शहरों के विकास की बात जब भी होती है, तो नागरिकों की उम्मीदें स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती हैं। लोग चाहते हैं कि उनके टैक्स का पैसा सुविधाओं में बदले, बेहतर ढांचे में दिखाई दे और आने वाली पीढ़ियों के लिए टिकाऊ संपत्ति बने। लेकिन जब विकास कार्य ही सवालों के घेरे में आ जाएं, तो भरोसा टूटता है। इंदौर में नेहरू पार्क के भीतर बन रहा छह करोड़ रुपये की लागत वाला स्विमिंग पूल अब इसी टूटते भरोसे की मिसाल बन गया है।

जिस स्विमिंग पूल को शहर की आधुनिक खेल सुविधाओं की सूची में जोड़ा जाना था, वही उद्घाटन से पहले ही मरम्मत और तोड़फोड़ का शिकार हो गया। उद्घाटन से पहले ही फर्श की टाइल्स का फूल जाना न केवल निर्माण गुणवत्ता पर सवाल खड़े करता है, बल्कि पूरी परियोजना की योजना, निगरानी और जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
नेहरू पार्क और बड़े सपने
नेहरू पार्क इंदौर के उन सार्वजनिक स्थलों में से एक है, जहां हर उम्र के लोग समय बिताने आते हैं। सुबह की सैर से लेकर बच्चों के खेल और बुजुर्गों की बैठकों तक, यह पार्क शहर के सामाजिक जीवन का अहम हिस्सा रहा है। इसी कारण नगर निगम ने यहां एक आधुनिक स्विमिंग पूल बनाने की योजना बनाई थी।
परिकल्पना यह थी कि शहर के नागरिकों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैराकी सुविधा मिले, युवा खिलाड़ियों को अभ्यास का बेहतर मंच मिले और इंदौर खेलों के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाए। छह करोड़ रुपये की बड़ी राशि इसी सपने को साकार करने के लिए स्वीकृत की गई।
कागजों में मजबूत, जमीन पर कमजोर निर्माण
योजना के अनुसार स्विमिंग पूल का निर्माण तय समय सीमा में पूरा किया जाना था। ठेकेदार, इंजीनियर और संबंधित अधिकारी इस परियोजना से जुड़े थे। कागजों में हर चीज़ सही दिखाई दे रही थी। गुणवत्ता मानकों का पालन, सामग्री की जांच और तकनीकी निगरानी के दावे भी किए गए।
लेकिन जब निर्माण लगभग पूरा हो गया और उद्घाटन की तैयारी शुरू हुई, तभी फर्श की टाइल्स में उभार दिखाई देने लगा। यह उभार इतना स्पष्ट था कि पूल के इस्तेमाल से पहले ही खतरे की घंटी बज गई। सवाल यह उठा कि अगर उद्घाटन से पहले ही यह स्थिति है, तो उपयोग के दौरान क्या होता।
टाइल्स का फूलना क्या बताता है
किसी भी स्विमिंग पूल में फर्श की टाइल्स बेहद महत्वपूर्ण होती हैं। यह न केवल सौंदर्य से जुड़ी होती हैं, बल्कि सुरक्षा और टिकाऊपन का भी आधार होती हैं। टाइल्स का फूलना इस बात का संकेत है कि या तो सामग्री घटिया थी, या फिर तकनीकी प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही बरती गई।
विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसा तब होता है जब टाइल्स लगाने से पहले बेस की तैयारी सही नहीं होती, वाटरप्रूफिंग में कमी रह जाती है या चिपकाने वाली सामग्री मानक के अनुरूप नहीं होती। यह सब बुनियादी बातें हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना किसी भी सार्वजनिक परियोजना के लिए घातक हो सकता है।
उद्घाटन से पहले उखाड़ना पड़ा फर्श
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आखिरकार पूरा फर्श उखाड़ने का फैसला लिया गया। यानी जिस स्विमिंग पूल को जनता को सौंपने की तैयारी चल रही थी, वही अब दोबारा निर्माण की प्रक्रिया में चला गया। इससे न केवल समय और पैसा बर्बाद हुआ, बल्कि नगर निगम की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे।
छह करोड़ रुपये की परियोजना में इस तरह की चूक यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या निर्माण के दौरान गुणवत्ता की जांच सही तरीके से हुई थी। क्या इंजीनियरों ने समय-समय पर निरीक्षण किया था, या फिर सब कुछ केवल औपचारिकता तक सीमित रह गया।
नगर निगम की जवाबदेही पर सवाल
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का है। सार्वजनिक धन से बनी परियोजना में अगर उद्घाटन से पहले ही खामियां सामने आ जाती हैं, तो जिम्मेदारी किसकी बनती है। ठेकेदार की, इंजीनियर की या फिर उस व्यवस्था की, जो निगरानी का दावा करती है।
शहर के नागरिक यह जानना चाहते हैं कि इस गलती की कीमत कौन चुकाएगा। क्या दोषी ठेकेदार पर कार्रवाई होगी। क्या अधिकारियों से जवाब मांगा जाएगा। या फिर यह मामला भी बाकी कई मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।
पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे उदाहरण
इंदौर नगर निगम के कामकाज पर सवाल उठना कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी कई परियोजनाओं में गुणवत्ता को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। कभी सड़कें पहली बारिश में उखड़ जाती हैं, तो कभी नालियां कुछ ही महीनों में टूटने लगती हैं।
स्विमिंग पूल का यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह एक विशेष सुविधा है, जहां सुरक्षा मानकों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। यहां छोटी सी चूक भी जानलेवा साबित हो सकती है।
जनता के मन में गुस्सा और निराशा
इस घटना के सामने आने के बाद स्थानीय नागरिकों में नाराजगी साफ देखी जा सकती है। लोग सवाल कर रहे हैं कि आखिर उनके टैक्स का पैसा किस तरह खर्च किया जा रहा है। छह करोड़ रुपये जैसी बड़ी राशि खर्च करने के बावजूद अगर परिणाम यह है, तो भविष्य की परियोजनाओं पर भरोसा कैसे किया जाए।
कुछ लोगों का कहना है कि अगर यही हाल रहा, तो बेहतर होगा कि ऐसी परियोजनाओं पर खर्च ही न किया जाए। कम से कम बुनियादी सुविधाओं में तो गुणवत्ता होनी चाहिए।
विशेषज्ञों की राय
निर्माण क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं अक्सर जल्दबाजी और निगरानी की कमी के कारण होती हैं। कई बार उद्घाटन की तारीख तय होने के दबाव में गुणवत्ता से समझौता कर लिया जाता है। परिणामस्वरूप ऐसी खामियां सामने आती हैं।
विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि अगर शुरुआत में ही सही सामग्री और तकनीक का उपयोग किया जाए, तो लागत थोड़ी बढ़ सकती है, लेकिन लंबे समय में रखरखाव का खर्च कम होता है और जनता का भरोसा बना रहता है।
सुधार की जरूरत
यह मामला केवल एक स्विमिंग पूल तक सीमित नहीं है। यह पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करता है। जरूरत इस बात की है कि भविष्य में ऐसी परियोजनाओं के लिए पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जाए।
निर्माण से पहले और बाद में स्वतंत्र गुणवत्ता जांच होनी चाहिए। दोष पाए जाने पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि यह संदेश जाए कि सार्वजनिक धन के साथ लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
विकास बनाम दिखावा
अक्सर विकास कार्यों को केवल दिखावे तक सीमित कर दिया जाता है। उद्घाटन की तस्वीरें, शिलान्यास के कार्यक्रम और प्रचार तो खूब होता है, लेकिन टिकाऊपन पर कम ध्यान दिया जाता है। नेहरू पार्क का यह स्विमिंग पूल इसी मानसिकता का उदाहरण बनकर सामने आया है।
विकास का असली अर्थ तभी पूरा होता है, जब सुविधाएं लंबे समय तक जनता के काम आएं। अगर उद्घाटन से पहले ही तोड़फोड़ करनी पड़े, तो यह विकास नहीं, बल्कि संसाधनों की बर्बादी है।
आगे क्या
अब सवाल यह है कि आगे क्या होगा। क्या स्विमिंग पूल को दोबारा उसी गुणवत्ता से बनाया जाएगा, जिसकी शुरुआत में बात की गई थी। क्या इस बार निगरानी सख्त होगी। और सबसे अहम, क्या इस पूरे मामले की जिम्मेदारी तय होगी।
शहर के लोग उम्मीद कर रहे हैं कि यह मामला केवल खबर बनकर न रह जाए, बल्कि इससे सबक लिया जाए। ताकि भविष्य में कोई भी सार्वजनिक परियोजना इस तरह की शर्मनाक स्थिति का शिकार न बने।
निष्कर्ष
नेहरू पार्क का छह करोड़ रुपये का स्विमिंग पूल इंदौर नगर निगम की कार्यप्रणाली का आईना बन गया है। उद्घाटन से पहले ही फर्श का उखड़ना इस बात का संकेत है कि विकास के दावों और जमीनी हकीकत में अभी भी बड़ा अंतर है।
अगर समय रहते जवाबदेही तय नहीं की गई, तो ऐसे चमत्कार बार-बार सामने आते रहेंगे। और तब विकास केवल एक शब्द बनकर रह जाएगा, जिसका जनता की जिंदगी से कोई वास्तविक संबंध नहीं होगा।
