भारतीय खेल इतिहास में कुछ सपने ऐसे होते हैं जो केवल एक खिलाड़ी के नहीं होते, बल्कि पीढ़ियों की स्मृतियों और भावनाओं में बहते रहते हैं। 1960 के रोम ओलंपिक में 400 मीटर की दौड़ के दौरान पदक से बेहद मामूली अंतर से चूक जाना ऐसा ही एक सपना था, जो ‘फ्लाइंग सिख’ मिल्खा सिंह के दिल में जीवनभर टीस बनकर रहा। उस रेस ने उन्हें अमर बना दिया, लेकिन ओलंपिक पदक का खालीपन कभी भर नहीं पाया।

समय बीतता गया, दौड़ की पटरियां बदल गईं, खेल बदले, लेकिन सपना वहीं रहा। यही सपना पहले उनके बेटे जीव मिल्खा सिंह तक पहुंचा और अब परिवार की तीसरी पीढ़ी के सबसे युवा सदस्य हरजय मिल्खा सिंह में नई शक्ल लेकर उभर रहा है।
रोम ओलंपिक की वो दौड़ जिसने इतिहास बदल दिया
1960 का रोम ओलंपिक भारतीय खेलों के लिए उम्मीदों से भरा था। मिल्खा सिंह उस समय भारत के सबसे तेज धावक थे और 400 मीटर फाइनल में उनसे पदक की पूरी उम्मीद थी। लेकिन आखिरी कुछ मीटरों में एक क्षणिक चूक ने इतिहास की दिशा बदल दी। चौथा स्थान मिला, नाम अमर हो गया, लेकिन पदक हाथ से निकल गया।
मिल्खा सिंह ने बाद में कई इंटरव्यू में माना कि ओलंपिक पदक न जीत पाने का दर्द उन्हें जीवनभर सालता रहा। उन्होंने देश को एशियाई खेलों और राष्ट्रमंडल खेलों में गौरव दिलाया, लेकिन रोम की उस रेस का खालीपन कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
पिता की टीस, बेटे की कोशिश
मिल्खा सिंह के बेटे जीव मिल्खा सिंह जब बड़े हो रहे थे, तब घर में रोम ओलंपिक की बातें अक्सर होती थीं। जीव याद करते हैं कि उनके पिता उस रेस को याद करते हुए भावुक हो जाया करते थे। यह वही भावनात्मक विरासत थी जिसने जीव को खेल के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
जीव ने एथलेटिक्स नहीं, बल्कि गोल्फ को अपना रास्ता चुना। यह एक अलग खेल था, अलग दुनिया थी, लेकिन लक्ष्य वही रहा—अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम ऊंचा करना। जीव मिल्खा सिंह भारत के सबसे सफल पेशेवर गोल्फरों में शामिल हुए। यूरोपियन, एशियन और जापान टूर पर उन्होंने भारत को वैश्विक पहचान दिलाई। 2009 में उनकी विश्व रैंकिंग 28 तक पहुंची, जो किसी भारतीय गोल्फर के लिए बड़ी उपलब्धि थी।
ओलंपिक का मौका जो समय से पहले निकल गया
जीव मिल्खा सिंह का करियर जिस समय शिखर पर था, उस समय गोल्फ ओलंपिक खेलों का हिस्सा नहीं था। 2008-09 में जब वह दुनिया के शीर्ष खिलाड़ियों में गिने जाते थे, तब अगर गोल्फ ओलंपिक में होता तो पदक की दौड़ में उनका नाम सबसे आगे होता।
2016 में जब रियो ओलंपिक में गोल्फ को शामिल किया गया, तब तक जीव का सर्वश्रेष्ठ दौर पीछे छूट चुका था। उन्होंने स्वीकार किया कि यह उनके जीवन के सबसे बड़े ‘क्या होता अगर’ में से एक है। पिता का अधूरा सपना और खुद का छूटा हुआ मौका, दोनों एक साथ उनकी स्मृतियों में बस गए।
2026 की शुरुआत और एक नई उम्मीद
साल 2026 की शुरुआत मिल्खा परिवार के लिए नई ऊर्जा लेकर आई। जीव के बेटे हरजय मिल्खा सिंह ने जूनियर गोल्फ में अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी है। सिर्फ 15 साल की उम्र में हरजय ने 2025 का अंत अंडर-18 कैटेगरी में भारत के नंबर एक खिलाड़ी के रूप में किया।
यह केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी, बल्कि उस सपने की अगली कड़ी थी जो 65 साल पहले रोम के ट्रैक पर अधूरा रह गया था।
दादी के साथ गोल्फ कोर्स से शुरू हुई कहानी
हरजय का गोल्फ से परिचय किसी अकादमी या कड़े प्रशिक्षण से नहीं, बल्कि पारिवारिक स्नेह से हुआ। वह बताते हैं कि उनकी दादी उन्हें पांच साल की उम्र में चंडीगढ़ गोल्फ कोर्स ले जाया करती थीं। उस उम्र में उनके लिए यह एक खेल था, एक समय बिताने का जरिया।
जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, खेल गंभीर होता गया। पिता को लगातार गोल्फ खेलते देखना और परिवार की खेल विरासत को समझना उनके भीतर जुनून बनकर उभरा। करीब तीन साल पहले हरजय को यह एहसास हुआ कि उनके दादा और पिता ने भारतीय खेलों के लिए क्या मायने रखे हैं।
हरजय की सोच और ओलंपिक का सपना
हरजय साफ शब्दों में कहते हैं कि ओलंपिक उनके दिमाग में है। वह जानते हैं कि यह रास्ता लंबा और कठिन है, लेकिन परिवार की विरासत उन्हें हर दिन आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। वह द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता कोच जेसी ग्रेवाल से प्रशिक्षण लेते हैं और विश्व के नंबर एक गोल्फर स्कॉटी शेफ़लर को अपना आदर्श मानते हैं।
उनके पिता जीव मिल्खा सिंह ने उनके विकास के लिए एक स्पष्ट योजना बनाई है। जीव मानते हैं कि तकनीकी प्रशिक्षण से ज्यादा मानसिक मजबूती भविष्य में निर्णायक भूमिका निभाएगी, और सही समय पर वह अपने अनुभव से बेटे का मार्गदर्शन करेंगे।
कोलंबो की जीत और भावनात्मक जुड़ाव
हाल ही में जीव मिल्खा सिंह ने श्रीलंका के रॉयल कोलंबो गोल्फ कोर्स में इंडियन गोल्फ प्रीमियर लीग इनविटेशनल जीतकर 13 साल का खिताबी सूखा खत्म किया। इस जीत का भावनात्मक महत्व भी था, क्योंकि यही वह जगह है जहां उनके माता-पिता की मुलाकात हुई थी।
कोविड के दौरान माता-पिता को खोने के बाद यह उनकी पहली बड़ी जीत थी। उन्होंने ट्रॉफी को चंडीगढ़ स्थित घर में माता-पिता की तस्वीरों के सामने रखा। उसी टूर्नामेंट में हरजय ने भी अपने पिता के साथ खेलते हुए 18वां स्थान हासिल किया, जो उनके लिए सीख और प्रेरणा दोनों था।
घर की दीवारें जो इतिहास और भविष्य कहती हैं
चंडीगढ़ में मिल्खा सिंह के घर की दीवारें मानो तीन पीढ़ियों की कहानी कहती हैं। एक दीवार पर ‘फ्लाइंग सिख’ की रेस की तस्वीरें हैं, दूसरी पर जीव मिल्खा सिंह के गोल्फ खिताबों की झलक। तीसरी दीवार खाली है, जैसे आने वाले भविष्य का इंतजार कर रही हो।
हरजय की मां कुदरत कहती हैं कि यह दीवार उस दिन भरेगी जब हरजय अपनी उपलब्धियों से उसे सजाएगा। परिवार पढ़ाई को लेकर उस पर दबाव नहीं डालता, क्योंकि उनका मानना है कि जुनून के साथ किया गया खेल ही उसे वहां तक पहुंचा सकता है जहां मिल्खा सिंह का सपना अधूरा रह गया था।
निष्कर्ष: खेल बदला, सपना वही
एथलेटिक्स से गोल्फ तक का यह सफर सिर्फ खेलों का बदलाव नहीं है, बल्कि एक अधूरे सपने की निरंतरता है। 1960 में रोम के ट्रैक पर जो सपना छूटा था, वह आज गोल्फ कोर्स पर नई उम्मीद के साथ आगे बढ़ रहा है। मिल्खा सिंह का नाम अब केवल इतिहास नहीं, बल्कि भविष्य की प्रेरणा बन चुका है।
