इंदौर, जो मध्य प्रदेश की चिकित्सा शिक्षा का प्रमुख केंद्र माना जाता है, वहीं स्थित एमजीएम मेडिकल कॉलेज इन दिनों सुर्ख़ियों में है। यहाँ सामने आए रैगिंग और मानसिक उत्पीड़न के आरोपों ने प्रशासन, छात्रों और अभिभावकों तक हर किसी की चिंता बढ़ा दी है। मेडिकल क्षेत्र में करियर बनाने आए युवाओं के लिए कॉलेज जीवन का पहला पड़ाव ही जब डर और दबाव से भर जाए, तो प्रश्न उठना लाज़मी है — आखिर मेडिकल संस्थान कितने सुरक्षित हैं?

इंदौर एमजीएम मेडिकल कॉलेज में एक प्रथम वर्ष के छात्र के साथ रैगिंग और शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना के गंभीर आरोप सामने आए। यह मामला न केवल संस्थान बल्कि पूरे प्रदेश की मेडिकल शिक्षा व्यवस्था पर सीधा सवाल खड़ा करता है।
पीड़ित छात्र की पीड़ा — डर, अपमान और मौन की मजबूरी
पीड़ित छात्र ने बताया कि उसे लगातार धमकाया गया, अपने निजी सामान देने को बाध्य किया गया तथा वरिष्ठ छात्रों द्वारा शौचालय साफ करने जैसी अमानवीय हरकतें कराई गईं। ऐसे कृत्य केवल रैगिंग नहीं, मानवाधिकार का भी उल्लंघन हैं।
छात्र ने एंटी-रैगिंग सेल से संपर्क कर शिकायत दर्ज करवाई, जिसके बाद यह मामला कॉलेज प्रशासन के सामने उजागर हुआ। लेकिन यह भी उतना ही चिंताजनक है कि कई अन्य छात्र भी इसी तरह की घटनाओं को सहते हुए डर के कारण चुप रहने को मजबूर हैं।
एंटी-रैगिंग सेल की त्वरित कार्रवाई
शिकायत मिलते ही एंटी रैगिंग सेल ने कॉलेज प्रशासन को तुरंत:
- आरोपियों की पहचान करने के निर्देश
- पीड़ित की सुरक्षा सुनिश्चित करने के आदेश
- रैगिंग में शामिल छात्रों के निलंबन की प्रक्रिया
- संवेदनशीलता बढ़ाने हेतु काउंसलिंग की तैयारी
यह बताया गया कि छात्रों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।
अभिभावकों की चिंता — “मेडिकल कॉलेज भेजा था, यातना गृह नहीं”
मेडिकल जैसे कठिन और मानसिक ऊर्जा मांगने वाले अध्ययन क्षेत्र में यदि छात्र भयभीत रहेगा तो कैसे वह डॉक्टर बनने के योग्य प्रशिक्षण और वातावरण प्राप्त कर पाएगा? अभिभावकों ने प्रशासन से कहा:
“हमने बच्चों को डॉक्टर बनने भेजा है, डर और अपमान झेलने नहीं।”
भारत के मेडिकल कॉलेजों में रैगिंग — एक व्यापक समस्या
यह कोई एकल घटना नहीं है| बल्कि भारत के अधिकांश मेडिकल संस्थानों में रैगिंग एक संरचनात्मक बुराई के रूप में बनी हुई है।
UGC और NMC के नियम:
- रैगिंग पूरी तरह प्रतिबंधित
- दोषी पाए जाने पर कॉलेज से निष्कासन तक
- FIR दर्ज कर गिरफ्तारी की कार्रवाई
इसके बावजूद घटनाएँ लगातार सामने आती हैं, जो बताती हैं कि केवल नियम काफी नहीं — कड़ाई से पालन और आंतरिक सुधार भी आवश्यक है।
जांच से जुड़े सवाल
❓इतनी बड़ी घटना होने के बावजूद कॉलेज प्रशासन को पहले पता क्यों नहीं चला?
❓कैंपस में लगातार निगरानी व्यवस्था क्यों कमजोर?
❓जूनियर्स को डराने-धमकाने की संस्कृति का अंत क्यों नहीं?
ये प्रश्न आज शहर से लेकर विधानसभा तक गूंज रहे हैं।
छात्र संगठनों की प्रतिक्रिया
कई संगठनों ने यह मुद्दा उठाया और चेतावनी दी कि यदि कार्रवाई में ढिलाई बरती गई तो बड़ा आंदोलन किया जाएगा। कुछ छात्रों ने कहा कि यह “डर की परंपरा” बंद होनी चाहिए, जो वर्षों से जारी है।
वरिष्ठ बनने का मतलब जूनियरों को तोड़ना नहीं,
बल्कि उन्हें मार्ग दिखाना है।
कानूनी पहलू और भविष्य की दिशा
सुप्रीम कोर्ट ने रैगिंग को गंभीर दंडनीय अपराध का दर्जा दिया है। किसी भी प्रकार का मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न छात्र का करियर बर्बाद कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है:
✔ काउंसलिंग और ओरिएंटेशन प्रोग्राम को मजबूत किया जाए
✔ CC कैमरा, एंटी रैगिंग वार्डन की सक्रियता बढ़े
✔ रिपोर्टिंग सिस्टम गोपनीय और सरल बनाया जाए
✔ पीड़ित को सुरक्षा और मनोवैज्ञानिक सहायता मिले
केवल दंड ही समाधान नहीं — संवेदनशीलता और जागरूकता भी आवश्यक है।
सवालों के बीच उम्मीद की किरण
जांच तेजी से चल रही है और ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि दोषियों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा। यह घटना आने वाले समय के लिए एक गंभीर चेतावनी है:
📌 मेडिकल शिक्षा में “डर की संस्कृति” समाप्त करने का समय आ गया है।
निष्कर्ष
एमजीएम मेडिकल कॉलेज की यह घटना — केवल एक छात्र के उत्पीड़न की कहानी नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र के सुधार की माँग है। युवाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना — सरकार, प्रशासन और समाज —सबकी जिम्मेदारी है।
