ईरान में एक बार फिर इंटरनेट आज़ादी और सरकारी नियंत्रण के बीच टकराव सामने आया है। देश में चल रहे सरकार विरोधी प्रदर्शनों के बीच ईरानी सरकार ने न सिर्फ पारंपरिक इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगाई, बल्कि अब उन सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं को भी निशाना बनाया है, जिन्हें पूरी दुनिया में सेंसरशिप से बचने का सबसे बड़ा विकल्प माना जाता था। रिपोर्टों के मुताबिक, एलन मस्क की स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट सेवा को ईरान में कथित तौर पर जाम कर दिया गया है। यह पहली बार है जब स्टारलिंक के नेटवर्क को इतने बड़े स्तर पर बाधित होते देखा गया है।

इस घटनाक्रम ने वैश्विक स्तर पर तकनीकी विशेषज्ञों, मानवाधिकार संगठनों और सुरक्षा विश्लेषकों को चौंका दिया है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि ईरान ने यह कैसे किया, बल्कि यह भी है कि क्या इसके पीछे चीन और रूस जैसी तकनीकी और सैन्य ताकतों की मदद शामिल है।
विरोध, सेंसरशिप और डिजिटल सन्नाटा
ईरान में हाल के दिनों में सरकार विरोधी प्रदर्शनों ने एक बार फिर देश की सड़कों को गर्मा दिया है। इन प्रदर्शनों की खबरें दुनिया तक न पहुंचें, इसके लिए ईरानी सरकार ने 8 जनवरी को बड़े पैमाने पर इंटरनेट सेवाएं बंद कर दीं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, मैसेजिंग ऐप्स और यहां तक कि इंटरनेशनल कॉलिंग तक प्रभावित हो गई।
इस डिजिटल सन्नाटे ने आम नागरिकों को बाहरी दुनिया से लगभग काट दिया। ऐसे हालात में लोगों ने पारंपरिक इंटरनेट के विकल्प तलाशने शुरू किए और यहीं पर स्टारलिंक एक उम्मीद की किरण बनकर उभरा।
स्टारलिंक बना जनता की डिजिटल सांस
एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक दुनिया भर में सैटेलाइट के जरिए हाई-स्पीड इंटरनेट उपलब्ध कराती है। इसके सिग्नल सीधे अंतरिक्ष से धरती तक आते हैं, जिससे इन्हें स्थानीय टेलीकॉम नेटवर्क या सरकारी फाइबर इंफ्रास्ट्रक्चर से नियंत्रित करना बेहद मुश्किल माना जाता है।
ईरान में जब इंटरनेट बंद हुआ, तब बड़ी संख्या में लोगों ने स्टारलिंक टर्मिनल्स के जरिए ऑनलाइन रहने की कोशिश की। यह सरकार के लिए एक नई चुनौती थी, क्योंकि अब तक ऐसा माना जाता था कि स्टारलिंक को पूरी तरह ब्लॉक करना लगभग नामुमकिन है।
अचानक जाम हुआ स्टारलिंक नेटवर्क
रिपोर्टों के अनुसार, ईरान की सरकार ने अब स्टारलिंक के सिग्नलों को भी जाम करना शुरू कर दिया है। जानकारों का कहना है कि यह आउटेज सामान्य तकनीकी खराबी नहीं है, बल्कि जानबूझकर किया गया हस्तक्षेप है। शुरुआती दौर में स्टारलिंक के लगभग 30 प्रतिशत अपलिंक और डाउनलिंक ट्रैफिक पर असर पड़ा, यानी हर 100 में से 30 यूजर्स इंटरनेट इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे।
स्थिति यहीं नहीं रुकी। कुछ ही समय में यह आउटेज 80 प्रतिशत तक पहुंच गया, जिससे स्टारलिंक पर निर्भर अधिकांश यूजर्स पूरी तरह ऑफलाइन हो गए।
‘किल स्विच’ का दावा और सैन्य तकनीक की चर्चा
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा ‘किल स्विच’ शब्द की हो रही है। रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान ने मिलिट्री-ग्रेड जैमिंग उपकरणों का इस्तेमाल किया है, जिन्हें अनौपचारिक रूप से किल स्विच कहा जा रहा है। इन उपकरणों की मदद से सैटेलाइट से धरती तक आने वाले सिग्नलों को बाधित किया जाता है।
तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की उन्नत जैमिंग तकनीक आमतौर पर सैन्य अभियानों में इस्तेमाल होती है और यह ईरान के पास स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं मानी जाती। यही वजह है कि यह आशंका जताई जा रही है कि ईरान को इस तकनीक के लिए चीन या रूस से मदद मिली हो सकती है।
पहली बार स्टारलिंक पर ऐसा हमला
यह घटना इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि इससे पहले कभी स्टारलिंक के नेटवर्क को इस स्तर पर जाम होते नहीं देखा गया था। यहां तक कि रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे सक्रिय संघर्ष के दौरान भी यूक्रेन में स्टारलिंक की सेवाएं लगातार काम करती रहीं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि ईरान सचमुच स्टारलिंक को प्रभावी रूप से जाम करने में सफल रहा है, तो यह सैटेलाइट इंटरनेट की सुरक्षा और विश्वसनीयता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
इंटरनेट ट्रैफिक लगभग शून्य
तकनीकी निगरानी से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, ईरान में इंटरनेट ट्रैफिक एक समय पर लगभग शून्य तक गिर गया था। इसका मतलब यह है कि देश में पूर्ण इंटरनेट शटडाउन जैसी स्थिति बन गई थी। केवल सोशल मीडिया ही नहीं, बल्कि बैंकिंग, ऑनलाइन सेवाएं और अंतरराष्ट्रीय संपर्क भी बुरी तरह प्रभावित हुए।
एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जब इंटरनेट पूरी तरह बंद हो जाता है, तो वीपीएन जैसी सेवाएं भी बेकार हो जाती हैं, क्योंकि उन्हें काम करने के लिए भी न्यूनतम इंटरनेट कनेक्टिविटी की जरूरत होती है।
‘युद्ध से भी बदतर हालात’
ईरान के एक बिजनेस ग्रुप से जुड़े अमीर रशीदी ने स्थिति को युद्ध से भी बदतर बताया है। उनके अनुसार, देश में ग्लोबल इंटरनेट एक्सेस बेहद सीमित हो गया है और इंटरनेशनल फोन कॉल तक प्रभावित हुई हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने युद्ध के दौर में भी ऐसी डिजिटल घुटन नहीं देखी थी।
यह बयान इस बात को रेखांकित करता है कि इंटरनेट आज सिर्फ मनोरंजन या सोशल मीडिया का माध्यम नहीं, बल्कि आर्थिक गतिविधियों, आपात सेवाओं और वैश्विक संपर्क का आधार बन चुका है।
सरकार बनाम तकनीक की नई जंग
ईरान में जो कुछ हो रहा है, वह केवल एक देश का आंतरिक मामला नहीं रह गया है। यह सरकारों और आधुनिक तकनीक के बीच चल रही उस वैश्विक जंग का हिस्सा है, जिसमें नियंत्रण और स्वतंत्रता आमने-सामने हैं।
स्टारलिंक जैसी सेवाएं उन लोगों के लिए उम्मीद बन चुकी थीं, जो सेंसरशिप और सूचना नियंत्रण से बचना चाहते थे। अगर सरकारें इन्हें भी प्रभावी ढंग से ब्लॉक करने में सक्षम हो जाती हैं, तो डिजिटल आज़ादी की अवधारणा को गहरा झटका लग सकता है।
चीन और रूस की भूमिका पर सवाल
चीन और रूस पहले से ही इंटरनेट नियंत्रण और निगरानी तकनीकों में अग्रणी माने जाते हैं। चीन का ‘ग्रेट फायरवॉल’ और रूस की इंटरनेट संप्रभुता नीति इसके उदाहरण हैं। ऐसे में यह अटकलें तेज हो गई हैं कि ईरान को स्टारलिंक जैमिंग के लिए इन देशों से तकनीकी सहायता मिली हो सकती है।
हालांकि, इस बारे में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इतनी उन्नत जैमिंग क्षमता बिना बाहरी सहयोग के हासिल करना मुश्किल है।
वैश्विक असर और भविष्य की चिंता
इस घटना का असर सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं है। अगर सैटेलाइट इंटरनेट को भी सरकारें बंद करने लगें, तो यह भविष्य में आपात स्थितियों, युद्ध क्षेत्रों और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान संचार व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
यह सवाल भी उठता है कि क्या निजी कंपनियां अपनी सेवाओं को इस तरह के सैन्य हस्तक्षेप से सुरक्षित रख पाएंगी या नहीं।
डिजिटल आज़ादी की कसौटी
ईरान में स्टारलिंक पर हुआ यह कथित हमला डिजिटल आज़ादी की एक बड़ी परीक्षा बनकर सामने आया है। यह दिखाता है कि तकनीक चाहे कितनी भी उन्नत क्यों न हो, राजनीतिक और सैन्य शक्ति के सामने उसकी सीमाएं हो सकती हैं।
harigeet pravaah के अनुसार, यह घटना आने वाले समय में इंटरनेट की प्रकृति, सैटेलाइट संचार और सरकारों की भूमिका पर वैश्विक बहस को और तेज करेगी।
