तेहरान की उस रात में अजीब सी खामोशी और डर घुला हुआ था। सड़कों पर सामान्य हलचल कम थी, लेकिन सत्ता के गलियारों में तनाव साफ महसूस किया जा सकता था। ऐसा लग रहा था मानो इतिहास अपने अगले अध्याय की तैयारी कर रहा हो। आधी रात के करीब सैनिकों से भरा एक ट्रक राजधानी की सड़कों पर आगे बढ़ा। उसका मकसद साफ था, ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद मुसद्दिक को गिरफ्तार करना।

लेकिन यह योजना वैसी नहीं चली जैसी इसके रचयिताओं ने सोची थी। प्रधानमंत्री को पहले ही खबर मिल चुकी थी। उनके वफादार अधिकारियों ने सैनिकों को रास्ते में ही पकड़ लिया और उन्हें हिरासत में ले लिया। उस पल ऐसा लगा कि साजिश नाकाम हो गई है और लोकतांत्रिक सरकार बच जाएगी।
मगर यह केवल शुरुआत थी। इस तख्तापलट की जड़ें बहुत गहरी थीं, और इसके पीछे केवल कुछ सैन्य अधिकारी नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ताकतें भी खड़ी थीं। यह कहानी हालिया ईरानी प्रदर्शनों की नहीं, बल्कि 15 अगस्त 1953 की उस रात की है, जिसने ईरान के इतिहास की दिशा बदल दी।
मोहम्मद मुसद्दिक और लोकतांत्रिक उम्मीद
मोहम्मद मुसद्दिक केवल एक प्रधानमंत्री नहीं थे। वे उस दौर में ईरान में लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का प्रतीक बन चुके थे। कानून की पढ़ाई, संवैधानिक सोच और जनता के बीच लोकप्रियता ने उन्हें एक मजबूत नेता बना दिया था।
1951 में जब ईरान की संसद ने तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण के पक्ष में मतदान किया, तो यह फैसला केवल आर्थिक नहीं था। यह ईरानी आत्मसम्मान और संप्रभुता की घोषणा थी। इसी फैसले के सबसे बड़े चेहरे के रूप में मुसद्दिक उभरे और प्रधानमंत्री बने।
उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी उन्हें सराहा। उन्हें दुनिया के प्रभावशाली नेताओं में गिना जाने लगा। लेकिन यही लोकप्रियता और स्वतंत्र नीति आगे चलकर उनके पतन का कारण भी बनी।
ईरानी तेल और विदेशी हितों की टकराहट
इस कहानी की जड़ें 1908 में ईरान में तेल की खोज से जुड़ी हैं। तेल की खोज ने ईरान को रणनीतिक रूप से बेहद अहम बना दिया। उस समय ब्रिटेन ने ईरानी काजार शासक के साथ समझौता कर ‘एंग्लो-पर्शियन ऑयल कंपनी’ के जरिए तेल उत्पादन पर नियंत्रण पा लिया।
इस समझौते के तहत तेल से होने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा ब्रिटेन को जाता था, जबकि ईरान को अपने ही संसाधन से बहुत कम लाभ मिलता था। दशकों तक यह असंतुलन ईरानी जनता के बीच नाराज़गी का कारण बना रहा।
1925 में सत्ता परिवर्तन हुआ और रज़ा शाह पहलवी ने काजार राजवंश को हटाकर पहलवी वंश की नींव रखी। 1941 में सत्ता उनके बेटे मोहम्मद रज़ा पहलवी के हाथों में चली गई। लेकिन तेल के मसले पर विदेशी नियंत्रण बना रहा।
राष्ट्रीयकरण का फैसला और बढ़ता टकराव
1940 के दशक के अंत तक ईरान में ब्रिटिश तेल कंपनी के खिलाफ विरोध तेज़ हो गया। सरकार ने कंपनी का ऑडिट कराने की कोशिश की ताकि विदेशी नियंत्रण कम किया जा सके। लेकिन कंपनी ने सहयोग से इनकार कर दिया।
इस टकराव का नतीजा 1951 में सामने आया, जब ईरानी संसद ने तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण का कानून पास किया। यह फैसला ब्रिटेन के लिए सीधा झटका था। उनकी आर्थिक और रणनीतिक हितों पर खतरा मंडराने लगा।
ब्रिटेन ने पहले कूटनीतिक और आर्थिक दबाव बनाने की कोशिश की। जब यह रास्ता नाकाम रहा, तो गुप्त रणनीतियों का सहारा लिया गया।
अमेरिका का प्रवेश और शीत युद्ध की राजनीति
शुरुआत में अमेरिका ईरान के आंतरिक मामलों में सीधे दखल से बच रहा था। लेकिन शीत युद्ध के माहौल में सोवियत संघ का डर एक बड़ा हथियार बन गया। ब्रिटेन ने यह तर्क दिया कि अगर मुसद्दिक की सरकार बनी रही तो ईरान कम्युनिस्ट प्रभाव में जा सकता है।
हालांकि मुसद्दिक खुले तौर पर कम्युनिज्म के विरोधी थे, लेकिन इस डर को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया। धीरे-धीरे अमेरिका भी इस साजिश में शामिल होता चला गया।
1953 की शुरुआत तक अमेरिकी और ब्रिटिश नेतृत्व इस नतीजे पर पहुंच चुके थे कि मुसद्दिक की सरकार को हटाना उनके हित में है।
ऑपरेशन एजेक्स की रूपरेखा
इस तख्तापलट को अमेरिका ने ‘ऑपरेशन एजेक्स’ और ब्रिटेन ने ‘ऑपरेशन बूट’ नाम दिया। यह केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि इसमें प्रचार, आर्थिक दबाव, राजनीतिक खरीद-फरोख्त और साजिशों का पूरा जाल बुना गया।
सीआईए के वरिष्ठ अधिकारियों ने ईरानी सेना के कुछ जनरलों से संपर्क साधा। शाह समर्थक जनरल फज़लुल्लाह ज़ाहिदी को इस योजना का चेहरा बनाया गया।
योजना के मुताबिक, देश में अराजकता फैलाई जानी थी। जब हालात बिगड़ते, तो शाह शाही फरमान जारी कर मुसद्दिक को बर्खास्त करते और ज़ाहिदी को प्रधानमंत्री नियुक्त कर देते।
हिचकिचाता शाह और दबाव की राजनीति
इस पूरी योजना में सबसे कमजोर कड़ी खुद शाह थे। युवा शाह स्वभाव से अनिश्चित और डरे हुए थे। उन्हें ब्रिटिश साजिशों से डर लगता था और वे खुलकर कदम उठाने से बचते रहे।
उनकी जुड़वां बहन अशरफ़ पहलवी को भी इस खेल में शामिल किया गया। उनसे कहा गया कि वे अपने भाई को मनाएं। आर्थिक मदद और समर्थन का वादा किया गया।
अशरफ़ की ईरान वापसी ने माहौल और गरमा दिया। मुसद्दिक समर्थक हलकों में इसका विरोध हुआ। शाह पहले नाराज़ हुए, लेकिन अंततः दबाव के आगे झुकते चले गए।
पहली नाकामी और सत्ता का भ्रम
15 अगस्त 1953 की रात तख्तापलट की पहली कोशिश हुई। लेकिन योजना लीक हो गई। मुसद्दिक के वफादार अधिकारियों ने समय रहते कदम उठाया और बगावत को नाकाम कर दिया।
अगली सुबह रेडियो पर घोषणा हुई कि सरकार के खिलाफ साजिश विफल हो गई है। यह खबर सुनकर लगा कि लोकतंत्र जीत गया है।
अमेरिकी दूतावास में बैठे अधिकारी भी असमंजस में थे। उन्हें साफ नहीं पता था कि आगे क्या होगा। शाह देश छोड़कर भाग चुके थे और बगदाद पहुंच गए थे।
उम्मीद की आखिरी किरण और दूसरा प्रयास
पहली नाकामी के बावजूद साजिशकर्ता पीछे नहीं हटे। करमिट रूज़वेल्ट और जनरल ज़ाहिदी ने तय किया कि अगर जनता को यह यकीन दिला दिया जाए कि शाह ने फरमान जारी कर दिए हैं, तो खेल पलट सकता है।
प्रचार तेज़ किया गया। अफवाहें फैलाई गईं। अखबारों में खबरें छपवाई गईं कि शाह ने मुसद्दिक को बर्खास्त कर दिया है।
17 अगस्त को शाह ने बगदाद से फरमान जारी करने की घोषणा कर दी। यह पल निर्णायक साबित हुआ।
19 अगस्त: इतिहास का निर्णायक दिन
19 अगस्त की सुबह तेहरान की सड़कों पर माहौल बदल चुका था। शाह समर्थक भीड़ निकल आई। उन्हें नेतृत्व मिला और धीरे-धीरे सरकारी संस्थानों पर कब्जा होने लगा।
रेडियो स्टेशन, पुलिस मुख्यालय और मंत्रालय एक-एक करके गिरते चले गए। टैंकों की आवाज़ ने राजधानी की शांति तोड़ दी।
दोपहर तक तस्वीर साफ हो चुकी थी। मुसद्दिक की सरकार गिर चुकी थी। जनरल ज़ाहिदी ने सत्ता संभाल ली।
मुसद्दिक का पतन और बाद का दौर
मोहम्मद मुसद्दिक को गिरफ्तार किया गया। उन पर मुकदमा चला। शुरुआत में मौत की सजा सुनाई गई, लेकिन बाद में इसे तीन साल की कैद में बदल दिया गया। इसके बाद वे जीवन भर नजरबंद रहे।
1967 में उनकी मौत हो गई, लेकिन उनकी कहानी ईरान की राजनीतिक स्मृति में हमेशा जिंदा रही।
तख्तापलट की विरासत
1953 का तख्तापलट केवल एक सरकार का पतन नहीं था। इसने ईरान में शाह की निरंकुश सत्ता की नींव रखी, जो 1979 की क्रांति तक चली।
इस घटना ने ईरानी जनता के मन में अमेरिका और ब्रिटेन के प्रति गहरा अविश्वास पैदा किया। आज भी ईरान-अमेरिका संबंधों में उस दौर की छाया देखी जा सकती है।
निष्कर्ष
1953 में ईरान में हुआ तख्तापलट इतिहास की उन घटनाओं में से एक है, जिसने मध्य पूर्व की राजनीति को दशकों तक प्रभावित किया। यह कहानी सत्ता, तेल, विदेशी हस्तक्षेप और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के टकराव की कहानी है।
यह याद दिलाती है कि जब किसी देश की जनता की इच्छा के खिलाफ बाहरी ताकतें हस्तक्षेप करती हैं, तो उसके परिणाम पीढ़ियों तक महसूस किए जाते हैं।
