इंदौर में मेट्रो प्रोजेक्ट की योजना और अंडरग्राउंड हिस्सों के निर्माण को लेकर शहर के तीन नागरिकों ने जनहित याचिका दायर की है। याचिका में आरोप लगाया गया कि मेट्रो का अंडरग्राउंड निर्माण कार्य बिना सही योजना और अनुमतियों के शुरू किया जा रहा है, जिससे शहर की पुरातात्विक धरोहर और भूजल स्तर प्रभावित हो सकता है। हाईकोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए शासन से प्रोजेक्ट की पूरी रिपोर्ट मांगी है और स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि प्रोजेक्ट की डिजाइन, चरणबद्ध समयसीमा और कार्य की प्रगति की सभी जानकारियां कोर्ट के समक्ष पेश की जाएँ।

कोर्ट में सुनवाई के दौरान इस मुद्दे पर तीखी बहस हुई। सरकारी वकील ने दावा किया कि याचिका केवल प्रसिद्धि पाने और अपनी जमीन बचाने के उद्देश्य से दायर की गई है। उन्होंने याचिकाकर्ता किशोर कोडवानी की योग्यता पर भी सवाल उठाया। हालांकि कोडवानी ने पलटवार करते हुए मेट्रो रेल कार्पोरेशन के बोर्ड के सदस्यों की योग्यता और अनुभव पर सवाल खड़ा किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि बोर्ड में किसी भी सदस्य के पास रेल परियोजना का अनुभव या तकनीकी डिग्री नहीं है।
शहर के तीन नागरिकों – किशोर कोडवानी, शेखर गिरी और महेश वर्मा – ने इस याचिका को दायर किया। कोडवानी ने कोर्ट में कहा कि उन्होंने शहर के हित में ही यह याचिका दायर की है और उनका उद्देश्य केवल शहर के नागरिकों की सुरक्षा और सार्वजनिक हित को सुनिश्चित करना है। उन्होंने यह भी कहा कि मेट्रो परियोजना की अनुमति प्रक्रिया में कई संवैधानिक और नियामक उल्लंघन हुए हैं। कोडवानी ने कोर्ट को यह तथ्य भी बताया कि इंदौर में जिला योजना समिति ही नहीं बनी, जबकि परियोजना की अनुमति के लिए इसकी सहमति आवश्यक थी।
याचिका में यह आरोप भी लगाया गया कि मेट्रो निर्माण से शहर की पुरातात्विक धरोहरों और भूजल स्तर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। कोर्ट ने इस बात को गंभीरता से लिया और प्रशासन से पूरी परियोजना रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि विकास कार्यों के दौरान परेशानियाँ आना स्वाभाविक है, लेकिन कब और किस स्तर तक ये प्रभाव होंगे, इसकी जानकारी जनता को होना आवश्यक है। अब इस मामले की अगली सुनवाई आठ दिसंबर को होगी।
कोडवानी ने यह भी तर्क दिया कि मेट्रो प्रोजेक्ट की योजना और अनुमतियाँ पूरी तरह पारदर्शी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि प्रोजेक्ट की योजना अभी फाइनल नहीं हुई है, लेकिन कार्य शुरू कर दिया गया है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि रोजाना सरकार के विभिन्न अधिकारियों और मंत्रियों के बयान प्रोजेक्ट को लेकर विरोधाभासी हैं। इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि परियोजना का प्रारूप और अनुमति सही तरीके से ली गई है या नहीं।
सुनवाई के दौरान बीआरटीएस का भी जिक्र किया गया। कोडवानी ने बताया कि बीआरटीएस परियोजना भी बिना उचित योजना और अनुमति के शुरू की गई थी और अब 12 साल बाद उसे तोड़ा जा रहा है। उन्होंने कहा कि उस समय भी हमने आपत्ति जताई थी, लेकिन उस पर गंभीरता से कार्रवाई नहीं हुई। इस बार भी याचिकाकर्ता ने यह तर्क दिया कि उनका उद्देश्य केवल व्यावहारिक ज्ञान और शहर की भलाई के लिए कोर्ट में मुद्दा उठाना है, न कि व्यक्तिगत लाभ।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रशासन को प्रोजेक्ट की पूरी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी और उसके बाद कोर्ट तय करेगा कि परियोजना पर रोक लगाई जाए या नहीं। इस कदम को शहर में प्रशासनिक पारदर्शिता और नियामक अनुपालन के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हाईकोर्ट की सुनवाई में यह भी सामने आया कि मेट्रो के अंडरग्राउंड हिस्से के निर्माण से शहर के भूजल स्तर पर प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा पुरातात्विक धरोहरों के आसपास बिना अनुमति निर्माण करने का सवाल भी उठाया गया। कोर्ट ने यह निर्देश दिया कि सरकार नियमों का पालन करे और सार्वजनिक हित के अनुरूप परियोजना की योजना प्रस्तुत करे।
इस मामले में शहरवासियों की चिंताएँ न्यायालय के समक्ष सीधे तौर पर प्रस्तुत की गई हैं। प्रशासन से पूरी रिपोर्ट मांगे जाने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मेट्रो परियोजना शहर के हित, पर्यावरण और नियामक नियमों के अनुसार पूरी तरह पारदर्शी और सुरक्षित तरीके से संचालित हो।
