भारत की दिग्गज आईटी कंपनी इंफोसिस एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है, लेकिन इस बार वजह न तो किसी बड़े अधिग्रहण की घोषणा है, न ही तिमाही नतीजों का उतार-चढ़ाव। इस बार चर्चा का कारण है कंपनी द्वारा अपने तीन लाख से अधिक कर्मचारियों से की गई एक असामान्य मांग। इंफोसिस ने अपने कर्मचारियों से उनके घर के बिजली बिल साझा करने को कहा है। यह मांग सुनते ही सोशल मीडिया से लेकर कॉरपोरेट गलियारों तक बहस छिड़ गई। कई लोगों ने इसे कर्मचारियों की निजता से जोड़कर देखा, तो कुछ ने इसे पर्यावरणीय जिम्मेदारी की दिशा में एक नया प्रयोग बताया।

इंफोसिस की पहचान और बदलता कार्य-संस्कृति परिदृश्य
नारायण मूर्ति द्वारा स्थापित इंफोसिस न केवल भारत बल्कि वैश्विक आईटी उद्योग में अनुशासन, पारदर्शिता और कॉरपोरेट गवर्नेंस का प्रतीक रही है। कंपनी ने दशकों तक काम के पारंपरिक मॉडल को अपनाया, जहां कर्मचारी ऑफिस से काम करते थे। लेकिन कोविड महामारी के बाद पूरी दुनिया की तरह इंफोसिस को भी अपने वर्क कल्चर में बदलाव करना पड़ा।
वर्क फ्रॉम होम और हाइब्रिड वर्क मॉडल अब अस्थायी व्यवस्था नहीं, बल्कि स्थायी रणनीति बन चुके हैं। इंफोसिस ने भी हाइब्रिड मॉडल अपनाया, जिसके तहत कर्मचारियों को महीने में लगभग दस दिन ऑफिस आना होता है, जबकि बाकी समय वे घर से काम करते हैं।
बिजली बिल मांगने का फैसला कैसे सामने आया?
इसी हाइब्रिड वर्क मॉडल के तहत इंफोसिस ने अपने कर्मचारियों को एक आंतरिक सूचना भेजी, जिसमें उनसे अपने घर का बिजली बिल साझा करने का अनुरोध किया गया। कंपनी ने स्पष्ट किया कि यह कदम किसी भी प्रकार के खर्च की प्रतिपूर्ति या निगरानी के लिए नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य कर्मचारियों के घर से काम करने के दौरान होने वाले ऊर्जा उपयोग और उससे जुड़े पर्यावरणीय प्रभाव को समझना है।
कंपनी अपने कार्बन उत्सर्जन और ऊर्जा खपत से संबंधित आंकड़ों को और अधिक सटीक बनाना चाहती है, ताकि भविष्य की उत्सर्जन रिपोर्टिंग में वास्तविक स्थिति को दर्शाया जा सके।
पर्यावरणीय जिम्मेदारी और कॉरपोरेट रणनीति
इंफोसिस पहले से ही खुद को एक पर्यावरण-संवेदनशील कंपनी के रूप में प्रस्तुत करती रही है। कंपनी ने कई बार अपने कार्बन न्यूट्रल होने की प्रतिबद्धता दोहराई है। लेकिन हाइब्रिड वर्क मॉडल के बाद एक नया सवाल खड़ा हुआ। जब कर्मचारी घर से काम कर रहे हैं, तब ऑफिस की ऊर्जा खपत कम हो रही है, लेकिन घरों में बिजली का उपयोग बढ़ रहा है।
इंफोसिस का मानना है कि यदि वह केवल अपने कार्यालय परिसरों की ऊर्जा खपत को ही मापे, तो वास्तविक कार्बन फुटप्रिंट का सही आकलन नहीं हो पाएगा। इसी अंतर को समझने के लिए कंपनी ने कर्मचारियों से बिजली बिल साझा करने का अनुरोध किया।
कर्मचारियों की प्रतिक्रिया और बढ़ती बहस
जैसे ही यह खबर बाहर आई, कर्मचारियों और आम लोगों के बीच अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ कर्मचारियों ने इसे कंपनी की पर्यावरणीय सोच का हिस्सा बताया और कहा कि यदि इससे ऊर्जा दक्षता बढ़ाने में मदद मिलती है, तो इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
वहीं दूसरी ओर, कई कर्मचारियों और विशेषज्ञों ने इसे निजता का मुद्दा बताया। उनका कहना है कि घर का बिजली बिल किसी व्यक्ति की निजी जानकारी होती है और कंपनी को इसमें दखल नहीं देना चाहिए, चाहे उद्देश्य कितना ही अच्छा क्यों न हो।
क्या यह निगरानी है या सहयोग?
इंफोसिस ने इस बात पर जोर दिया है कि बिजली बिल साझा करना पूरी तरह स्वैच्छिक है और इसका उपयोग केवल सामूहिक डेटा विश्लेषण के लिए किया जाएगा। कंपनी का कहना है कि किसी एक कर्मचारी के व्यक्तिगत बिल का मूल्यांकन नहीं किया जाएगा और न ही इसके आधार पर किसी प्रकार की रैंकिंग या आकलन होगा।
कंपनी का दावा है कि इस डेटा के आधार पर वह कर्मचारियों को ऊर्जा बचत के उपाय सुझा सकेगी और भविष्य में ऐसे हस्तक्षेप विकसित कर सकेगी, जिससे कुल कार्बन उत्सर्जन में कमी लाई जा सके।
हाइब्रिड वर्क मॉडल का व्यापक प्रभाव
हाइब्रिड वर्क मॉडल ने केवल काम करने का तरीका ही नहीं बदला, बल्कि ऊर्जा खपत का पैटर्न भी बदल दिया है। पहले जहां बड़े-बड़े ऑफिस परिसर दिनभर बिजली, एयर कंडीशनिंग और अन्य संसाधनों का उपयोग करते थे, अब वही खपत हजारों घरों में बंट गई है।
इस बदलाव ने कॉरपोरेट कार्बन अकाउंटिंग को जटिल बना दिया है। इंफोसिस जैसी कंपनियां अब यह समझने की कोशिश कर रही हैं कि उनके पर्यावरणीय प्रभाव को कैसे सही तरीके से मापा जाए।
वैश्विक कॉरपोरेट जगत में नया ट्रेंड?
इंफोसिस का यह कदम वैश्विक स्तर पर भी चर्चा का विषय बन सकता है। दुनिया भर की कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां हाइब्रिड और रिमोट वर्क को स्थायी मॉडल के रूप में अपना चुकी हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अन्य कंपनियां भी कर्मचारियों के घरेलू ऊर्जा उपयोग को अपने पर्यावरणीय आकलन में शामिल करेंगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में कॉरपोरेट सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग का दायरा और व्यापक होगा, जिसमें सप्लाई चेन के साथ-साथ कर्मचारियों के कार्य-तरीकों का भी विश्लेषण किया जाएगा।
2026-27 में बड़े पैमाने पर भर्तियों की तैयारी
इसी बीच इंफोसिस ने यह भी संकेत दिया है कि कंपनी 2026-27 के दौरान लगभग 20,000 फ्रेशर्स को नौकरी देने की योजना बना रही है। यह घोषणा ऐसे समय में आई है, जब आईटी सेक्टर में भर्तियों को लेकर अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि इंफोसिस न केवल अपने मौजूदा कर्मचारियों के कार्य मॉडल को बेहतर बनाने पर ध्यान दे रही है, बल्कि भविष्य की कार्यबल रणनीति पर भी काम कर रही है।
निजता बनाम स्थिरता की बहस
इंफोसिस के इस कदम ने एक बड़े सवाल को जन्म दिया है। क्या पर्यावरणीय स्थिरता के नाम पर कंपनियां कर्मचारियों की निजी जानकारी मांग सकती हैं? या फिर उन्हें ऐसे वैकल्पिक तरीके खोजने चाहिए, जिनसे व्यक्तिगत निजता प्रभावित न हो?
यह बहस केवल इंफोसिस तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय में कॉरपोरेट नीतियों और श्रम कानूनों को भी प्रभावित कर सकती है।
निष्कर्ष: एक प्रयोग, जिसके नतीजे दूरगामी हो सकते हैं
इंफोसिस द्वारा कर्मचारियों से बिजली बिल साझा करने की मांग एक ऐसा कदम है, जो परंपरागत कॉरपोरेट सोच से अलग है। इसे कुछ लोग प्रगतिशील और पर्यावरणीय जिम्मेदारी की दिशा में साहसिक प्रयास मान रहे हैं, तो कुछ इसे निजता में दखल के रूप में देख रहे हैं।
यह प्रयोग सफल होता है या विवादों में घिर जाता है, यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन इतना तय है कि इस कदम ने हाइब्रिड वर्क, ऊर्जा खपत और कॉरपोरेट जिम्मेदारी को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है, जो लंबे समय तक चलने वाली है।
