हॉकी भारत की पहचान रही है। दशकों पहले से लेकर आधुनिक युग तक यह खेल देश की आत्मा में बसता रहा है। ओलंपियन दिग्गजों की परंपरा, हॉकी विश्व मंच पर भारत के सुनहरे अध्याय और नई पीढ़ी की उम्मीदों का यह खेल अक्सर भारतीय खेल भावना का प्रतीक भी बन जाता है। जूनियर हॉकी विश्व कप 2025 भी ठीक इसी उम्मीद के साथ खेला गया, जहां युवा भारतीय दल ने शानदार प्रदर्शन करते हुए फाइनल तक पहुंचने की दहलीज छू ली। लेकिन सेमीफाइनल वह मोड़ बन गया, जिसने खिलाड़ियों की भावनाओं, विशेषज्ञों के विश्लेषण और फैंस की उम्मीदों को एक झटके में बदल दिया।

चैंपियन जर्मनी के खिलाफ हुए सेमीफाइनल मुकाबले में भारत को 1-5 से करारी हार मिली। यह न केवल हार थी, बल्कि एक गहरे सवाल का जवाब भी थी कि आखिर बड़े मैच में ऐसा क्या बदल जाता है, जो प्रतिभा जीत में नहीं बदल पाती। इस सवाल का जवाब मैच के बाद टीम के मुख्य कोच पी आर श्रीजेश ने दिया। उन्होंने कहा कि खिलाड़ियों में क्षमता थी, रणनीति थी, लेकिन दबाव बड़ा था और खिलाड़ी उसका सामना नहीं कर सके। यही हार का निर्णायक कारण बना।
शुरुआत उम्मीदों की, अंत निराशा का
सेमीफाइनल की शुरुआत में भारतीय टीम के सामने चुनौती बहुत स्पष्ट थी। जर्मनी पिछले संस्करण की विजेता टीम थी और विश्व हॉकी की बेहतरीन संरचित और तकनीकी टीमों में गिनी जाती है। मैदान में उतरने से पहले ही इस बात को लेकर माहौल स्पष्ट था कि मैच आसान नहीं होगा। भारत को तेज पासिंग, मजबूत डिफेंस और गोल अवसरों पर सटीक पोजिशनिंग के साथ खेलना था।
पहले क्वार्टर तक मुकाबला बराबरी का लग रहा था। जर्मनी ने पहले आक्रमण से दबाव बनाया, लेकिन भारतीय गोलकीपर ने शुरुआती शॉट को शानदार तरीके से रोकते हुए टीम को संभाले रखा। हालांकि, इसी दौरान यह साफ दिखने लगा था कि जर्मनी की फॉरवर्ड लाइन भारतीय सर्कल में लगातार मौजूद रहती है। भारत वही खेल नहीं दिखा पा रहा था, जो लीग मैचों में दिखाया गया था।
दूसरे क्वार्टर में खेल का रुख तेजी से जर्मनी के पक्ष में चला गया। पासिंग की तेजी, विंग से एंट्री और बैक पोस्ट पर खिलाड़ियों की सही मौजूदगी भारत की डिफेंस लाइन को खींच ले गई और गोल अंतर बढ़ता गया।
कोच श्रीजेश की स्पष्ट स्वीकारोक्ति
मैच के बाद भारतीय टीम के मुख्य कोच पीआर श्रीजेश ने बयान दिया कि यह हार केवल मैदान पर कम स्कोर का परिणाम नही थी, बल्कि मानसिक स्तर पर टूटने की भी कहानी थी। उनके अनुसार भारत ने तीन सेमीफाइनल मौके खोए। कई जगह ऐसे अवसर थे, जहां गोल बन सकता था, लेकिन खिलाड़ी निर्णायक क्षण में सटीक निर्णय नहीं ले पाए।
उन्होंने कहा कि,
“हमारी टीम में क्षमता थी, लेकिन बड़े मैच का दबाव इस आयु वर्ग के खिलाड़ियों पर भारी पड़ा। तकनीकी स्तर पर हमारी गलतियाँ हुईं, और हम मानसिक रूप से उस दबाव में स्थिर नहीं रह पाए।”
उन्होंने यह भी बताया कि जर्मनी जैसी टीम पर विजय पाने के लिए मैच की गति को नियंत्रित करना जरूरी था। भारत ने शुरुआती 20-25 मिनट तक संतुलन बनाया, लेकिन उसके बाद टीम हमलों को रोकने में असफल हो गई।
पहला हाफ जहां खेल फिसलना शुरू हुआ
पहले हाफ तक स्कोर 1-3 हो चुका था। जर्मनी तेजी से पेनल्टी कॉर्नर बनाता गया और भारत को पेनल्टी स्ट्रोक तक के हालात देखने पड़े। कई मौकों पर भारतीय सेंटर-बैक लाइन टूट गई और फ्लैंक्स पर जर्मन मिडफील्डर की पकड़ मजबूत होती गई।
भारत ने गोल की कमी पूरा करने की कोशिश की, लेकिन वहां भी दबाव हावी रहा। स्ट्राइकर लाइन दबाव में थी, गेंद पकड़ने की बजाय गोल दागने की जल्दबाज़ी खिलाड़ी करते रहे। वहीं जर्मन खिलाड़ियों में संयम था।
दूसरे हाफ में टूटती उम्मीद
दूसरे हाफ में उम्मीदें जीवित थीं, लेकिन जर्मनी ने जल्दी एक और गोल दागकर मैच का संतुलन पूरी तरह अपनी ओर कर लिया। भारतीय खिलाड़ियों की पासिंग गति कम हुई और स्विच-एंगल में कमी दिखी। राइट और लेफ्ट हाफ पर जर्मनी ने लंबाई और शक्ति से मुकाबले को नियंत्रित किया।
भारत की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि गेंद रखने का समय औसत से भी कम रहा। हॉकी में गेंद पर नियंत्रण मैदान पर प्रभाव का संकेत होता है, लेकिन यहाँ भारत का बॉल-कंट्रोल समय लगभग 30 प्रतिशत तक सिमट गया।
टीम के लिए सीख और भविष्य
युवा खिलाड़ियों के लिए छवि बनाने का यह सही मंच था, और वे सेमीफाइनल तक शानदार खेले। कई खिलाड़ियों ने पूरे टूर्नामेंट में यादगार प्रदर्शन किया। कोच ने स्पष्ट किया कि ये खिलाड़ी भविष्य में निश्चित तौर पर बेहतर प्रदर्शन करेंगे, लेकिन इस हार को भूलने की बजाय स्वीकारना होगा और इसमें छिपा प्रशिक्षण स्तर का मार्ग निकालना होगा।
भारत हॉकी के विकास में पिछले कुछ वर्षों में निवेश को बढ़ा रहा है। जूनियर स्तर पर खिलाड़ियों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण, मानसिक मजबूती, खेल रणनीति और विदेशी माहौल में खेलने का अवसर मिल रहा है। श्रीजेश का कहना है कि यह हार भारत की प्रगति को नहीं रोकती, बल्कि यह एक बहुमूल्य सीख है।
जर्मनी क्यों भारी पड़ा?
जर्मनी की शैली अनुशासन, स्थिरता और गणितीय प्रिसिजन वाली थी। उनकी टीम मानसिक रूप से तैयार थी कि सेमीफाइनल दबाव वाला चरण है। दूसरी ओर भारतीय खिलाड़ियों के लिए इस स्तर पर यह पहला बड़ा मंच था।
जर्मनी ने हर तीसरे मूव को अटैक में बदल दिया। वहीं भारत अपना तीसरा मूव डिफेंस में ही खर्च करता रहा। यही अंतर मैच का मोड़ साबित हुआ।
खास विशेषज्ञ टिप्पणियाँ
पूर्व खिलाड़ियों ने कहा कि टीम तकनीकी रूप से मजबूत है, लेकिन संरचित हॉकी सिस्टम की कमी दिखी। टीम ने हाफ-बैक संयोजन ढीला कर दिया, जिससे विपक्षी फारवर्ड घूमकर अटैक बना पाए।
हार से आगे बढ़ने का सही समय
अब सवाल केवल यह नहीं है कि भारत क्यों हारा। सवाल यह भी है कि भविष्य की योजनाओं में इसे कैसे शामिल किया जाए। आगामी विश्व टूर्नामेंट और एशियाई प्रतिस्पर्धाओं में यह टीम भारत की शक्ति बन सकती है।
