मध्यप्रदेश के कई घरों में आज भी शाम ढलते ही दरवाज़े आधे खुले छोड़ दिए जाते हैं। यह कोई पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि एक उम्मीद है कि शायद आज वह लौट आए। वर्षों पहले घर से निकली कोई बेटी, बहन या पत्नी, जिसका कोई पता नहीं चला। समय गुजरता गया, चेहरे पर झुर्रियां बढ़ती गईं, लेकिन इंतज़ार की जगह नहीं बदली।

सागर ज़िले के एक साधारण से घर में बैठे एक भाई की आंखें आज भी उसी रात को ढूंढती हैं जब उसकी बहन पास के रिश्तेदार के घर जाने के लिए निकली थी। वह वहां कभी पहुंची ही नहीं। उस दिन के बाद से समय जैसे थम गया। परिवार ने हर दरवाज़ा खटखटाया, हर सूचना के पीछे भागा, लेकिन जवाब सिर्फ खामोशी में मिला।
मां की आंखों में बसा अधूरा सपना
एक मां के लिए बेटी सिर्फ एक रिश्ता नहीं होती, वह उसका विस्तार होती है। सालों बीत जाने के बाद भी जब बेटी का नाम लिया जाता है तो मां की आंखें नम हो जाती हैं। वह कहती हैं कि दुख ऐसा नहीं होता जिसकी आदत पड़ जाए। हर त्योहार, हर खास दिन, हर पसंदीदा व्यंजन उस खाली कुर्सी की याद दिलाता है।
उनका कहना है कि आत्मा रोज़ रोती है, लेकिन समाज और व्यवस्था के सामने आंसू भी थक जाते हैं। उन्हें आज भी यकीन है कि उनकी बेटी कहीं न कहीं ज़िंदा है और एक दिन दरवाज़ा खोलकर घर में दाखिल होगी।
यह सिर्फ एक कहानी नहीं
ऐसी कहानियां मध्यप्रदेश के लगभग हर ज़िले में मिल जाएंगी। यह किसी एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि एक गहरी और डरावनी सामाजिक समस्या की तस्वीर है। आंकड़े बताते हैं कि हजारों लड़कियां और महिलाएं हर साल अचानक गायब हो जाती हैं।
बीते कुछ वर्षों में दर्ज मामलों की संख्या यह दिखाती है कि यह संकट धीरे-धीरे सामान्य मान लिया गया है। हर दिन औसतन दर्जनों महिलाएं और लड़कियां लापता होती हैं, लेकिन कुछ ही मामलों में उनकी खबर वापस परिवार तक पहुंच पाती है।
आंकड़ों के पीछे छिपा सच
आंकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में किशोरियां घर से नाराज़ होकर निकल जाती हैं। कुछ रिश्तेदारों के यहां चली जाती हैं, कुछ प्रेम संबंधों के कारण घर छोड़ देती हैं। लेकिन इन आंकड़ों के पीछे एक सवाल छिपा है कि क्या हर मामला इतना सरल है।
कई बार गरीबी, बेरोज़गारी, पलायन और बेहतर जीवन का सपना लड़कियों को ऐसे जाल में फंसा देता है, जहां से निकलना आसान नहीं होता। शहरों में काम दिलाने का झांसा, शादी का लालच और अच्छे जीवन का वादा उन्हें अंधेरे रास्तों पर ले जाता है।
बालिग महिलाओं की गुमशुदगी और कानून की चुप्पी
एक बड़ा सवाल यह भी है कि जब 18 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाएं लापता होती हैं तो उनके मामलों को कितनी गंभीरता से लिया जाता है। अक्सर यह मान लिया जाता है कि वह अपनी मर्जी से गई होंगी और वापस आ जाएंगी।
ऐसे मामलों में औपचारिक जांच की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। रिपोर्ट दर्ज होती है, लेकिन उसे अपराध की तरह नहीं देखा जाता। इसका नतीजा यह होता है कि शुरुआती समय, जो सबसे महत्वपूर्ण होता है, उसी में लापरवाही हो जाती है।
देरी जो तलाश को मुश्किल बना देती है
कई परिवारों की शिकायत है कि शुरुआत के कुछ घंटों और दिनों में अगर तेज़ी से कार्रवाई हो जाए तो परिणाम अलग हो सकते हैं। लेकिन अक्सर जांच में देरी होती है, संदिग्धों से सख्ती से पूछताछ नहीं होती और तकनीकी साधनों का उपयोग भी सीमित रह जाता है।
समय बीतने के साथ सुराग धुंधले पड़ जाते हैं और केस फाइलों में सिमटकर रह जाता है।
योजनाएं और ज़मीनी हकीकत
राज्य में महिलाओं के नाम पर कई योजनाएं चलाई गईं, जिनका उद्देश्य आर्थिक मदद और सशक्तिकरण बताया गया। इन योजनाओं से कुछ परिवारों को राहत भी मिली, लेकिन सुरक्षा और गुमशुदगी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर ठोस संरचनात्मक सुधार दिखाई नहीं देते।
पुलिस व्यवस्था में निवेश, विशेष जांच इकाइयां, मानव तस्करी पर सख्त निगरानी और उच्च पलायन वाले क्षेत्रों में अतिरिक्त सतर्कता जैसे कदम अब भी अधूरे नजर आते हैं।
सामाजिक कार्यकर्ताओं की चेतावनी
महिलाओं और बच्चों के साथ लंबे समय से काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह समस्या केवल व्यक्तिगत फैसलों की वजह से नहीं है। इसके पीछे गरीबी, असमानता, शिक्षा की कमी, संगठित दलाल नेटवर्क और कमजोर निगरानी तंत्र जिम्मेदार हैं।
उनका कहना है कि जब तक गुमशुदगी के हर मामले को संभावित अपराध मानकर जांच नहीं की जाएगी, तब तक हालात नहीं बदलेंगे।
जब कुछ लौटती हैं, तब भी लड़ाई खत्म नहीं होती
कुछ लड़कियां वापस घर लौट आती हैं, लेकिन उनकी लड़ाई वहीं खत्म नहीं होती। शहरों में बंधुआ मजदूरी, शोषण और हिंसा झेलने के बाद लौटने वाली लड़कियां मानसिक आघात से गुजरती हैं।
परिवार उन्हें वापस तो पा लेते हैं, लेकिन उनके सामान्य जीवन में लौटने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं होती। काउंसलिंग, शिक्षा, रोज़गार और सामाजिक स्वीकार्यता की कमी उन्हें भीतर ही भीतर तोड़ देती है।
पुनर्वास की अधूरी कोशिशें
अगर किसी लड़की को खोज भी लिया जाए, तो उसके बाद पुनर्वास की जिम्मेदारी लगभग परिवार पर छोड़ दी जाती है। सरकारी स्तर पर सहायता सीमित है और दीर्घकालिक निगरानी की व्यवस्था कमजोर है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर पुनर्वास पर ध्यान नहीं दिया गया, तो लौटकर आई लड़कियां भी सुरक्षित भविष्य नहीं बना पाएंगी।
अधूरी फाइलें, अधूरी ज़िंदगियां
हजारों फाइलों में दर्ज नाम, तस्वीरें और विवरण मिलकर एक ऐसी तस्वीर बनाते हैं, जिसे अनदेखा करना आसान नहीं है। हर नाम के पीछे एक परिवार है, एक मां है, एक खाली कमरा है।
हर शाम, हर रात, हर त्योहार उन घरों में एक सवाल गूंजता है कि क्या वह कभी लौटेगी।
