मध्य प्रदेश में सूचना के अधिकार कानून को प्रभावी बनाने की दिशा में एक अहम कदम उठने जा रहा है। राज्य सूचना आयोग में लंबे समय से खाली पड़े पदों को भरने की प्रक्रिया ने अब गति पकड़ ली है। इसकी वजह है सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, जिसने स्पष्ट कर दिया कि यदि समय रहते सूचना आयुक्तों की नियुक्ति नहीं हुई तो सूचना का अधिकार कानून व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी हो जाएगा।

राज्य सूचना आयोग लोकतंत्र का वह स्तंभ है, जिसके जरिए आम नागरिक शासन और प्रशासन से जवाबदेही मांग सकता है। लेकिन पिछले कई महीनों से आयोग में पदों की भारी कमी के चलते यह व्यवस्था चरमराती नजर आ रही थी। अब न्यायपालिका के हस्तक्षेप के बाद राज्य सरकार सक्रिय हुई है और तीन सूचना आयुक्तों की नियुक्ति जल्द किए जाने की तैयारी चल रही है।
आयोग की वर्तमान स्थिति और खाली पदों की गंभीरता
मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग में कुल दस पद स्वीकृत हैं। इनमें एक मुख्य सूचना आयुक्त और नौ सूचना आयुक्तों के पद शामिल हैं। मौजूदा समय में मुख्य सूचना आयुक्त समेत केवल तीन पद भरे हुए हैं, जबकि सात पद रिक्त हैं। इस भारी कमी का सीधा असर आयोग की कार्यप्रणाली पर पड़ा है।
सूचना आयोग में इस समय 23 हजार से अधिक अपीलें और शिकायतें लंबित हैं। ये वे मामले हैं जिनमें आम नागरिकों ने सरकारी विभागों से जानकारी मांगी थी, लेकिन समय पर या संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर आयोग का दरवाजा खटखटाया। पदों की कमी के कारण इन मामलों की सुनवाई समय पर नहीं हो पा रही है, जिससे सूचना के अधिकार की भावना को गहरा आघात पहुंचा है।
सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी और उसका असर
नवंबर और दिसंबर 2025 में हुई सुनवाइयों के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर बेहद कड़ा रुख अपनाया। न्यायालय ने साफ शब्दों में कहा कि यदि राज्य सरकारें सूचना आयुक्तों के पदों को लंबे समय तक खाली रखेंगी तो सूचना का अधिकार अधिनियम केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केवल मध्य प्रदेश के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक चेतावनी के रूप में देखी गई। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि सूचना आयोगों की निष्क्रियता लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। इसी सख्ती का नतीजा है कि मध्य प्रदेश सरकार ने रुकी हुई नियुक्ति प्रक्रिया को दोबारा तेज कर दिया है।
तीन पदों के लिए 219 आवेदन और चयन की प्रक्रिया
राज्य सूचना आयोग में तीन रिक्त पदों के लिए कुल 219 आवेदन प्राप्त हुए हैं। इन सभी आवेदनों का दस्तावेजी सत्यापन पूरा कर लिया गया है। यह प्रक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि सूचना आयुक्त जैसे संवेदनशील पदों पर नियुक्ति में पारदर्शिता और योग्यता दोनों का संतुलन जरूरी होता है।
सूत्रों के मुताबिक, मकर संक्रांति के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए गठित समिति की बैठक बुला सकते हैं। इस समिति में मुख्यमंत्री के साथ एक वरिष्ठ मंत्री और नेता प्रतिपक्ष शामिल होते हैं। समिति द्वारा चुने गए नामों पर अंतिम मुहर लगने के बाद नियुक्ति की औपचारिक प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
पहले से नियुक्त सूचना आयुक्तों का संक्षिप्त परिप्रेक्ष्य
पिछले कुछ वर्षों में आयोग में नियुक्तियां हुई हैं, लेकिन वे संख्या के लिहाज से पर्याप्त नहीं रहीं। मार्च 2024 में कई पद एक साथ रिक्त हो गए थे, जिससे आयोग पर काम का बोझ अचानक बढ़ गया।
10 सितंबर 2024 को मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर सेवानिवृत्त विशेष पुलिस महानिदेशक विजय यादव का चयन किया गया। इसके अलावा शिक्षाविद् उमाशंकर पचौरी, समाजसेवी वंदना गांधी और सेवानिवृत्त न्यायाधीश ओमकार नाथ को सूचना आयुक्त के रूप में नियुक्त किया गया था। इसके बावजूद सात पदों का खाली रहना व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बना रहा।
रुकी हुई प्रक्रिया और अब आई तेजी
प्रदेश में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया लगभग एक साल पहले शुरू हुई थी, लेकिन कुछ प्रशासनिक और नीतिगत कारणों से यह बीच में ही रुक गई थी। समय बीतने के साथ आयोग पर लंबित मामलों का दबाव बढ़ता गया, लेकिन नियुक्तियों को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए गए।
अब सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देशों के बाद यह प्रक्रिया दोबारा पटरी पर लौटती दिख रही है। सरकार के स्तर पर यह स्वीकार किया जा रहा है कि यदि सूचना आयोग को प्रभावी बनाना है तो पदों को खाली नहीं छोड़ा जा सकता।
केवल आयुक्त ही नहीं, स्टाफ की भी भारी कमी
सूचना आयोग की समस्या केवल आयुक्तों तक सीमित नहीं है। आयोग में अधिकारियों और कर्मचारियों के आधे से ज्यादा पद भी खाली पड़े हैं। इनमें उप सचिव, अवर सचिव, निज सचिव, विधि अधिकारी, एसडीओ, निज सहायक, कंप्यूटर ऑपरेटर, प्रोग्रामर, लिपिक और स्टेनो टाइपिस्ट जैसे महत्वपूर्ण पद शामिल हैं।
कुल मिलाकर लगभग 55 पद रिक्त हैं। इसका सीधा असर सुनवाई की गति और आदेशों के क्रियान्वयन पर पड़ रहा है। कई मामलों में तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से फैसलों में देरी हो रही है, जिससे नागरिकों का भरोसा कमजोर हो रहा है।
सूचना का अधिकार अधिनियम और लोकतंत्र की जवाबदेही
सूचना का अधिकार अधिनियम को लागू हुए अब 21 वर्ष हो चुके हैं। यह कानून आम नागरिक को शासन में भागीदारी का अधिकार देता है और सत्ता को जवाबदेह बनाता है। लेकिन जब इसे लागू करने वाली संस्थाएं ही संसाधनों की कमी से जूझें, तो कानून का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
मध्य प्रदेश में सूचना आयोग की मौजूदा स्थिति इस बात का उदाहरण है कि केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसे लागू करने के लिए मजबूत संस्थागत ढांचे की भी जरूरत होती है।
सरकार पर बढ़ता सार्वजनिक दबाव
सूचना आयोग में लंबित मामलों की संख्या और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद सरकार पर सार्वजनिक दबाव भी बढ़ा है। सामाजिक संगठनों और सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि समयबद्ध नियुक्तियां न होने से आम आदमी को नुकसान उठाना पड़ रहा है।
अब जब नियुक्ति प्रक्रिया तेज हुई है, तो उम्मीद की जा रही है कि आने वाले महीनों में आयोग की कार्यक्षमता में सुधार देखने को मिलेगा और लंबित मामलों का निपटारा तेजी से हो सकेगा।
आगे की राह और संभावित असर
यदि तीन नए सूचना आयुक्तों की नियुक्ति समय पर हो जाती है और शेष रिक्त पदों को भी चरणबद्ध तरीके से भरा जाता है, तो राज्य सूचना आयोग एक बार फिर प्रभावी भूमिका निभा सकेगा। इससे न केवल लंबित अपीलों की संख्या घटेगी, बल्कि सरकारी विभागों में पारदर्शिता और जवाबदेही भी बढ़ेगी।
यह पूरा घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि न्यायपालिका की सक्रियता किस तरह प्रशासनिक सुधारों को गति दे सकती है। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि सरकार सुप्रीम कोर्ट की भावना के अनुरूप कितनी तेजी और गंभीरता से आगे कदम बढ़ाती है।
