भारत में एक बार फिर चाइनीज डिवाइसेस और मोबाइल फोन को लेकर गंभीर चिंता सामने आई है।
भारतीय सेना से रिटायर्ड अधिकारी मेजर गौरव आर्य ने हाल ही में एक वीडियो जारी कर देशवासियों को सचेत किया है। उन्होंने स्पष्ट कहा —
“चीन के इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस आपकी जासूसी कर रहे हैं। जिस डिवाइस में भी चीनी टेक्नोलॉजी है, वह सुरक्षित नहीं है।”
यह बयान ऐसे समय में आया है जब दुनिया के कई देश चीन के ‘टेक्नोलॉजिकल ट्रैप’ को लेकर पहले से ही सतर्क हैं।
डेनमार्क और नॉर्वे जैसे विकसित देशों ने भी स्वीकार किया है कि उनकी पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम में लगे चीनी उपकरण रिमोट एक्सेस से कंट्रोल किए जा सकते हैं।

चीन की “रिमोट एक्सेस टेक्नोलॉजी”: तकनीक या जासूसी का जाल?
चीन ने पिछले एक दशक में खुद को तकनीकी सुपरपावर के रूप में स्थापित किया है। लेकिन इस विकास की आड़ में उसने दुनिया भर में ऐसे रिमोट कंट्रोल्ड डिवाइस फैला दिए हैं जो किसी भी देश की सुरक्षा को खतरे में डाल सकते हैं।
डेनमार्क और नॉर्वे का उदाहरण सबसे ताज़ा है।
उन देशों ने पाया कि उनकी इलेक्ट्रिक बसें चीन की कंपनी Yutong द्वारा बनाई गई थीं और उनमें ऐसे सिम कार्ड लगे हैं जिनके जरिए चीन जब चाहे, इन बसों को दूर से बंद (disable) कर सकता है।
यह खुलासा केवल बसों तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि ऐसी ही तकनीक चीन के स्मार्ट टीवी, मोबाइल फोन, CCTV कैमरे, और यहां तक कि ड्रोन में भी इस्तेमाल हो रही है। यानी, एक साधारण उपभोक्ता अनजाने में ही अपनी निजी जानकारियाँ चीन के सर्वर तक पहुँचा रहा है।
मेजर गौरव आर्य की चेतावनी: “अब भी समय है, जाग जाइए भारत”
मेजर गौरव आर्य, जो भारतीय सेना में एक जांबाज़ अधिकारी रहे हैं, ने अपने इंस्टाग्राम वीडियो में साफ कहा:
“डेनमार्क और नॉर्वे को अब जाकर समझ आया कि चीन किस तरह की तकनीक बेच रहा है। लेकिन भारतवासियों, आप कब समझेंगे? अगर आप चीनी मोबाइल या इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस इस्तेमाल कर रहे हैं, तो आपकी जानकारी चीन के पास जा रही है।”
उन्होंने यह भी कहा कि —
“भले ही आपका मोबाइल नोएडा या चेन्नई में असेंबल हुआ हो, अगर उसके अंदर चीनी सॉफ्टवेयर या कंपोनेंट हैं, तो आप सुरक्षित नहीं हैं।”
कैसे होती है जासूसी?
1️⃣ Software Backdoor:
कई बार चीनी कंपनियाँ अपने डिवाइस में ऐसा सॉफ्टवेयर कोड डालती हैं, जो गुपचुप तरीके से डेटा चीन के सर्वर पर भेजता रहता है।
2️⃣ Spy Chips:
कई गैजेट्स में माइक्रो-चिप्स ऐसे बनाए जाते हैं जो लोकेशन, कैमरा डेटा या यूज़र पैटर्न ट्रैक कर सकते हैं।
3️⃣ Remote Access Control:
कुछ डिवाइसों में ‘रिमोट एक्सेस’ की सुविधा होती है, यानी चीन से बैठे-बैठे कोई आपके सिस्टम को बंद, चालू या लॉक कर सकता है।
4️⃣ Cloud Storage Trap:
कई ऐप्स यूज़र डेटा को चीन के क्लाउड सर्वर पर सेव करते हैं, जिससे उपयोगकर्ता की गोपनीयता पूरी तरह खत्म हो जाती है।
क्या भारत में भी ऐसे डिवाइस हैं?
बिलकुल हाँ। भारत में आज लगभग 70% से अधिक मोबाइल डिवाइसों में चीनी हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर का उपयोग होता है।
Xiaomi, Vivo, Oppo, OnePlus, Realme जैसी कंपनियाँ भारतीय बाजार में गहरी पैठ बना चुकी हैं।
भले ही कुछ कंपनियाँ दावा करती हैं कि उनका डेटा भारत में स्टोर किया जाता है, लेकिन कई साइबर एक्सपर्ट्स का कहना है कि “डेटा के एक हिस्से का ट्रांसफर बाहरी सर्वरों पर होता है, जिनमें से अधिकांश चीन से जुड़े हैं।”
चीन की रणनीति क्या है?
चीन की रणनीति को तीन भागों में समझा जा सकता है —
1️⃣ Economic Expansion (आर्थिक विस्तार):
सस्ते डिवाइस देकर बाजार पर कब्ज़ा करना।
2️⃣ Information Capture (जानकारी एकत्र करना):
इन डिवाइसों के माध्यम से डेटा इकट्ठा करना और उसका विश्लेषण करना।
3️⃣ Strategic Control (रणनीतिक नियंत्रण):
रिमोट एक्सेस तकनीक के जरिए भविष्य में दबाव बनाने की क्षमता विकसित करना।
डेनमार्क और नॉर्वे का खुलासा: तकनीक के पीछे खतरा
5 नवंबर 2025 को The Guardian में प्रकाशित रिपोर्ट ने दुनिया को झकझोर दिया। रिपोर्ट में बताया गया कि डेनमार्क की पब्लिक ट्रांसपोर्ट कंपनी Movia के पास 469 इलेक्ट्रिक बसें हैं, जिनमें से 262 Yutong कंपनी की हैं। पिछले हफ्ते कंपनी को पता चला कि ये बसें अगर इंटरनेट से जुड़ी हों, तो इन्हें दूर से बंद किया जा सकता है।
कंपनी के COO ने कहा,
“हमें अब एहसास हुआ है कि हमने चीन की तकनीक पर भरोसा करके बहुत बड़ी गलती की है। यह सिर्फ हमारी बसों की समस्या नहीं है, बल्कि हर उस डिवाइस की है जिसमें चीनी इलेक्ट्रॉनिक्स लगे हों।”
भारत में कितना खतरा?
भारत जैसे विशाल और डिजिटल रूप से जुड़ते देश के लिए यह खतरा कहीं अधिक बड़ा है।
यहां करोड़ों लोग चीनी मोबाइल, टीवी, कैमरा और स्मार्ट डिवाइस का उपयोग करते हैं।
हर मिनट लाखों GB डेटा इन डिवाइसों के जरिए इंटरनेट पर जाता है।
अगर इनमें से कुछ भी डेटा चीन के सर्वर तक पहुंचता है, तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बन जाता है।
क्योंकि केवल व्यक्तिगत डेटा ही नहीं, सरकारी कर्मचारियों, रक्षा ठेकेदारों और बिजनेस प्रोफेशनल्स का डेटा भी इसी रास्ते बाहर जा सकता है।
क्या करें आम लोग?
मेजर गौरव आर्य ने नागरिकों से अपील की है —
“अगर आप देशभक्त हैं, तो चीनी डिवाइसों का उपयोग बंद करें। भारतीय या भरोसेमंद अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स को अपनाएं। यह केवल देश की सुरक्षा का नहीं, आपके परिवार की सुरक्षा का भी सवाल है।”
उन्होंने कहा कि भारत को “डेटा स्वतंत्रता” (Data Independence) की दिशा में कदम उठाना चाहिए, जैसे हमने “स्वतंत्र भारत” का सपना साकार किया था।
सरकार और साइबर एजेंसियों की भूमिका
भारत सरकार पहले ही कई चीनी ऐप्स को बैन कर चुकी है, जिनमें TikTok, ShareIt, UC Browser जैसे ऐप शामिल हैं।
पर अब समय है कि यह निगरानी केवल ऐप्स तक सीमित न रहे, बल्कि डिवाइस स्तर पर भी हो।
साइबर सुरक्षा एजेंसियों को चाहिए कि वे विदेशी कंपनियों के सॉफ्टवेयर कोड ऑडिट करें और यह सुनिश्चित करें कि कोई “बैकडोर एंट्री” संभव न हो।
निष्कर्ष: डिजिटल युग में सजगता ही सुरक्षा है
चीन की तकनीक ने भले ही सुविधाएं दी हों, लेकिन अब यह स्पष्ट है कि हर सुविधा की कीमत गोपनीयता से चुकानी पड़ रही है।
मेजर गौरव आर्य का संदेश हमें याद दिलाता है कि —
“हर स्मार्ट डिवाइस स्मार्ट नहीं होता, कुछ हमारे खिलाफ भी काम कर सकते हैं।”
भारत के लिए यह समय केवल डिजिटल प्रगति का नहीं, बल्कि डिजिटल स्वाधीनता का है।
देश के हर नागरिक को सोचना होगा — सस्ता डिवाइस क्या वास्तव में सुरक्षित है?
