इंदौर और खंडवा के लोग आज भी उसी सवाल के जवाब का इंतजार कर रहे हैं जिसे पहली बार 2008 में पूछा गया था।
इंदौर से खंडवा दो घंटे में पहुंचने का सपना अभी भी अधूरा है, पर उम्मीद है कि एक दिन यह मंजिल जरूर मिलेगी।
