टैरिफ की दुनिया में उठे इस तूफान की शुरुआत उतनी शांत नहीं थी जितनी सतह पर दिखाई देती है।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बदलते समीकरणों के बीच मेक्सिको ने जो कदम उठाया है, उसने एशियाई बाज़ार और विशेष रूप से भारत के निर्यात क्षेत्र में एक नई बेचैनी पैदा कर दी है। एक ओर घरेलू उत्पादन को मजबूत करने का दावा, दूसरी ओर वैश्विक परिस्थितियों का दबाव, और उनके बीच फंसे करोड़ों डॉलर का कारोबार। मेक्सिको की संसद में पास हुआ यह निर्णय केवल एक आर्थिक बदलाव नहीं, बल्कि व्यापार की दिशा मोड़ने वाला एक निर्णायक क्षण बन गया है।

मेक्सिको ने उन देशों पर 5 से 50 प्रतिशत तक नया टैरिफ बढ़ा दिया है जिनके साथ उसका कोई फ्री ट्रेड एग्रीमेंट नहीं है। भारत, चीन, थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे प्रमुख एशियाई देशों के लिए यह बदलाव बड़े झटके की तरह आया। खासतौर पर भारत, जिसका मेक्सिको से कोई एफटीए नहीं है, अब इस बढ़े हुए शुल्क की मार सीधी अपनी कारोबारी नसों पर महसूस करेगा।
लेकिन इस फैसले के पीछे मेक्सिको की सोच क्या थी?
राष्ट्रपति क्लॉडिया शिनबॉम का मानना है कि घरेलू उद्योगों को मजबूत करना और स्थानीय रोजगार बढ़ाना बेहद जरूरी है। दुनिया भर में मंदी, राजनीतिक तनाव और उत्पादन लागत बढ़ने के बीच मेक्सिको की सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि स्थानीय फैक्ट्रियां और श्रमिक बाहरी प्रतिस्पर्धा से सुरक्षित रहें। यही कारण है कि संसद में पास हुए इस प्रस्ताव ने सरकारी नीतियों को एक नई दिशा दे दी।
भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि मेक्सिको, अमेरिकी महाद्वीप में भारतीय कारों का सबसे बड़ा आयातक है। दक्षिण अफ्रीका और सऊदी अरब के बाद यह भारतीय ऑटो उद्योग के लिए तीसरा सबसे बड़ा बाज़ार है। अब जब टैरिफ 20 प्रतिशत से बढ़ाकर सीधे 50 प्रतिशत कर दिया गया है, भारतीय कंपनियों की चिंताएं स्वाभाविक हैं।
भारत ने वित्त वर्ष 2024-25 में मेक्सिको को 5.3 अरब डॉलर का निर्यात किया था, जिसमें 9000 करोड़ रुपये सिर्फ कारों से जुड़े थे। इसका अर्थ यह है कि लगभग एक अरब डॉलर का कारोबार अब सीधे खतरे में है। विशेष रूप से स्कोडा ऑटो, ह्युंडई, निसान और मारुति सुजुकी जैसी कंपनियां, जो मेक्सिको के लिए छोटी और मध्यम श्रेणी की कारें तैयार करती हैं, अब अपने उत्पादों को पहले की तरह प्रतिस्पर्धी कीमत पर बेच नहीं पाएंगी।
रॉयटर्स की रिपोर्ट और उद्योग जगत की चिंता
अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों के मुताबिक भारतीय ऑटो उद्योग की प्रतिनिधि संस्था SIAM ने भारत सरकार से अनुरोध किया कि वह मेक्सिको से अपील करे कि टैरिफ बढ़ोतरी को भारत पर लागू न किया जाए। कई बैठकों में कार निर्माताओं ने यह भी बताया कि मेक्सिको में बिकने वाली अधिकांश छोटी गाड़ियां विशेष रूप से मेक्सिको के बाज़ार के लिए बनाई जाती हैं, न कि अमेरिका में निर्यात के लिए।
यानी भारतीय कारों की मांग मेक्सिको में इसलिए है क्योंकि वे उस बाजार की जरूरतों के अनुरूप सस्ती और उपयोगी हैं। लेकिन बढ़ा हुआ टैरिफ इन्हें महंगा बना देगा और स्थानीय खरीदारों की पहुंच से बाहर ले जाएगा।
घरेलू राजनीति, अमेरिका का दबाव और चीन को घेरने की रणनीति
मेक्सिको के इस फैसले को वैश्विक राजनीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता। अमेरिका लंबे समय से इस बात से परेशान रहा है कि चीनी कंपनियां मेक्सिको में अपने उत्पादन प्लांट खोलकर अमेरिकी बाज़ार में सस्ते उत्पाद बेच रही हैं। अमेरिका का तर्क है कि चीन मेक्सिको को एक गलियारे की तरह इस्तेमाल कर रहा है ताकि अमेरिकी टैरिफ से बच सके।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सालभर में कई बार मेक्सिको को चेतावनी दी कि वह चीनी उत्पादों पर कड़े कदम उठाए, अन्यथा अमेरिका मेक्सिको से आने वाले सामान पर भारी टैरिफ लगाएगा। इस दबाव ने मेक्सिको को अपनी नीति कठोर बनाने के लिए प्रेरित किया। इसके चलते मेक्सिको ने चीन के खिलाफ 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाकर अमेरिका का संदेश स्पष्ट कर दिया।
लेकिन इस फैसले ने अनजाने में भारत को भी इस दायरे में धकेल दिया।
भारतीय उद्योग अब क्या करेगा?
भारतीय कार कंपनियां पहले ही लागत बढ़ने और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने के कारण दबाव में थीं। अब मेक्सिको का यह कदम उन्हें अपने निर्यात मॉडल पर पुनर्विचार करने को मजबूर करेगा। कई कंपनियां उत्पादन लागत कम करने की कोशिशें तेज करेंगी, कई नई रणनीतियाँ तलाशेंगी, और कुछ शायद मेक्सिको में स्थानीय उत्पादन पर भी विचार करेंगी।
लेकिन ऐसा करना आसान नहीं है। कार उद्योग में निवेश, श्रम, सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें बड़ा पैसा और लंबा समय लगता है।
टैरिफ का असर सिर्फ कारों पर नहीं
मेक्सिको ने कारों के अलावा कपड़ों, मेटल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और घरेलू सामान तक पर नए टैरिफ लगाए हैं। कुल मिलाकर 1400 आइटम इस दायरे में आ गए हैं। इसका सीधा असर भारतीय व्यापारियों, कंपनियों और सप्लाई चेन पर पड़ेगा।
मेक्सिको में महंगाई बढ़ने की आशंका
मेक्सिको के उद्योगपति भी इस फैसले को लेकर चिंतित हैं। उनका कहना है कि इससे उत्पादन लागत बढ़ेगी और घरेलू बाजार में महंगाई बढ़ सकती है। मेक्सिको का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर चीन, भारत और साउथ कोरिया जैसे देशों पर गहरी निर्भरता रखता है, और बढ़ा हुआ टैरिफ उनकी रीढ़ कमजोर कर सकता है।
कुल मिलाकर यह एक ऐसा फैसला है जिसके आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव आने वाले सालों तक महसूस किए जाएंगे।
यह केवल व्यापार बदलने का फैसला नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन का खेल भी है। भारत के लिए यह चुनौती है कि बदलते वैश्विक व्यापार में वह कैसे अपनी स्थिति को, अपनी कंपनियों को और अपने हितों को सुरक्षित रखता है।
