मध्य प्रदेश में वर्षों से शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ बने शिक्षक और कर्मचारी एक बार फिर अपनी पुरानी और जायज़ मांग को लेकर सामने आए हैं। बैतूल जिले में मप्र राज्य कर्मचारी संघ ने जिला शिक्षा अधिकारी को ज्ञापन सौंपकर उन शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए द्वितीय क्रमोन्नति की मांग की है, जिन्होंने शिक्षा विभाग में चौबीस वर्षों की सेवा पूरी कर ली है, लेकिन आज भी पदोन्नति और वेतनमान के लाभ से वंचित हैं।

यह सिर्फ एक ज्ञापन नहीं था, बल्कि उन सैकड़ों कर्मचारियों की आवाज थी, जिन्होंने वर्ष 2001 में नियुक्ति पाने के बाद अपने जीवन के सबसे अहम साल शिक्षा विभाग को समर्पित कर दिए। समय बदला, नीतियां बदलीं, सरकारें बदलीं, लेकिन इन कर्मचारियों की स्थिति जस की तस बनी रही।
नियुक्ति से अब तक का सफर: उम्मीदों से हताशा तक
वर्ष 2001 में जब संविदा, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षकों की नियुक्ति हुई थी, तब इन शिक्षकों के मन में भविष्य को लेकर कई उम्मीदें थीं। उस दौर में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से बड़ी संख्या में नियुक्तियां की गईं। शिक्षकों ने दूर-दराज के गांवों, आदिवासी अंचलों और संसाधनविहीन स्कूलों में जाकर पढ़ाना स्वीकार किया।
समय के साथ कई नीतिगत बदलाव हुए। संविदा से नियमितीकरण की प्रक्रिया चली, नई शिक्षा नीतियां आईं और पदोन्नति के नियम बदले गए। लेकिन एक बड़ा वर्ग ऐसा रहा, जो इन बदलावों के बीच कहीं छूटता चला गया। चौबीस वर्ष की सेवा पूरी करने के बावजूद उन्हें द्वितीय क्रमोन्नति का लाभ नहीं मिला।
द्वितीय क्रमोन्नति का अर्थ और महत्व
द्वितीय क्रमोन्नति केवल वेतन वृद्धि का विषय नहीं है। यह कर्मचारी के अनुभव, सेवा और समर्पण की औपचारिक मान्यता होती है। शिक्षा विभाग में वर्षों से काम कर रहे शिक्षक यह मानते हैं कि जब एक कर्मचारी दो दशक से अधिक समय तक एक ही पद पर काम करता है, तो उसका मनोबल प्रभावित होता है।
क्रमोन्नति न मिलने से आर्थिक नुकसान तो होता ही है, साथ ही सामाजिक और मानसिक दबाव भी बढ़ता है। परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ती हैं, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य की योजनाएं प्रभावित होती हैं। ऐसे में द्वितीय क्रमोन्नति कर्मचारियों के लिए सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि सम्मान का सवाल बन जाती है।
कर्मचारी संघ की पहल: संगठित आवाज का असर
मप्र राज्य कर्मचारी संघ लंबे समय से कर्मचारियों के हितों की बात करता आ रहा है। बैतूल में जिला शिक्षा अधिकारी को सौंपे गए ज्ञापन में संघ ने साफ तौर पर कहा कि वर्ष 2001 में नियुक्त ऐसे सभी शिक्षक, जिन्होंने चौबीस वर्ष की सेवा पूरी कर ली है, उन्हें नियमानुसार द्वितीय क्रमोन्नति दी जानी चाहिए।
संघ का कहना है कि यह मांग किसी नई सुविधा की नहीं, बल्कि पहले से तय नियमों और वादों को लागू करने की है। यदि सरकार और विभाग अपने ही बनाए नियमों का पालन नहीं करेंगे, तो कर्मचारियों का भरोसा सिस्टम से उठ जाएगा।
शिक्षकों की व्यथा: अनुभव का सम्मान नहीं
ज्ञापन सौंपने के दौरान कई शिक्षकों ने अपनी पीड़ा साझा की। उन्होंने बताया कि वर्षों तक उन्होंने संसाधनों की कमी, कम वेतन और अस्थिर सेवा शर्तों के बावजूद बच्चों को शिक्षा दी। कई शिक्षक ऐसे हैं जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत जिस स्कूल से की थी, आज भी वहीं कार्यरत हैं।
उनका अनुभव अब इतना गहरा है कि वे न केवल पढ़ाते हैं, बल्कि स्कूल संचालन, प्रशासनिक काम और सामाजिक समन्वय में भी अहम भूमिका निभाते हैं। बावजूद इसके, जब वे अपने वेतन पर्ची में देखते हैं कि वे अब भी पुराने वेतनमान में अटके हुए हैं, तो निराशा स्वाभाविक है।
शिक्षा व्यवस्था पर असर
शिक्षकों की यह स्थिति केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी शिक्षा व्यवस्था पर पड़ता है। जब अनुभवी शिक्षक खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं, तो उनका उत्साह धीरे-धीरे कम होता है। इसका सीधा असर कक्षा में पढ़ाई की गुणवत्ता पर पड़ता है।
एक प्रेरित शिक्षक ही छात्रों को प्रेरित कर सकता है। यदि शिक्षक आर्थिक और मानसिक दबाव में रहेगा, तो उससे उत्कृष्ट परिणाम की उम्मीद करना कठिन हो जाता है। इस दृष्टि से द्वितीय क्रमोन्नति केवल कर्मचारी हित का मामला नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता से भी जुड़ा हुआ है।
नियम, नीतियां और व्यावहारिक अड़चनें
संघ का कहना है कि द्वितीय क्रमोन्नति से जुड़े नियम स्पष्ट हैं, लेकिन उनके क्रियान्वयन में देरी और अस्पष्टता बनी हुई है। कई बार फाइलें एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक घूमती रहती हैं। कभी बजट का हवाला दिया जाता है, तो कभी प्रक्रिया का।
कर्मचारी यह सवाल उठाते हैं कि जब वेतन और भत्तों पर हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च होते हैं, तो वर्षों से लंबित क्रमोन्नति का मामला क्यों अटका रहता है। क्या अनुभवी कर्मचारियों को उनका हक देना इतना मुश्किल है।
प्रशासन की भूमिका और उम्मीदें
ज्ञापन सौंपने के बाद कर्मचारियों को उम्मीद है कि जिला स्तर से यह मामला उच्च अधिकारियों तक पहुंचेगा। शिक्षा विभाग के अधिकारी भी इस बात से इनकार नहीं करते कि कर्मचारियों की मांग जायज़ है। हालांकि, अंतिम निर्णय शासन स्तर पर होना है।
संघ का मानना है कि यदि प्रशासन सकारात्मक पहल करे और इस मुद्दे को गंभीरता से उठाए, तो समाधान संभव है। कर्मचारियों को अब सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस निर्णय चाहिए।
सामाजिक और पारिवारिक असर
चौबीस वर्षों तक सेवा करने वाला कर्मचारी अब अपने जीवन के उस पड़ाव पर होता है, जहां परिवार की जिम्मेदारियां चरम पर होती हैं। बच्चों की उच्च शिक्षा, विवाह, स्वास्थ्य खर्च और भविष्य की सुरक्षा जैसे मुद्दे सामने होते हैं।
द्वितीय क्रमोन्नति मिलने से वेतन में बढ़ोतरी होती है, जिससे कर्मचारियों को कुछ आर्थिक राहत मिलती है। यह राहत सिर्फ कर्मचारी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरे परिवार को प्रभावित करती है।
संघर्ष की अगली राह
कर्मचारी संघ ने साफ संकेत दिए हैं कि यदि इस मांग पर जल्द निर्णय नहीं लिया गया, तो आगे आंदोलन का रास्ता भी अपनाया जा सकता है। हालांकि, फिलहाल संघ संवाद और प्रक्रिया के जरिए समाधान चाहता है।
संघ का कहना है कि वे टकराव नहीं चाहते, लेकिन वर्षों से लंबित मांग को अनदेखा भी नहीं किया जा सकता। यह संघर्ष सम्मान और अधिकार का है।
निष्कर्ष: सेवा का सम्मान जरूरी
बैतूल में सौंपा गया यह ज्ञापन केवल एक जिले की कहानी नहीं है। यह प्रदेश के उन हजारों शिक्षकों और कर्मचारियों की कहानी है, जिन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा शिक्षा के क्षेत्र में लगा दिया।
यदि समाज को मजबूत बनाना है, तो शिक्षा को मजबूत करना होगा। और शिक्षा को मजबूत करने के लिए शिक्षकों का सम्मान, सुरक्षा और संतोष जरूरी है। द्वितीय क्रमोन्नति इसी दिशा में एक जरूरी कदम है, जिसका इंतजार अब और लंबा नहीं होना चाहिए।
