बीते कुछ वर्षों में मध्यपूर्वी भू-राजनीति ने एक बार फिर से दुनिया की निगाहें खींची हैं। ईरान और इजरायल के बीच संघर्ष की कहानी केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन से जुड़ी हुई है। इस साल जून में हुए 12 दिन के भीषण सैन्य संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया कि दोनों देशों के बीच तनातनी अब किसी भी समय बड़े युद्ध में बदल सकती है।

इजरायल की आर्मी (IDF) ने हाल ही में दावा किया है कि ईरान ने बड़े पैमाने पर बैलिस्टिक मिसाइलों का उत्पादन फिर से शुरू कर दिया है। इस कदम को इजरायल सरकार ने गंभीर चेतावनी के रूप में लिया है। IDF ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों के माध्यम से संसद में कहा कि जून के संघर्ष के बाद, ईरान ने अपनी मिसाइल उत्पादन क्षमता को तेजी से बहाल किया है।
इससे पहले जून में, इजरायल ने ईरान की मिसाइल फैसिलिटी को निशाना बनाया था। उस हमले का उद्देश्य ईरान की मिसाइल क्षमता को कमजोर करना था। हालांकि, अब हालात बदल चुके हैं और इजरान ने अपनी मिसाइल उत्पादन और परीक्षण क्षमताओं को पहले जैसी स्थिति में ला दिया है।
ईरान की मिसाइल क्षमता और वैश्विक चिंता
ईरानी सैन्य रणनीति में बैलिस्टिक मिसाइलें हमेशा केंद्रीय भूमिका निभाती रही हैं। IDF ने जानकारी दी कि हाल के महीनों में ईरान ने मिसाइलों के उत्पादन को लगातार बढ़ाया है। इसके अलावा, ईरानी नेवी ने फारस की खाड़ी में बड़े पैमाने पर अभ्यास किया है। इस अभ्यास में बैलिस्टिक मिसाइलों के अलावा क्रूज मिसाइल और ड्रोन शामिल हैं।
ईरान ने सार्क देशों के साथ भी सैन्य अभ्यास किया। इन अभ्यासों का उद्देश्य केवल प्रशिक्षण नहीं बल्कि क्षेत्रीय प्रभुत्व और भविष्य के संभावित संघर्षों के लिए तैयारी करना भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान का प्राथमिक फोकस अपनी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को बढ़ाना है, जिससे वह किसी भी भविष्य के संघर्ष में अपने हथियारों को प्रभावी ढंग से तैनात कर सके।
इजरायली अधिकारियों का कहना है कि ईरान पुरानी तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए नए मिसाइल सिस्टम विकसित कर रहा है। भले ही ईरान का परमाणु कार्यक्रम धीमी गति से बढ़ रहा हो, लेकिन बैलिस्टिक मिसाइलों की बहाली उसकी प्रमुख प्राथमिकता बनी हुई है।
जून 2025 का संघर्ष: पीछे की कहानी
इस साल जून में इजरायल और ईरान के बीच सीधे सैन्य टकराव का अनुभव हुआ। 12 दिन के इस संघर्ष में दोनों पक्षों को भारी जन और माल का नुकसान उठाना पड़ा। इजरायल ने हवाई हमले किए, तो ईरान ने जवाब में सैकड़ों मिसाइलें दागीं। इस दौरान, क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गए।
युद्ध के दौरान, इजरायल ने अपनी आर्मी और इंटेलिजेंस नेटवर्क का इस्तेमाल करते हुए ईरानी मिसाइल फैसिलिटी को निशाना बनाया। जवाब में ईरान ने भी पूरे देश में अपनी मिसाइल क्षमताओं को तैनात किया। 24 जून को युद्धविराम हुआ, लेकिन तनाव अभी भी बरकरार है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस संघर्ष ने दोनों देशों की सैन्य रणनीति और तकनीकी क्षमता को पूरी तरह उजागर किया।
वैश्विक रणनीति और सुरक्षा पर असर
ईरान की मिसाइल क्षमता में तेजी से वृद्धि केवल क्षेत्रीय समस्या नहीं है। इसने वैश्विक सुरक्षा चिंताओं को भी बढ़ा दिया है। अमेरिका, यूरोप और कई पश्चिमी देशों ने भी ईरान की मिसाइल बहाली पर चिंता व्यक्त की है। कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक मानते हैं कि ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलें भविष्य में इजरायल के साथ किसी भी संघर्ष में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनकी सरकार इस स्थिति को गंभीरता से ले रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी मिसाइल हमले की स्थिति में जवाबी कार्रवाई के लिए पूरी तैयारी की जा रही है। इस तरह के तनाव से मध्यपूर्व में सैन्य संतुलन और राजनीतिक स्थिरता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
मध्यपूर्व की सुरक्षा पर दीर्घकालिक प्रभाव
विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान और इजरायल के बीच यह तनाव लंबे समय तक क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित करेगा। ईरान द्वारा 2000 मिसाइलों के हमले की योजना ने केवल इजरायल को ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। साथ ही, फारस की खाड़ी, सार्क देशों और पश्चिमी देशों में सैन्य रणनीति और रक्षा बजट में बदलाव की संभावना बढ़ गई है।
इस क्षेत्र में किसी भी छोटे विवाद का प्रभाव वैश्विक तेल मार्केट, आर्थिक और राजनयिक संबंधों पर भी पड़ सकता है। इस कारण से, अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार ईरान-इजरायल तनाव पर निगरानी रख रहा है।
भविष्य की संभावनाएं
यदि ईरान अपनी मिसाइल क्षमता में वृद्धि जारी रखता है, तो इजरायल और उसके पश्चिमी सहयोगियों के लिए यह चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। भविष्य में संभावित टकराव में क्षेत्रीय देशों को भी अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है। वहीं, वैश्विक सुरक्षा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि इस तनाव का समाधान केवल कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय दबाव के माध्यम से ही संभव होगा।
ईरान-इजरायल टकराव ने स्पष्ट कर दिया है कि मध्यपूर्व की सुरक्षा और स्थिरता केवल स्थानीय देशों का मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक शांति के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
