इंदौर शहर, मध्य प्रदेश, अपने ऐतिहासिक स्थलों और तेज़ी से बढ़ती शहरी आबादी के लिए जाना जाता है। लेकिन हाल ही में शहरवासियों के लिए एक नया स्वास्थ्य संकट उभर कर सामने आया है। इंदौर की कई इमारतों की छतों और बालकनियों में कबूतरों की बढ़ती संख्या ने अब केवल गंदगी की समस्या ही नहीं, बल्कि गंभीर फेफड़ों और अन्य स्वास्थ्य संबंधी जोखिम पैदा कर दिए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, कबूतरों की पंख, बीट (मल) और घोंसलों में मौजूद बैक्टीरिया और फंगस से हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस, एलर्जिक एयरवे डिजीज, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा है।

इंदौर शहर में कबूतरों की आबादी इतनी तेजी से बढ़ रही है कि इसे केवल स्थानीय नागरिकों की जागरूकता और प्रशासनिक कदमों से नियंत्रित करना आवश्यक हो गया है। यह स्थिति केवल इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि अन्य छोटे पक्षियों जैसे गौरैया, बुलबुल, मैना के लिए भी खतरा उत्पन्न कर रही है।
कबूतर और स्वास्थ्य: गंभीर संबंध
कबूतर केवल शहर में गंदगी फैलाने वाले पक्षी नहीं हैं। इनके बीट और पंखों में विभिन्न प्रकार के फंगल और बैक्टीरियल तत्व मौजूद होते हैं जो इंसानी फेफड़ों पर गंभीर असर डाल सकते हैं। दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के अध्ययन के अनुसार, हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस जैसी बीमारी अक्सर कबूतरों के पंख और मल के संपर्क में आने से होती है।
इसके अलावा, कबूतरों की बीट में मौजूद हिस्टोप्लाज्मा और क्रिप्टोकाक्कस जैसे फंगस फेफड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं। लंबे समय तक संपर्क में रहने पर यह स्थिति गंभीर फेफड़ों की बीमारी, एलर्जिक ब्रोंकाइटिस और यहां तक कि लंग फाइब्रोसिस तक पहुंच सकती है।
मुंबई से सीख: दाने डालने पर प्रतिबंध
इंदौर की कई बिल्डिंग की छतों पर लोग कबूतरों के लिए दाने डालते हैं, जिससे इनकी आबादी नियंत्रित से बाहर हो रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदत गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकती है। मुंबई में पहले ही ऐसे दाने डालने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।
कबूतरों के लिए सुरक्षित स्थान बनाए जाने की सलाह दी जाती है, ताकि नागरिक अपने घरों और सार्वजनिक स्थलों को स्वास्थ्य संकट से सुरक्षित रख सकें।
कबूतरों से फैलने वाली प्रमुख बीमारियाँ
1. हिस्टोप्लास्मोसिस
फेफड़ों का खतरनाक फंगल संक्रमण। लक्षण: सांस फूलना, बुखार, कमजोरी।
2. क्रिप्टोकाक्कोसिस
कबूतरों की बीट से फैलने वाला फंगस। लक्षण: लगातार खांसी, छाती में दर्द, तेज बुखार, खून वाली खांसी, वजन कम होना।
3. सिटाकोसिस
बैक्टीरियल संक्रमण। लक्षण: बुखार, फेफड़ों में सूजन, छाती में संक्रमण।
4. एलर्जिक एयरवे डिजीज
कबूतरों के पंख और धूल से एलर्जी। लक्षण: अस्थमा जैसी समस्याएँ, फेफड़ों में लंबे समय तक असर।
5. त्वचा रोग
कबूतर की गंदगी में उगने वाले फंगस और परजीवी। लक्षण: लगातार खुजली, जलन, त्वचा का सूखना या छिलना।
मुंबई में पिजन लंग डिजीज के बढ़ते मामले इस बात का सबूत हैं कि कबूतर केवल गंदगी नहीं फैलाते, बल्कि जानलेवा स्वास्थ्य समस्याएँ भी पैदा कर सकते हैं।
अन्य पक्षियों के लिए खतरा
कबूतर छोटे पक्षियों जैसे गौरैया, बुलबुल और मैना के लिए भी खतरा बन जाते हैं। उनके घोंसलों और बीट में पाए जाने वाले फंगस और माइट्स अन्य पक्षियों को बीमार कर सकते हैं। इससे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र भी प्रभावित हो सकता है।
बचाव और सुरक्षा
विशेषज्ञों ने नागरिकों को कई उपाय सुझाए हैं, जिससे कबूतरों से फैलने वाले संक्रमण को रोका जा सकता है:
- बालकनी और छत पर नेट लगाना।
- घर की खिड़कियों पर दाने नहीं डालना।
- सार्वजनिक भवनों पर एंटी-पिजन स्पाइक्स लगाना।
- घोंसलों और बीट की नियमित सफाई।
- नगर निगम द्वारा पिजन-कंट्रोल ड्राइव चलाना।
- लोगों में जागरूकता बढ़ाना।
डॉ. प्रमोद झंवर, श्वसन तंत्र विशेषज्ञ, बताते हैं कि कबूतर की पोटी एलर्जिक होती है और इंटरस्टीशियल लंग डिजीज तक ले जा सकती है। इसलिए घर में कबूतरों को भोजन न दें और सार्वजनिक स्थानों पर जागरूकता फैलाएं।
निष्कर्ष
इंदौर में कबूतरों की बढ़ती संख्या एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बन चुकी है। यह केवल गंदगी की वजह से नहीं, बल्कि फेफड़ों और अन्य अंगों पर पड़ने वाले गंभीर असर की वजह से चिंताजनक है। नागरिकों की जागरूकता, प्रशासनिक कदम और सुरक्षित स्थान निर्माण ही इस खतरे को कम कर सकते हैं।
कबूतरों को नियंत्रित करना केवल शहर की स्वच्छता और सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि मानव और पक्षियों के स्वास्थ्य के लिए भी अनिवार्य है।
