जापानी प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने हाल ही में ताइवान को लेकर दिए गए अपने बयान को स्पष्ट करते हुए कहा है कि यह कोई सोची-समझी रणनीति नहीं थी, बल्कि अचानक और उदाहरण स्वरूप दिया गया बयान था। उन्होंने संसद में विपक्षी नेताओं के सवालों के जवाब में कहा कि उनका इरादा किसी विशेष संकट की ओर ध्यान आकर्षित करना नहीं था, बल्कि सत्र को लंबा न करने के उद्देश्य से एक उदाहरण प्रस्तुत किया गया था। यह बयान जापान-चीन संबंधों के बीच पहले से ही बढ़ते तनाव में और जटिलता ला रहा है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके इस बयान का उद्देश्य किसी भी अंतरराष्ट्रीय संकट को बढ़ाना नहीं था। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी सरकार चीन के साथ बातचीत के दरवाजे हमेशा खुले रखेगी और दोनों देशों के बीच स्थिर, सकारात्मक और लाभकारी संबंध बनाने का प्रयास जारी रहेगा। साने ताकाइची ने यह भी कहा कि उनकी दृष्टि पिछली सरकारों की विदेश नीति के अनुरूप ही है, और जापान अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए कूटनीतिक वार्ता करेगा।
संसद में विपक्षी नेता योशीहिको नोडा ने प्रधानमंत्री की टिप्पणियों की आलोचना की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के बयान उनकी सत्ताधारी पार्टी की नीति के अनुरूप नहीं थे। नोडा ने जोर देकर कहा कि सुरक्षा मामलों और आत्मरक्षा बलों की गतिविधियों पर अनियोजित बयान देना संवेदनशील और नासमझी भरा कदम हो सकता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि प्रधानमंत्री की अनजाने में दी गई टिप्पणियों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भ्रम और तनाव पैदा हो सकता है।
चीन-जापान संबंधों में यह विवाद उस समय और भी गहरा गया जब जापानी प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी के बाद बीजिंग की प्रतिक्रिया सामने आई। यह घटना उस मीटिंग के ठीक एक सप्ताह बाद हुई, जिसमें जापानी प्रधानमंत्री और चीनी नेता शी जिनपिंग ने स्थिर और आपसी लाभ वाले संबंध बनाने का वादा किया था। इसके अलावा, हाल ही में जोहान्सबर्ग में जी20 सम्मेलन में दोनों नेताओं के बीच कोई प्रत्यक्ष बातचीत नहीं हुई।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस मामले में प्रतिक्रिया दी। उन्होंने जापानी प्रधानमंत्री के साथ अपनी बातचीत के बारे में कहा कि उन्हें ट्रंप ने चीन और अमेरिका के वर्तमान संबंधों की जानकारी दी और जापानी पीएम को “स्मार्ट और मजबूत” बताते हुए सकारात्मक संबंध बनाए रखने की प्रशंसा की। वहीं, शी जिनपिंग ने भी ट्रंप से बातचीत में ताइवान को लेकर चीन के रुख को स्पष्ट किया।
प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने संसद में अपने बयान का बचाव करते हुए कहा कि उन्होंने केवल उदाहरण के रूप में कुछ बातें साझा कीं। उनका उद्देश्य संसद के बजट सेशन को लंबा होने से रोकना था। उन्होंने यह भी बताया कि कभी-कभी विपक्ष की असंतोषजनक प्रतिक्रिया के कारण पार्लियामेंट्री बातचीत को रोकने की प्रैक्टिस होती रही है।
सांसदों के सवालों और आलोचनाओं के बीच प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट किया कि चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों में सुधार और सहयोग की दिशा में प्रयास जारी रहेंगे। उन्होंने कहा कि जापान अपने राष्ट्रीय हितों का ध्यान रखते हुए, बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से स्थिर और सकारात्मक संबंध स्थापित करेगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने वैश्विक स्तर पर जापान-चीन संबंधों को फिर से बहस का केंद्र बना दिया है। प्रधानमंत्री की टिप्पणी और उसके बाद अमेरिका, चीन और जापान के बीच चल रही बातचीत ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में तनाव की एक नई परत जोड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि जापान की यह रणनीति दीर्घकालीन कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने का प्रयास है, लेकिन तत्कालीन प्रतिक्रियाओं ने इसे जटिल बना दिया है।
सांसदों और जनता के बीच यह विवाद यह दर्शाता है कि वैश्विक राजनीति में हर बयान का गहरा प्रभाव पड़ता है। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि उनकी सरकार चीन के साथ वार्ता के लिए खुले हैं और आगे भी दोनों देशों के बीच सहयोग और संवाद की नीति जारी रखेंगे। उन्होंने यह भी जोर दिया कि जापान अपने राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय सुरक्षा की रक्षा करते हुए संवाद के माध्यम से संबंधों को सुधारने का प्रयास करेगा।
इस मामले से यह भी स्पष्ट हो गया कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अचानक दिए गए बयान और मीडिया में उनके प्रचार से देशों के बीच तनाव पैदा हो सकता है। जापानी प्रधानमंत्री ने इसे पारदर्शिता और संवाद की नीति के साथ संतुलित करने का प्रयास किया है।
