मध्य प्रदेश के नीमच ज़िले के रानपुर गाँव में 2 फरवरी 2026 की दोपहर एक ऐसी घटना हुई जिसने पूरे इलाके को हिला दिया। यहाँ की 55 वर्षीय आंगनबाड़ी सहायिका कंचन बाई ने अपने जीवन को न्योछावर करते हुए लगभग 25 बच्चों की जान बचाई। यह घटना साधारण नहीं थी, बल्कि साहस, निडरता और मानवता का अद्भुत उदाहरण थी।

घटना की पृष्ठभूमि
रानपुर गाँव ज़िला मुख्यालय से लगभग 26 किलोमीटर दूर स्थित है। यह एक छोटा सा गाँव है, जहाँ की जीवनशैली बहुत ही साधारण और ग्रामीण परंपराओं पर आधारित है। गाँव का आंगनबाड़ी केंद्र बच्चों की हँसी, खेल-कूद और शिक्षा का प्रमुख केंद्र है। दो फरवरी की दोपहर, जब आंगनबाड़ी में बच्चे पढ़ाई कर रहे थे और आंगन में खेल रहे थे, तब अचानक चीख-पुकार और अफ़रा-तफ़री का माहौल बन गया।
मधुमक्खियों का हमला
हैंडपंप के पास मौजूद मधुमक्खियों के बड़े छत्ते से अचानक एक झुंड बच्चों की ओर बढ़ा। करीब 20-25 बच्चे उस समय परिसर में मौजूद थे। शिक्षिका गुणसागर जैन ने बताया कि बच्चों की ओर बढ़ती मधुमक्खियों की संख्या ने सभी को भयभीत कर दिया और अफ़रा-तफ़री मच गई। इस भीषण स्थिति को देखते हुए कंचन बाई ने तुरंत बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कदम बढ़ाया।
बच्चों को बचाने की निडर कोशिश
कंचन बाई ने बिना किसी देरी के बच्चों को आंगनबाड़ी के अंदर ले जाना शुरू किया। उन्होंने पहले परिसर में रखी दरियां और कंबल बच्चों के ऊपर डालकर उन्हें बचाया। इसके अलावा, अपनी साड़ी का प्रयोग करते हुए उन्होंने बच्चों को ढककर मधुमक्खियों के डंक से बचाने की कोशिश की। उनके इस साहसी क़दम ने लगभग 25 बच्चों की जान बचा ली। इनमें उनका पोता भी शामिल था।

लेकिन कंचन बाई खुद मधुमक्खियों के डंक सहकर गंभीर रूप से घायल हो गई थीं। उन्हें तुरंत निकटतम अस्पताल, सरवानिया महाराज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। पुलिस अधीक्षक अंकित जायसवाल ने बताया कि कंचन बाई ने बच्चों की जान बचाते हुए अपनी जान गँवा दी।
परिवार और गाँव की प्रतिक्रिया
कंचन बाई के बेटे रवि मेघवाल ने कहा कि उन्हें अपनी मां पर गर्व है। रवि ने बताया कि उनके पिता पिछले कुछ सालों से लकवाग्रस्त हैं और घर की सारी जिम्मेदारी कंचन बाई पर थी। रवि कहते हैं, “मां ने अपने जीवन को बच्चों के लिए समर्पित कर दिया। उनके लिए बच्चे भगवान के रूप में थे और वह उन्हें अपने बच्चों की तरह नहीं, बल्कि आदर और प्रेम से संभालती थीं।”
गांव वाले भी कंचन बाई को सिर्फ़ एक आंगनबाड़ी सहायिका के रूप में नहीं, बल्कि बच्चों के प्रति निष्ठा और भरोसे की प्रतीक मानते थे। सुरेश चंद्र मेघवाल, जिनका बेटा उसी आंगनबाड़ी में पढ़ता है, बताते हैं कि कंचन बाई ने बच्चों को दरियों और चादरों से ढकते हुए खुद मधुमक्खियों के हमले का सामना किया।
ग्रामीणों का अनुभव
कंचन बाई के देवर, दिलीप मेघवाल ने बताया कि जब वह आंगनबाड़ी पहुंचे, कंचन बाई ज़मीन पर गिर गई थीं और उनके शरीर पर कई मधुमक्खियों के डंक लगे हुए थे। बच्चों की चीख-पुकार और अफ़रा-तफ़री के बीच उन्होंने बच्चों को सुरक्षित बाहर लाने का प्रयास किया।
स्वास्थ्य कारण और एनाफ़िलेक्टिक शॉक
डॉक्टर संदीप शर्मा ने बताया कि मधुमक्खियों के हमले में कंचन बाई की मौत एनाफ़िलेक्टिक शॉक के कारण हुई। यह एक गंभीर और जानलेवा एलर्जिक प्रतिक्रिया है जो मधुमक्खियों के डंक से हो सकती है। उन्होंने कहा कि उनकी मौत बच्चों की जान बचाने के प्रयास में हुई।
परिवार की आर्थिक स्थिति और प्रशासन की प्रतिक्रिया
कंचन बाई के घर की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर थी। पति लकवाग्रस्त थे और इलाज में लाखों रुपये खर्च हो चुके थे। गांव के सरपंच लालाराम रावत ने आश्वासन दिया कि परिवार को आर्थिक मदद दी जाएगी और सरकारी स्तर पर भी सहायता की जाएगी।
आंगनबाड़ी और गाँव में सुरक्षा मुद्दे
घटना के बाद गांव में डर का माहौल है। हैंडपंप, जो बच्चों और ग्रामीणों के लिए पानी का मुख्य स्रोत है, के पास मधुमक्खियों का छत्ता होने के कारण लोग वहां जाने से कतराते हैं। रवि मेघवाल ने सरकार से अपील की है कि स्कूल की इमारत सुधारी जाए और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
निष्कर्ष
कंचन बाई की शहादत न केवल बच्चों की जान बचाने की मिसाल है बल्कि मानवता, निष्ठा और साहस का प्रतीक भी है। उनका कार्य हम सभी के लिए प्रेरणा है कि विपरीत परिस्थितियों में भी दूसरों की सुरक्षा और भलाई के लिए अपने जीवन की परवाह किए बिना काम किया जा सकता है। उनके योगदान को हमेशा याद किया जाएगा।
