मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में विकास की रफ्तार तेज़ है, लेकिन इस रफ्तार की कीमत अब लोग अपने घरों से चुका रहे हैं। छोटा गणपति मंदिर के पास प्रस्तावित अंडरग्राउंड मेट्रो स्टेशन के विरोध में मल्हारगंज इलाके के लोग सड़कों पर उतर आए हैं। रहवासी दावा कर रहे हैं कि इस स्टेशन के निर्माण से 42 मकान टूटेंगे और करीब 150 परिवार बेघर हो जाएंगे।

एक तरफ सरकार का कहना है कि मेट्रो से शहर का भविष्य बदलेगा, वहीं दूसरी तरफ लोगों का कहना है कि उनके वर्तमान का अस्तित्व मिटाया जा रहा है।
मल्हारगंज इलाके में विरोध की लहर
मल्हारगंज और उसके आसपास के इलाकों में बीते कई दिनों से माहौल तनावपूर्ण बना हुआ है। रविवार को जब मेट्रो प्रोजेक्ट की टीम सॉइल टेस्टिंग मशीन लेकर साइट पर पहुंची, तो दर्जनों लोग सड़कों पर उतर आए। उन्होंने मशीन को रोक दिया और जमकर नारेबाज़ी की।
रहवासियों का कहना है कि जिस जगह स्टेशन बनाने की योजना है, वहां इलाके की गलियां बेहद तंग हैं और मकान पुराने हैं। ऐसे में यहां स्टेशन बनाने से न केवल लोगों के घर टूटेंगे बल्कि आसपास की ऐतिहासिक इमारतें भी खतरे में पड़ सकती हैं।
स्थानीय नेताओं ने दी आवाज़ को ताकत
प्रदर्शन में भाजपा के वरिष्ठ नेता सत्यनारायण सत्तन और कांग्रेस के नेता कृपाशंकर शुक्ला भी शामिल हुए। दोनों ही इस इलाके के रहवासी हैं। उन्होंने खुलकर कहा कि यह निर्णय जनभावना के खिलाफ है। सत्तन ने कहा — “मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से हमने बात की थी, उन्होंने कहा था कि छोटा गणपति मंदिर के पास स्टेशन नहीं बनेगा। लेकिन अब अचानक कहा जा रहा है कि स्टेशन वहीं बनेगा। यह जनविरोधी फैसला है।”
कृपाशंकर शुक्ला ने भी कहा कि यदि प्रशासन ने फैसला नहीं बदला, तो आंदोलन और तेज़ किया जाएगा।
मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का बयान — स्टेशन वहीं बनेगा, लेकिन आधुनिक तकनीक से
जब यह मामला समीक्षा बैठक में उठा, तो नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने स्पष्ट किया कि “स्टेशन वही बनेगा, लेकिन बिना तोड़फोड़ के। मेट्रो टीम को निर्देश दिए गए हैं कि आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करें ताकि किसी का घर न टूटे।”
हालांकि स्थानीय लोगों का मानना है कि “बिना तोड़फोड़ के निर्माण” सिर्फ एक सांत्वना भरा बयान है, क्योंकि सच्चाई यह है कि मेट्रो के लिए जगह बेहद सीमित है।
रहवासी बोले — ‘हम आत्मदाह तक जाएंगे’
मल्हारगंज निवासी शेखर गिरि, डॉ. विजय हरलालका, डॉ. सुनीता, मनोज श्रीवास्तव, छोटू शर्मा, रूपा शर्मा और कई अन्य लोगों ने प्रदर्शन में भाग लिया। उन्होंने कहा कि यह मामला सिर्फ मकानों का नहीं बल्कि पीढ़ियों की यादों का है।
“हमने इन गलियों में अपना जीवन बिताया है। अब सरकार कह रही है कि मेट्रो के लिए घर तोड़ दो। हम ऐसा नहीं होने देंगे,” एक वृद्ध महिला ने कहा। कई लोगों ने चेतावनी दी कि यदि फैसला नहीं बदला गया तो वे आत्मदाह जैसे कठोर कदम उठाने को मजबूर होंगे।
मेट्रो प्रोजेक्ट का उद्देश्य बनाम वास्तविकता
इंदौर मेट्रो प्रोजेक्ट का उद्देश्य शहर में ट्रैफिक कम करना, प्रदूषण घटाना और जनता को बेहतर सार्वजनिक परिवहन देना है। लेकिन हर विकास योजना की तरह, यह भी विवादों में घिर गई है। मल्हारगंज जैसे पुराने इलाकों में ज़मीन की तंगी और भीड़भाड़ बड़ी चुनौती है। तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि यहां “अंडरग्राउंड स्टेशन” बनाना बेहद कठिन होगा, क्योंकि जमीन का स्तर असमान है और आसपास की इमारतें पुरानी हैं।
रहवासियों की मांग — सुभाष मार्ग पर बनाए स्टेशन
लोगों का कहना है कि मेट्रो के लिए पहले ही सुभाष मार्ग पर सर्वे हो चुका था और वह इलाका निर्माण के लिए उपयुक्त है। फिर अचानक स्टेशन की जगह बदलने का क्या औचित्य है? प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि यह “भूमि हितों” का मामला है और कुछ प्रभावशाली लोगों की मांग पर लोकेशन बदली गई है।
परिवारों की चिंता — कहां जाएंगे ये 150 परिवार?
जिन मकानों को तोड़े जाने की बात है, उनमें से कई दो मंजिला या तीन मंजिला हैं। कुछ मकानों में किराएदार हैं, जिनका कोई विकल्प नहीं।
एक स्थानीय निवासी ने कहा — “सरकार कह रही है कि हमें मुआवजा दिया जाएगा, लेकिन मुआवजा किस आधार पर? मकान की कीमत नहीं, उसमें रहने की भावनाएं हैं। हम पीढ़ियों से यहां रह रहे हैं। 150 परिवारों में कई ऐसे हैं जिनके पास दूसरी संपत्ति नहीं। उनके लिए यह परियोजना ‘विकास नहीं, विनाश’ लेकर आई है।
शहर का विकास बनाम नागरिकों की भावनाएं
यह मामला एक बड़ा सवाल खड़ा करता है — क्या विकास का मतलब लोगों का उजड़ना है? मेट्रो जैसी परियोजनाएं निश्चित रूप से शहर के लिए जरूरी हैं, लेकिन जब इन्हें लागू करने में मानवीय पहलू नजरअंदाज कर दिए जाते हैं, तो यही विकास विवाद का कारण बन जाता है।इंदौर जैसे शहरों को भविष्य की जरूरतों के अनुसार ढालना जरूरी है, लेकिन यह काम जनता की सहमति और सहभागिता के बिना नहीं होना चाहिए।
सरकार की चुनौती — विकास और जनभावना के बीच संतुलन
सरकार के लिए यह स्थिति दोधारी तलवार जैसी है। एक तरफ परियोजना का दबाव है, दूसरी ओर जनता का गुस्सा।
यदि सरकार झुकी तो प्रोजेक्ट की गति रुक सकती है, और यदि सरकार ने ज़बरदस्ती की तो सामाजिक असंतोष बढ़ेगा।
इसलिए मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि जनता से संवाद बढ़ाएं, तकनीकी विकल्प तलाशें और नुकसान को न्यूनतम रखें।
अंतिम सवाल — क्या विकास की कीमत हमेशा आम जनता चुकाएगी?
मेट्रो प्रोजेक्ट निश्चित रूप से इंदौर को नई दिशा देगा, लेकिन यह भी जरूरी है कि विकास का अर्थ लोगों का विस्थापन न हो।
मल्हारगंज के ये परिवार इस बात के प्रतीक हैं कि विकास तभी सार्थक है जब उसमें मानवता की जगह बनी रहे।
