पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है और इस बार मुद्दा है मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण, जिसे एसआईआर कहा जा रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस प्रक्रिया को न सिर्फ अलोकतांत्रिक बताया है, बल्कि इसे आम नागरिकों के लिए डर और उत्पीड़न का माध्यम भी करार दिया है। सागर द्वीप में आयोजित एक विशाल जनसभा के दौरान ममता बनर्जी ने साफ शब्दों में ऐलान किया कि राज्य में चल रहे एसआईआर के खिलाफ वह सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगी। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि लोगों के जीवन और सम्मान से जुड़ी हुई लड़ाई है।

सागर द्वीप की उस जनसभा में ममता बनर्जी का स्वर सामान्य राजनीतिक भाषण से कहीं ज्यादा भावुक और आक्रामक नजर आया। उन्होंने कहा कि जब मंगलवार को अदालत खुलेगी, तो वह इस मुद्दे को कानूनी मंच पर ले जाएंगी। मुख्यमंत्री ने यह भी संकेत दिया कि यदि आवश्यकता पड़ी तो वह स्वयं सुप्रीम कोर्ट में एक आम नागरिक के तौर पर अपनी बात रखेंगी। उन्होंने कहा कि वह प्रशिक्षित वकील जरूर हैं, लेकिन इस मामले में वह किसी नेता या वकील के रूप में नहीं, बल्कि एक नागरिक के रूप में बोलना चाहती हैं।
एसआईआर को लेकर ममता बनर्जी का कहना है कि यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया होनी चाहिए थी, लेकिन इसे भय और दबाव का औजार बना दिया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना ठोस और वैध कारणों के हजारों लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं। उनका दावा है कि इस प्रक्रिया ने विधानसभा चुनावों से पहले आम जनता के मन में डर पैदा कर दिया है। लोग आशंकित हैं कि कहीं उनका लोकतांत्रिक अधिकार उनसे छिन न जाए।
मुख्यमंत्री ने विशेष तौर पर बुजुर्गों, गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों और गर्भवती महिलाओं की स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि इन लोगों को यह साबित करने के लिए घंटों लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है कि वे वैध मतदाता हैं। ममता बनर्जी ने इसे अमानवीय करार देते हुए कहा कि यह प्रक्रिया संवेदनहीन प्रशासन का उदाहरण बन चुकी है।
सागर द्वीप में दिए गए अपने भाषण के दौरान ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने बिना नाम लिए मुख्य चुनाव आयुक्त पर निशाना साधते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल कोई डिटेंशन कैंप नहीं है। मुख्यमंत्री ने कहा कि यहां के लोग अपने अधिकारों के लिए डराकर चुप नहीं कराए जा सकते। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य का हर नागरिक चाहता है कि उसका नाम मतदाता सूची में बना रहे और इसके लिए उसे अपमानजनक प्रक्रिया से गुजरने को मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
ममता बनर्जी ने सवाल उठाया कि यदि किसी राजनीतिक दल के नेताओं के बुजुर्ग माता-पिता को पहचान साबित करने के लिए घंटों लाइन में खड़ा कर दिया जाए, तो उन्हें कैसा लगेगा। उन्होंने कहा कि आम लोगों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया जा रहा है। मुख्यमंत्री के अनुसार, एसआईआर की वजह से कई लोग मानसिक तनाव में आ गए हैं और इसी डर के चलते कई लोगों की जान चली गई है, जबकि कई अन्य अस्पतालों में भर्ती हैं।
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि वह अदालत में केवल कागजों के आधार पर नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत दिखाने की कोशिश करेंगी। उन्होंने कहा कि वह अपनी आंखों से देखी गई स्थिति को कोर्ट के सामने रखेंगी ताकि न्यायपालिका को यह समझाया जा सके कि एसआईआर के नाम पर क्या हो रहा है। ममता बनर्जी ने इसे लोकतंत्र की आत्मा पर हमला बताया और कहा कि अगर समय रहते इस पर रोक नहीं लगी तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
टीएमसी प्रमुख ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी इस मुद्दे पर पूरी तरह एकजुट है और कानूनी लड़ाई पूरी मजबूती से लड़ी जाएगी। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई किसी एक दल की नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की है जो अपने मताधिकार को लेकर चिंतित हैं। ममता ने यह भी आरोप लगाया कि प्रशासनिक मशीनरी का इस्तेमाल लोगों को डराने और दबाने के लिए किया जा रहा है, जो किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।
ममता बनर्जी का यह बयान ऐसे समय पर आया है जब राज्य में राजनीतिक माहौल पहले से ही गर्म है। विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची में संशोधन एक संवेदनशील मुद्दा माना जाता है और इसे लेकर उठ रहे सवालों ने पूरे प्रदेश में चर्चा को तेज कर दिया है। मुख्यमंत्री का सुप्रीम कोर्ट जाने का ऐलान इस विवाद को और बड़ा बना सकता है।
अपने भाषण के अंत में ममता बनर्जी ने जनता से अपील की कि वे डरें नहीं और अपने अधिकारों के लिए जागरूक रहें। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र तभी मजबूत रहेगा जब आम नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए खड़ा होगा। मुख्यमंत्री ने भरोसा दिलाया कि वह इस लड़ाई को अंतिम सांस तक लड़ेंगी और किसी भी कीमत पर बंगाल के लोगों के अधिकारों से समझौता नहीं होने देंगी।
