पश्चिम एशिया में भू-राजनीति हमेशा से ही अस्थिरता और शक्ति संतुलन की जटिल जाल में उलझी रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों ने इस क्षेत्र की दिशा को पूरी तरह बदलते देखा है। यमन, जो कभी दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं के अवशेष समेटे हुए शांत भूभाग के रूप में जाना जाता था, अब कई महाशक्तियों की रणनीतियों का केंद्र बन चुका है। इस संघर्ष के बीच अब एक ऐसा मोड़ आ गया है जिसने क्षेत्रीय राजनीति को गहराई से हिला दिया है। हूती विद्रोहियों, जिन्हें हमेशा ईरान का सबसे भरोसेमंद प्रॉक्सी संगठन माना गया, ने अब तेहरान की बात मानने से इनकार कर दिया है। यह बदलाव केवल एक संगठन के फैसले तक सीमित नहीं, बल्कि मध्य पूर्व की पूरी रणनीति को पुनर्गठित कर देने वाला निर्णायक क्षण है।

यमन में ईरान की पकड़ लंबे समय से हूती संगठन के हाथों मजबूत थी। उन्हें हथियार, ड्रोन, मिसाइलें, सैटेलाइट इंटेलिजेंस, फंडिंग—सब मिलता था। बदले में हूती लाल सागर से गुजरने वाले उन जहाजों पर हमला करते थे जिन्हें तेहरान इजराइल समर्थक मानता था। यह व्यवस्था सालों तक बिना किसी विरोध के चलती रही, लेकिन अब हालात ऐसे बदल गए हैं कि हूती नेता ईरानी अधिकारियों की बात सुनने को भी तैयार नहीं। ऐसा लगने लगा है कि यमन, जिसे कभी तेहरान का आखिरी मजबूत किला कहा जाता था, अब धीरे-धीरे उसकी पकड़ से छूटता दिख रहा है।
हूती विद्रोहियों का बदला रुख: क्या तेहरान से दूरी रणनीतिक फैसला है?
तेहरान के खिलाफ हूती विद्रोहियों का यह रवैया अचानक नहीं बदला। इसके पीछे कई परतें हैं। पहले ईरान का एक आदेश काफी था और हूती के लड़ाके तुरंत कार्रवाई कर देते थे। उन्होंने लाल सागर में कई ऐसे जहाजों को निशाना बनाया, जिन्हें वे इजराइल समर्थक मानते थे। लेकिन हाल के दिनों में उनका यह रुख बदल गया। जब ईरान ने पहले की तरह निर्देश देने शुरू किए, तो हूती नेताओं ने उसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।
ईरान के अधिकारियों का कहना है कि हूती का व्यवहार ऐसा है मानो वह कभी तेहरान के संपर्क में रहा ही नहीं। यह कथन क्षेत्रीय विश्लेषकों के लिए भी चौंकाने वाला है, क्योंकि हूती और ईरान का रिश्ता वर्षों से गहराई तक जुड़ा हुआ माना जाता रहा है।
इस बदलाव की एक प्रमुख वजह इजराइल की हालिया रणनीतिक कार्रवाई भी है। इजराइल ने हमास और हिजबुल्लाह जैसे ईरानी समर्थित संगठनों को भारी क्षति पहुंचाई। इन संगठनों का शीर्ष नेतृत्व खत्म कर दिया गया और उनकी सैन्य शक्ति लगभग समाप्त कर दी गई। इसके साथ ही इजराइल ने हूती के दूसरे सबसे बड़े कमांडर को भी निशाना बनाकर मार गिराया। इससे हूती संगठन के भीतर असुरक्षा बढ़ी और उन्होंने महसूस किया कि खुलकर ईरान का साथ देना उनके लिए भारी पड़ सकता है।
यमन की राजनीति में एक नया अध्याय
यमन में हूती विद्रोहियों का उदय वर्ष 2014 में हुआ था जब उन्होंने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया। तब से वे इस देश की सत्ता के बड़े हिस्से पर नियंत्रण बनाए हुए हैं। उन्हें ईरान से लगातार फंडिंग मिलती रही, उनकी सैन्य क्षमताएं बढ़ती रहीं, और ईरान ने उन्हें मध्य पूर्व में अपने सबसे शक्तिशाली प्रॉक्सी समूहों में शामिल कर लिया। लेकिन जैसे-जैसे ईरान अंतरराष्ट्रीय दबावों में कमजोर होता दिखा, हूती ने अपनी रणनीति बदलनी शुरू कर दी।
अमेरिका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कई सटीक हमले करके उसे लगभग निष्क्रिय कर दिया। रूस और चीन, जिन पर तेहरान अपने कठिन समय में भरोसा करता था, अब खुलकर समर्थन देने की स्थिति में नहीं हैं। क्षेत्र में नए गठबंधन बन रहे हैं जिनमें ईरान की भूमिका कमजोर होती जा रही है। हूती इन बदलते समीकरणों को अच्छी तरह समझते हैं। इसलिए वे अब तेहरान की नीतियों को आंख बंदकर मानने की स्थिति में नहीं रहना चाहते।
तेहरान की कूटनीति विफल: हूती को मनाने की कोशिशें जारी
ईरान इस बदलाव को हल्के में नहीं ले रहा। वह जानता है कि यमन उसके लिए केवल एक राजनीतिक मोर्चा नहीं, बल्कि सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इसलिए उसने हूती के शीर्ष नेतृत्व को मनाने की कोशिशें तेज कर दी हैं। ईरान ने कुर्द्स फोर्स के वरिष्ठ कमांडर अब्दोलरेजा शाहलई को यह जिम्मेदारी सौंपी है कि वे हूती विद्रोहियों से संवाद स्थापित करें और उन्हें वापस तेहरान के पक्ष में करें।
इसके अलावा ईरान रिवोल्यूशनरी गार्ड के एक कमांडर को भी सना भेजा गया, लेकिन वहां भी कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला। हूती नेताओं ने उनसे बातचीत तक नहीं की। यह स्थिति ईरान के लिए गहरा झटका है, क्योंकि यह पहली बार है जब उसका कोई प्रॉक्सी संगठन उससे इस तरह खुले तौर पर दूरी बना रहा है।
मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन का बदलता भविष्य
हूती और ईरान के बीच टूटता यह रिश्ता केवल दो समूहों की कहानी नहीं है। इसके व्यापक प्रभाव पूरे मध्य पूर्व में महसूस किए जाएंगे। यमन, सऊदी अरब, इजराइल, अमेरिका और खाड़ी देशों की रणनीतियों में नए मोड़ आएंगे। ईरान की कमजोरी से इस क्षेत्र में नई शक्तियां उभर सकती हैं। वहीं हूती संगठन अपनी सुरक्षा और अस्तित्व को लेकर नई नीति बना रहा है, जिसमें वह प्रत्यक्ष रूप से किसी बड़े देश के प्रभाव में नहीं रहना चाहता।
यह बदलाव भविष्य की राजनीति को ऐसे दिशा में ले जा सकता है जहां यमन का संघर्ष और जटिल हो जाएगा। तेहरान की पकड़ ढीली होने से वहां नए शक्ति समूह उभरेंगे और इससे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ सकती है।
हूती की वर्तमान रणनीति: बचाव या नई दिशा?
हूती विद्रोही इस समय नई रणनीति बना रहे हैं। वे इजराइल के खिलाफ सीधे मोर्चा लेने से बच रहे हैं। उनके पास अब पहले जैसी सैन्य क्षमता नहीं बची और वे नहीं चाहते कि तेहरान का साथ देकर अपने ऊपर भी वही खतरा बुला लें। इजराइल की हाल की कार्रवाई ने उन्हें सावधान कर दिया है। इसलिए अब वे क्षेत्रीय राजनीति में किसी अन्य बड़े संघर्ष का हिस्सा बनने से बचना चाहते हैं।
