भारत की कृषि व्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ किसानों के सामने दो बड़े सवाल लगातार खड़े होते जा रहे हैं—पहला, मिट्टी की बिगड़ती गुणवत्ता, और दूसरा, रासायनिक खादों पर बढ़ती निर्भरता। देशभर के किसान इससे परेशान हैं, क्योंकि लंबे समय से लगातार उपयोग में रही रासायनिक उर्वरक मिट्टी की संरचना को कमजोर कर चुकी है। ऐसे समय में एक बार फिर जैविक खेती की ओर वापसी तेज़ी से बढ़ रही है।
इसी बदलाव के केंद्र में है—वर्मी कम्पोस्ट, यानी केंचुओं के माध्यम से तैयार की जाने वाली जैविक खाद। वर्षों से इसका उपयोग होता रहा है, पर अब एक नई खोज ने किसानों के बीच उत्साह की लहर पैदा कर दी है। इस जीव का नाम है—“जय गोपाल”, एक नई प्रजाति का केंचुआ जिसे लेकर कृषि वैज्ञानिक दावा कर रहे हैं कि यह सामान्य केंचुओं की तुलना में कहीं अधिक तेजी से खाद तैयार करेगा।

यह दावा कितना सच है? यह किसानों के जीवन को कैसे बदल सकता है? और वर्मी कम्पोस्ट आखिर इतना खास क्यों है? आइए इस विस्तृत रिपोर्ट में जानते हैं—
जैविक खेती की ओर किसानों की बड़ी वापसी
बीते कुछ वर्षों से भारत में रासायनिक खादों के उपयोग में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। किसान बार-बार जमीन की घटती उर्वरता, फसल के उत्पादन में गिरावट और बढ़ती लागत से निराश हो रहे थे। इसी बीच वर्मी कम्पोस्ट, यानी केंचुओं के माध्यम से बनने वाली खाद, फिर से उनकी पहली पसंद बनती जा रही है।
कई किसान बताते हैं कि रासायनिक खादें फसल को तेज़ी से तो बढ़ाती हैं, लेकिन यह मिट्टी के जैविक गुणों को खत्म कर देती हैं। वहीं वर्मी कम्पोस्ट मिट्टी को जीवंत और पोषक बनाती है। लंबे समय में यह खेती को टिकाऊ बनाता है। इसलिए इसे सिर्फ खाद नहीं, बल्कि “मिट्टी का जीवन” कहा गया है।
कृषि विशेषज्ञ डॉ. रामाकांत सिंह—वर्मी कम्पोस्ट का वैज्ञानिक आधार
रोहतास जिले के कृषि विशेषज्ञ डॉ. रामाकांत सिंह वर्षों से वर्मी कम्पोस्ट पर शोध कर रहे हैं। वह कहते हैं— “जिस तरह इंसानों के लिए दूध संपूर्ण आहार है, उसी तरह फसलों के लिए वर्मी कम्पोस्ट संपूर्ण खाद है।”
उनका कहना है कि यह एक ऐसी जैविक खाद है जिसमें पौधों के लिए आवश्यक सभी 17 पोषक तत्व संतुलित मात्रा में पाए जाते हैं। इसमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश 2.5% तक मौजूद होता है, जो रासायनिक खादों की तुलना में अधिक सुरक्षित और स्थायी होता है।
वर्मी कम्पोस्ट कैसे तैयार होता है?
वर्मी कम्पोस्ट बनाने की प्रक्रिया स्थानीय किसानों के लिए बहुत सरल है। इसमें मुख्य रूप से दो चीजों की आवश्यकता होती है—
- गाय या भैंस के गोबर
- विशेष प्रजाति का केंचुआ
सबसे लोकप्रिय केंचुआ है—आइसिनिया फेटिडा (Eisenia Fetida)| यह प्रजाति तेज़ी से जैविक सामग्री को खाद में परिवर्तित करती है।
• गोबर को पहले थोड़ा सुखाकर ढेर बनाया जाता है।
• फिर इसमें केंचुओं को छोड़ा जाता है।
• 60–70 दिनों में यह पूरा गोबर मुलायम, महीन और काली खाद में बदल जाता है।
खाद को मशीन से छानकर पैक किया जाता है। इसकी बाजार में मांग इतनी ज़्यादा है कि किसान इसे 10 रुपये प्रति किलो तक बेच रहे हैं, जिससे अच्छी अतिरिक्त आमदनी होती है।
नई खोज — “जय गोपाल” प्रजाति पर चल रहा ट्रायल
सबसे बड़ी खबर यही है कि कृषि वैज्ञानिकों ने एक नए केंचुए की प्रजाति “जय गोपाल” पर ट्रायल शुरू किया है। इस प्रजाति की खासियत:
- यह सामान्य केंचुओं की तुलना में 3–4 गुना अधिक तेजी से खाद तैयार कर सकता है।
- यह बदलते मौसम में आसानी से जीवित रह सकता है।
- इसे कम रखरखाव की जरूरत है।
- यह कम जगह में अधिक उत्पादन देता है।
यदि यह ट्रायल सफल रहता है, तो इसके परिणाम भारत की जैविक खाद व्यवस्था को बदल सकते हैं। किसान कम समय में अधिक मात्रा में वर्मी कम्पोस्ट बना सकेंगे, जिससे
✔ खेती की लागत कम होगी
✔ मुनाफा बढ़ेगा
✔ बाजार में जैविक खाद की उपलब्धता बढ़ेगी
मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने का सबसे अच्छा तरीका
डॉ. सिंह बताते हैं कि मिट्टी की स्वास्थ्य बिगड़ने की सबसे बड़ी वजह रासायनिक खादों का अत्यधिक उपयोग है।
नाइट्रोजन आधारित खादें तात्कालिक प्रभाव तो देती हैं, पर मिट्टी की प्राकृतिक बनावट को नुकसान पहुंचाती हैं।
इसके उलट वर्मी कम्पोस्ट के फायदे—
- मिट्टी को मुलायम बनाता है
- जैविक क्रियाओं को सक्रिय करता है
- सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ाता है
- पानी सोखने की क्षमता बढ़ाता है
- फसल की गुणवत्ता और स्वाद बेहतर करता है
इसीलिए इसे “लाइफ फूड फॉर सॉइल” कहा जाता है।
किसानों की आमदनी में नई उम्मीद
किसानों के लिए वर्मी कम्पोस्ट सिर्फ खाद नहीं, बल्कि कमाई का भी जरिया बन चुका है। एक किसान घर पर ही वर्मी यूनिट बनाकर हर महीने आसानी से 5,000–10,000 रुपये तक की आय कर सकता है। कई किसान बताते हैं— “हम पहले सिर्फ रासायनिक खादों पर निर्भर थे। फसल की लागत बढ़ रही थी। अब वर्मी कम्पोस्ट से खर्च भी कम हुआ और आमदनी भी बढ़ी!”
जैविक उत्पादों की बढ़ती मांग
आज शहरों से लेकर ग्रामीण बाजारों तक, लोग जैविक उत्पादों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इनकी मांग तेजी से बढ़ रही है क्योंकि—
• यह अधिक पौष्टिक हैं
• लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं
• इनके स्वाद में प्राकृतिकपन रहता है
• शरीर को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते
इस बढ़ती मांग का सीधा लाभ किसानों को मिल रहा है। जैविक फसलें सामान्य फसलों से 20–40% अधिक कीमत पर बिकती हैं।
भविष्य—वर्मी कम्पोस्ट होगी किसानों की पहली पसंद
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले 5 वर्षों में वर्मी कम्पोस्ट आधारित खेती भारत के कृषि क्षेत्र में क्रांति ला सकती है। यदि “जय गोपाल” प्रजाति के ट्रायल सफल रहे, तो यह बदलाव और भी तेज हो जाएगा। डॉ. सिंह का कहना है— “जैविक खेती ही भविष्य है। मिट्टी तभी बचेगी, किसान तभी बचेगा, फसल तभी टिकाऊ होगी।”
निष्कर्ष—खाद का चयन ही तय करेगा मिट्टी का भविष्य
कहते हैं, खेती सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। और इसका आधार है—मिट्टी। मिट्टी को जिंदा रखने के लिए जरूरी है कि हम सही खाद का इस्तेमाल करें। वर्मी कम्पोस्ट सिर्फ खाद नहीं, एक ऐसी क्रांति है जो किसान, फसल और पर्यावरण—तीनों को सुरक्षित रखती है। और यदि “जय गोपाल” का प्रयोग सफल रहा, तो भारत का कृषि भविष्य और भी उज्ज्वल हो जाएगा।
