दिल्ली में हुए हालिया ब्लास्ट ने देश की सुरक्षा एजेंसियों को एक बार फिर उसी दिशा में धकेल दिया है—इंदौर और पूरा मालवा क्षेत्र। यह वह जगह है, जो हर बड़े बम धमाके के बाद कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में सामने आती है। मानो इस शांत, व्यवस्थित और वाणिज्यिक शहर के भीतर एक दूसरी छिपी हुई दुनिया भी बसती हो—जहां साजिशें पनपती हैं, जहां छुपने के लिए जगह मिलती है और जहां कई बार आतंक की डोरें बंधी हुई दिखाई देती हैं।
दिल्ली ब्लास्ट हो, अहमदाबाद सीरियल विस्फोट हों, मालेगांव धमाके हों, समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट हो या मोडासा बम धमाका—हर बार जांच एजेंसियों के दस्तावेज़ों में एक नाम बार–बार चमकता है—इंदौर और मालवा का लिंक।

इस बार भी कहानी वहीं से खुली है, जहाँ पिछले कई वर्षों से खुलती आई है—जवाद सिद्दीकी, अल-फलाह संस्थान और उसके शागिर्दों के नेटवर्क से।
इंदौर का नाम फिर क्यों आया सामने?
दिल्ली धमाके की जांच ने जब शुरुआती कड़ियों को जोड़ना शुरू किया, तो एक नाम सामने आया: जवाद सिद्दीकी।
जवाद खुद सीधे तौर पर इस ब्लास्ट का आरोपी नहीं है—लेकिन उसके संस्थान, उसके संपर्कों और उसके छात्रों का नाम बार-बार जुड़ रहा है।
जैसे ही दिल्ली पुलिस की विशेष सेल और केंद्रीय एजेंसियों ने पुराने रिकॉर्ड खंगालना शुरू किया, एक पुरानी फाइल खोली गई—जिस पर धूल जमी थी, लेकिन खतरा आज भी उतना ही जीवित था।
यह फाइल थी अल-फलाह यूनिवर्सिटी नेटवर्क और उसके चांसलर की। नाम था—जवाद सिद्दीकी।
इदौर के महू के जवाद पर पहले भी कई संदिग्ध गतिविधियों के तार जुड़े पाए जा चुके थे। लेकिन इस बार जब एजेंसियों ने गहराई से जांच शुरू की, तो एक ऐसा चेहरा सामने आया, जिसकी तलाश 25 वर्षों से की जा रही थी—हमूद सिद्दीकी।
हमूद की गिरफ्तारी: 25 साल की फरारी और अचानक हुआ पर्दाफाश
महू पुलिस ने करोड़ों रुपये के गबन के एक पुराने मामले में हमूद सिद्दीकी को गिरफ्तार कर लिया।
एक ऐसा व्यक्ति, जिसके अस्तित्व पर कई बार सवाल उठे।
जिन्हें कई लोग मानते थे कि शायद देश छोड़ चुका होगा।
लेकिन वह यहीं था—इंदौर–मालवा की इसी जमीन पर, छुपा हुआ, गुमशुदा सा।
दिल्ली ब्लास्ट के बाद जवाद सिद्दीकी की फाइल खोली गई और धीरे–धीरे हमूद की कहानी बाहर आने लगी।
हमूद की गिरफ्तारी मात्र एक क्राइम केस का खुलासा नहीं थी।
यह एक ऐसे नेटवर्क का पर्दाफाश था, जो वर्षों से जांच एजेंसियों की रडार पर था, पर हाथ नहीं लग रहा था।
अब हमूद से ATS, STF, IB सभी पूछताछ कर रहे हैं—क्योंकि उसके पास जानकारी सिर्फ फाइनेंशियल घोटालों की नहीं, बल्कि उन कड़ियों की भी हो सकती है, जो भारत में हुई कई आतंकी घटनाओं को जोड़ती हैं।
अल-फलाह का नाम क्यों आता है बार–बार?
इंदौर का अल-फलाह संस्थान वर्षों से जांच एजेंसियों की नजर में रहा है।
यह संस्थान बाहरी तौर पर एक शैक्षिक केंद्र कहा जाता था, लेकिन कई बार इसे “आतंकी रैकेट की यूनिवर्सिटी” का दर्जा मिला।
कई गिरफ्तार आतंकी, कई भगोड़े, कई संदिग्ध—सबकी कहानी किसी न किसी तरीके से अल-फलाह के संपर्क में पाई गई।
जवाद सिद्दीकी का नाम कई बार सीधे आरोपियों में नहीं आया, लेकिन उसके छात्रों और उससे जुड़े युवाओं का नाम कई ब्लास्ट कड़ियों में आया।
देश की खुफिया एजेंसियां इसे एक “स्लीपर–मॉड्यूल पॉइंट” तक मानती रही हैं।
इंदौर–मालवा क्यों बन रहा है आतंकी गतिविधियों का अड्डा?
यह सवाल सिर्फ सुरक्षा एजेंसियों का नहीं है—यह सवाल पूरे देश का है। इंदौर और मालवा ने पिछले 20–25 वर्षों में जितनी तेजी से तरक्की की है, उतनी ही तेजी से यहां बाहरी राज्यों से लोगों का आना–जाना बढ़ा है। यहां आसानी से किराए पर घर मिल जाते हैं। लोगों की आवाजाही इतनी अधिक है कि किसी एक चेहरे पर ध्यान नहीं जाता। कई बाहरी युवा, छात्र और नौकरी–पेशा लोग इस शहर में आते हैं—और इसी भीड़ में कई बार आतंकियों को पनाह मिल जाती है। जांच एजेंसियों के अनुसार:
- इंदौर में बड़े शहरों जैसी निगरानी नहीं
- किराए के मकानों का पुलिस वेरिफिकेशन कमजोर
- लोगों की तेजी से बढ़ती आबादी
- युवा वर्ग का आसानी से घुलना–मिलना
- बड़े शहरों की तुलना में सुरक्षित ठिकाना
इन्हीं कारणों से आतंकी कई बार इंदौर और मालवा को अपनी “सुरक्षित शरणस्थली” की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं।
पिछले धमाकों से जुड़ते मालवा के सुराग
1. अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट (2008)
जांच में मालवा–इंदौर लिंक सामने आया। कई मुख्य आरोपियों की गतिविधियां इस क्षेत्र से जुड़ी पाई गईं।
2. मालेगांव ब्लास्ट
कई मीटिंग्स और संदिग्ध यात्राओं के निशान इंदौर तक पहुंचे।
3. समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट
कई कड़ियां इंदौर और आसपास के क्षेत्रों में पाई गईं।
4. मोडासा बम धमाका
कई संदिग्धों के संपर्क मालवा से जुड़े मिले।
हर बार कड़ी वही होती है—इंदौर–मालवा क्षेत्र।
दिल्ली ब्लास्ट के बाद क्यों बढ़ी हलचल?
दिल्ली धमाके की कड़ियां जब जवाद के संस्थान तक पहुंचीं, तो खुफिया एजेंसियों ने इंदौर को फिर टारगेट किया।
ATS, STF, IB ने मिलकर कई लोकेशनों पर इनपुट निकाले।
मोबाइल लोकेशन, वित्तीय लेन–देन, विदेशी संपर्क—सभी की जांच शुरू हुई।
जवाद तो खुलकर सामने नहीं आ पाया, लेकिन उसके नेटवर्क ने सवाल खड़े कर दिए।
हमूद की गिरफ्तारी ने इस पूरे नेटवर्क की दिशा ही बदल दी।
संभव है कि हमूद सिर्फ एक घोटाला आरोपी नहीं है।
वह कई पुराने राज खोल सकता है।
जांच एजेंसियां क्या तलाश रही हैं?
सूत्र बताते हैं कि एजेंसियां तीन बातों पर खासतौर से फोकस कर रही हैं—
1. क्या जवाद और उसके शागिर्द ब्लास्ट मॉड्यूल के संपर्क में थे?
यह जानना जरूरी है कि उनकी क्या भूमिका थी—सहयोगी? प्रशिक्षक? या सिर्फ शरण देने वाले?
2. क्या इंदौर का नेटवर्क अभी भी सक्रिय है?
क्या शहर में आज भी ऐसे लोग हैं, जो छुपे हुए मॉड्यूल का हिस्सा हैं?
3. हमूद के पास क्या है?
25 वर्षों की फरारी सिर्फ गबन के मामले में नहीं हो सकती।
कई बार लंबे फरार लोगों के तार बड़े नेटवर्क से जुड़ते पाए गए हैं।
स्थानीय पुलिस बनाम केंद्रीय एजेंसियां: एक अभूतपूर्व समन्वय
महू पुलिस ने जैसे ही हमूद को पकड़ा, केंद्रीय एजेंसियों की टीम इंदौर पहुंच गई।
पूरे क्षेत्र में खुफिया गतिविधियों में तेजी आ गई।
कई पुराने रिकॉर्ड, पुराने किराएदारों की फाइलें, पुराने कॉल डेटा—सब की जांच की जा रही है।
इंदौर पुलिस भी अब पूरी सावधानी के साथ केंद्रीय एजेंसियों का सहयोग कर रही है।
इंदौर के लोग क्या कहते हैं?
शहर की आम जनता में चिंता तो है—लेकिन आश्चर्य नहीं।
क्योंकि कई वर्षों से लोग सुनते आए हैं कि मालवा का नाम बड़े आतंकी मामलों में आया है।
लोग कहते हैं—
“इंदौर शांत है, लेकिन इसके भीतर बहुत कुछ चलता है, जो दिखता नहीं।”
“यहां बाहर से आने वाला कोई भी भीड़ में घुलमिल जाता है।”
“शहर बड़ा है, ट्रैक करना मुश्किल है।”
निष्कर्ष: एक शहर, एक रहस्य और लगातार लौटता हुआ खतरा
दिल्ली ब्लास्ट ने एक बार फिर इंदौर–मालवा को राष्ट्रीय सुरक्षा मानचित्र के केंद्र में ला दिया है।
हमूद की गिरफ्तारी सिर्फ एक शुरुआत है।
अगले कई हफ्ते, कई महीनों तक इसकी जांच जारी रहेगी।
और संभव है कि इस जांच के दौरान वे कड़ियां भी सामने आएं, जिन्हें अब तक सिर्फ अनुमान माना गया था।
भारत की सुरक्षा एजेंसियां अब इंदौर को सिर्फ व्यापारिक राजधानी नहीं, बल्कि एक ऐसे क्षेत्र के रूप में भी देख रही हैं, जहाँ आतंक की छिपी हुई परतें अभी भी मौजूद हो सकती हैं।
इंदौर का नाम फिर क्यों आया?
क्यों बार–बार ये कड़ियां इसी शहर तक पहुंचती हैं?
जवाद और हमूद के नेटवर्क में क्या है?
यह सब आने वाली जांच बताएगी।
लेकिन एक बात तय है—
इंदौर–मालवा का नाम एक बार फिर देश की सुरक्षा चर्चा के केंद्र में है…
और यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।
