कर्नाटक की राजनीति अक्सर सुर्खियों में रहती है, लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह से मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच नेतृत्व परिवर्तन को लेकर चर्चा तेज हुई, उसने पूरे राज्य में राजनीतिक माहौल को असाधारण रूप से गर्मा दिया। सत्ता के शीर्ष पर चल रहे इन संकेतों और दावों को लेकर जनता, राजनीतिक विशेषज्ञ और विपक्ष सबकी निगाहें इसी ओर टिक गईं। लेकिन इस तनावपूर्ण पृष्ठभूमि के बाद अचानक आई एक खबर ने राजनीतिक गणित को पलट दिया। शनिवार सुबह दोनों नेताओं की एक घंटा चली ब्रेकफास्ट मीटिंग ने न केवल माहौल बदला बल्कि यह संकेत भी दिया कि कर्नाटक की सत्ता में फिलहाल किसी बड़े उथलपुथल की संभावना नहीं है।

बैठक के बाद उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार का बयान विशेष रूप से चर्चा में रहा। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि उन्हें अपनी सीमा का पूरा ज्ञान है और उनके तथा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बीच किसी भी तरह का मतभेद नहीं है। यह बयान ऐसे समय में आया, जब बीते कुछ सप्ताह से राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें लगातार तेज होती जा रही थीं। नेतृत्व की इस बहस के केंद्र में यही प्रश्न था कि सरकार के आधे कार्यकाल के बाद क्या डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री पद संभालेंगे या सिद्धारमैया अपना कार्यकाल पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे।
हालांकि शिवकुमार का दावा कि वह पार्टी अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री के रूप में अपनी भूमिका स्पष्ट रूप से समझते हैं, राजनीतिक संदेशों से भरा हुआ था। उन्होंने कहा कि राज्य की राजनीति में किसी तरह का भ्रम पैदा न हो, इसलिए यह स्पष्ट करना जरूरी था कि उनके और मुख्यमंत्री के बीच कोई खटास नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि उनका एकमात्र लक्ष्य 2028 के विधानसभा चुनावों की रणनीति तैयार करना है और वही पार्टी की शीर्ष प्राथमिकता है।
बेंगलुरु में मीडिया से बातचीत के दौरान डीके शिवकुमार ने बेहद संयमित और संतुलित स्वर में कहा कि पार्टी उन्हें जो जिम्मेदारी देती है, वह उसी के अनुसार काम करते हैं। उन्होंने कई बार दोहराया कि सीएम और उनके बीच किसी भी प्रकार का अंतर नहीं है और दोनों मिलकर कर्नाटक की जनता के लिए काम कर रहे हैं। यह बयान अपने आप में उन तमाम अटकलों के जवाब के रूप में देखा जा रहा है, जो यह कह रही थीं कि दोनों नेताओं के बीच रिश्ता तनावपूर्ण हो चुका है।
कर्नाटक की राजनीति में इस विवाद की जड़ 20 नवंबर के बाद और ज्यादा गहरी दिखाई दी, जब सिद्धारमैया सरकार के आधे कार्यकाल का पड़ाव पूरा हुआ। इसी समय यह चर्चा तेजी से फैली कि 2023 में चुनाव जीतने के बाद जो आंतरिक समझौता हुआ था, उसके अनुसार अब मुख्यमंत्री पद का परिवर्तन हो सकता है। कई राजनीतिक विशेषज्ञों ने यह तर्क दिया कि चुनावों के समय पार्टी नेतृत्व ने डीके शिवकुमार को यह आश्वासन दिया था कि आधे कार्यकाल के बाद सत्ता परिवर्तन पर विचार किया जाएगा। हालांकि आधिकारिक रूप से कभी कोई दस्तावेज या स्पष्ट घोषणा सामने नहीं आई।
इन सबके बीच मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का अपना रुख बहुत साफ और दृढ़ रहा है। उन्होंने कई मौकों पर कहा है कि कर्नाटक के लोगों ने उन्हें पांच साल का जनादेश दिया है और वह इसे पूरा करेंगे। उन्होंने पांच गारंटी योजनाओं का हवाला देते हुए कहा कि वे राज्य के हर वर्ग तक इन वादों को पहुंचाने के संकल्प के साथ काम कर रहे हैं। सिद्धारमैया की इस दृढ़ता ने ही नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों को और अधिक हवा दी, क्योंकि यह किसी भी राजनीतिक संकेत का स्वरूप नहीं था कि वे पद छोड़ने के इच्छुक हैं।
ऐसे माहौल में आयोजित ब्रेकफास्ट मीटिंग को पार्टी के भीतर सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास माना गया। बैठक की तस्वीरों और प्रतिक्रियाओं से यह संकेत मिला कि दोनों नेताओं ने हाईकमान के निर्देशों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। लेकिन विपक्ष ने इस मीटिंग को एक अलग नजरिये से देखा। विपक्षी दलों ने इसे ‘ब्रेकअप पर मेकअप’ बताते हुए व्यंग्य किया। उनका कहना था कि पार्टी सिर्फ दिखावे के लिए एकता दिखा रही है जबकि अंदरुनी मतभेद अब भी खत्म नहीं हुए हैं।
जब शिवकुमार से यह पूछा गया कि क्या इस बैठक के बाद सभी विवाद समाप्त हो गए हैं, तो उन्होंने जवाब दिया कि वे किसी विवाद को मानते ही नहीं। उन्होंने कहा कि उनके और मुख्यमंत्री के बीच आपसी सम्मान और बेहतर तालमेल है। उन्होंने जोर देकर कहा कि वह अपनी जिम्मेदारियों और सीमाओं को समझते हैं, और उनका फोकस राज्य की जनता के लिए दीर्घकालिक योजनाओं को लागू करना है।
शिवकुमार ने यह भी बताया कि पार्टी आने वाले समय में कई मुद्दों पर ऑल पार्टी मीटिंग बुलाने की योजना बना रही है। इससे संकेत मिलता है कि कर्नाटक सरकार कुछ बड़े निर्णयों की तैयारी में जुटी है, जिनमें विपक्ष की सहमति और सहयोग जरूरी होगा।
राज्य की राजनीति में एक और दिलचस्प पहलू यह है कि विभिन्न मठों और धार्मिक संस्थानों के प्रमुख नेताओं ने भी इस विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया है। कर्नाटक की सामाजिक और राजनीतिक संरचना में मठों का प्रभाव काफी मजबूत है, और सत्ता परिवर्तन पर उनके संकेत को भी राजनीतिक विश्लेषक गंभीरता से लेते हैं। इससे माहौल और भी पेचीदा हो गया था, लेकिन ब्रेकफास्ट मीटिंग के बाद कई मठ प्रमुखों ने भी संयम बरतने की अपील की।
इस पूरे घटनाक्रम को समझते समय यह भी ध्यान देना जरूरी है कि कर्नाटक की राजनीति केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का खेल नहीं, बल्कि जातीय संतुलन, क्षेत्रीय समीकरण और संगठनात्मक संरचना का मिश्रण है। डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि सिद्धारमैया ओबीसी वर्ग की बड़ी पहचान हैं। दोनों की अपनी-अपनी मजबूत पकड़ है और दोनों ही पार्टी के लिए महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। ऐसे में पार्टी नेतृत्व के लिए यह संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है।
कई राजनीतिक विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि 2028 और 2029 के चुनावों पर केंद्रित रणनीति के बिना पार्टी के भीतर किसी भी प्रकार की खींचतान नुकसानदायक साबित हो सकती है। शायद इसीलिए शिवकुमार ने यही कहा कि उनका उद्देश्य पार्टी को मजबूत करना और आगामी चुनावों की रणनीति तैयार करना है।
बैठक और बयानों के बावजूद यह कहना अभी भी जल्दबाजी होगा कि कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन की संभावना पूरी तरह खत्म हो गई है। राजनीतिक परिदृश्य कभी स्थिर नहीं रहता और सत्ता के भीतर परिवर्तन अक्सर समय और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि फिलहाल दोनों नेताओं ने सार्वजनिक रूप से एकता का संदेश दिया है और यह पार्टी के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
अगर कर्नाटक की राजनीति आने वाले महीनों में इसी समन्वय के साथ आगे बढ़ती है, तो राज्य की जनता और प्रशासन दोनों ही लाभान्वित होंगे। लेकिन यदि परिस्थितियां फिर बदलती हैं, तो सत्ता का समीकरण एक बार फिर नई दिशा पकड़ सकता है। राज्य की राजनीति में यह उतार-चढ़ाव नया नहीं, बल्कि एक परंपरा जैसा बन चुका है। लेकिन फिलहाल के संकेत बताते हैं कि सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार दोनों ने आने वाले समय के लिए एक समान दिशा में चलने का संकेत दिया है।
