मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग का कार्यालय इन दिनों केवल एक प्रशासनिक भवन नहीं रह गया है, बल्कि वह हजारों युवाओं की उम्मीदों, आक्रोश और वर्षों से लंबित न्याय की प्रतीकात्मक ज़मीन बन चुका है। इंदौर स्थित एमपीपीएससी कार्यालय के सामने सैकड़ों अभ्यर्थी कड़ाके की ठंड में धरने पर बैठे हैं। दिन ढलने के साथ जब तापमान गिरता है, तब भी उनके हौसले और मांगों की तपिश कम नहीं होती। यह आंदोलन केवल अंकों या पदों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था के खिलाफ एक सामूहिक प्रश्न है, जो वर्षों से युवाओं के भविष्य को अनिश्चितता में झोंकती रही है।

शनिवार रात से शुरू हुआ यह धरना केवल एक प्रतीकात्मक विरोध नहीं है, बल्कि इसे चार दिनों तक चलने वाली ‘न्याय यात्रा-2.0’ का नाम दिया गया है। इस आंदोलन का नेतृत्व नेशनल एजुकेटेड यूथ यूनियन द्वारा किया जा रहा है। हाई कोर्ट इंदौर से अनुमति मिलने के बाद शुरू हुआ यह प्रदर्शन अभ्यर्थियों की उन मांगों को लेकर है, जिन्हें वे लंबे समय से उठाते आ रहे हैं, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिला।
सर्द मौसम, खुले आसमान के नीचे डटे अभ्यर्थी
जनवरी की ठंडी रातें आम तौर पर लोगों को घरों में कैद कर देती हैं, लेकिन एमपीपीएससी कार्यालय के बाहर का दृश्य बिल्कुल अलग है। अभ्यर्थी सड़क किनारे बिस्तर बिछाकर, अलाव जलाकर और एक-दूसरे का हौसला बढ़ाते हुए रातें गुजार रहे हैं। कई युवा अपने साथ कम्बल, गर्म कपड़े और आवश्यक सामान लेकर आए हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि यह लड़ाई कुछ घंटों की नहीं, बल्कि दिनों और शायद हफ्तों की हो सकती है।
धरने पर बैठे अभ्यर्थियों का कहना है कि यह ठंड उनके संघर्ष के सामने कुछ भी नहीं है। उनके अनुसार, वर्षों की तैयारी, आर्थिक तंगी, पारिवारिक दबाव और मानसिक तनाव ने उन्हें पहले ही बहुत कुछ सहने का आदी बना दिया है। अब वे केवल अपने अधिकार और एक पारदर्शी चयन प्रक्रिया की मांग कर रहे हैं।
दिसंबर 2024 के वादे और 13 महीनों का इंतज़ार
अभ्यर्थियों के आक्रोश की जड़ें हालिया घटनाओं में ही नहीं, बल्कि दिसंबर 2024 में हुए पिछले आंदोलन से जुड़ी हैं। उस समय भी बड़ी संख्या में युवाओं ने एमपीपीएससी की कार्यप्रणाली और चयन प्रक्रिया को लेकर आवाज़ उठाई थी। तब प्रशासन और संबंधित अधिकारियों द्वारा कई वादे किए गए थे। अभ्यर्थियों को भरोसा दिलाया गया था कि उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा और जल्द समाधान निकाला जाएगा।
लेकिन आज, जब उस आंदोलन को 13 महीने बीत चुके हैं, तब भी अधिकांश वादे अधूरे हैं। यही कारण है कि इस बार का आंदोलन अधिक संगठित, अधिक दृढ़ और अधिक लंबा है। अभ्यर्थियों का कहना है कि वे अब सिर्फ आश्वासनों से संतुष्ट नहीं होंगे, बल्कि ठोस निर्णय और लिखित कार्रवाई चाहते हैं।
इंटरव्यू अंकों पर उठता सबसे बड़ा सवाल
इस आंदोलन की सबसे बड़ी और प्रमुख मांग स्टेट सर्विस परीक्षा के इंटरव्यू अंकों से जुड़ी है। वर्तमान व्यवस्था के तहत इंटरव्यू 185 अंकों का होता है। अभ्यर्थियों का मानना है कि यह संख्या अत्यधिक है और इससे चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं।
अभ्यर्थियों का तर्क है कि लिखित परीक्षा, जिसमें वर्षों की पढ़ाई, मेहनत और विषयगत ज्ञान की परीक्षा होती है, उसके मुकाबले इंटरव्यू को इतना अधिक महत्व देना अनुचित है। उनका कहना है कि इंटरव्यू स्वभाविक रूप से एक सब्जेक्टिव प्रक्रिया होती है, जिसमें व्यक्तिगत पसंद, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों की संभावना अधिक रहती है। इसलिए इंटरव्यू अंकों को घटाकर 100 किया जाना चाहिए, ताकि चयन प्रक्रिया अधिक संतुलित और निष्पक्ष बन सके।
87:13 फॉर्मूले पर नाराज़गी
एमपीपीएससी चयन प्रक्रिया में लागू 87:13 फॉर्मूला भी अभ्यर्थियों की नाराज़गी का बड़ा कारण है। इस फॉर्मूले के तहत केवल 87 प्रतिशत पदों पर ही अंतिम चयन सूची जारी की जाती है, जबकि 13 प्रतिशत पदों को होल्ड पर रखा जाता है। अभ्यर्थियों का कहना है कि यह व्यवस्था न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि इससे हजारों योग्य उम्मीदवारों का भविष्य अधर में लटक जाता है।
उनकी मांग है कि इस फॉर्मूले को पूरी तरह समाप्त किया जाए और 100 प्रतिशत पदों पर चयन सूची जारी की जाए। उनका कहना है कि जब पद स्वीकृत हैं और परीक्षाएं आयोजित हो चुकी हैं, तो फिर पदों को रोकने का कोई औचित्य नहीं है।
राज्य सेवा और इंजीनियरिंग सेवा में पदों की भारी कमी
अभ्यर्थियों की एक और महत्वपूर्ण मांग राज्य सेवा परीक्षा में पदों की संख्या बढ़ाने को लेकर है। वर्तमान में राज्य सेवा में केवल 155 पदों पर भर्ती की जा रही है, जबकि अभ्यर्थियों की मांग है कि इसे बढ़ाकर 700 किया जाए। उनका कहना है कि राज्य में प्रशासनिक ढांचे, जनसंख्या और काम के बोझ को देखते हुए यह संख्या बेहद कम है।
इसी तरह, स्टेट इंजीनियरिंग सर्विस में वर्तमान में केवल 29 पद निर्धारित हैं। अभ्यर्थी इसे बढ़ाकर 400 करने की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि राज्य में विकास परियोजनाओं, बुनियादी ढांचे और तकनीकी विभागों की ज़रूरतों को देखते हुए इतनी कम भर्ती न केवल युवाओं के साथ अन्याय है, बल्कि राज्य के विकास को भी प्रभावित करती है।
2019 से होल्ड पर रखे गए पदों का मुद्दा
अभ्यर्थियों ने 2019 से होल्ड पर रखे गए 13 प्रतिशत पदों की सूची जारी करने की भी मांग उठाई है। उनका कहना है कि कई वर्षों से ये पद बिना किसी स्पष्ट कारण के रोके गए हैं। इससे न केवल चयन प्रक्रिया प्रभावित हो रही है, बल्कि हजारों अभ्यर्थियों की मेहनत और समय भी बर्बाद हो रहा है।
धरने पर बैठे युवाओं का कहना है कि यदि ये पद समय पर जारी कर दिए जाते, तो आज कई परिवारों की आर्थिक स्थिति बेहतर होती और कई युवाओं को बार-बार परीक्षा की तैयारी में अपना जीवन नहीं लगाना पड़ता।
मेंस परीक्षा की उत्तरपुस्तिकाओं की पारदर्शिता
एक और अहम मांग मेंस परीक्षा की उत्तरपुस्तिकाओं को दोबारा दिखाने से जुड़ी है। अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्हें अपनी उत्तरपुस्तिकाएं देखने का पूरा अधिकार होना चाहिए, ताकि वे यह समझ सकें कि कहां और कैसे मूल्यांकन हुआ है।
उनका मानना है कि उत्तरपुस्तिकाओं को देखने की सुविधा मिलने से न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि अभ्यर्थियों का आयोग पर विश्वास भी मजबूत होगा। इससे भविष्य में अनावश्यक विवाद और संदेह की स्थिति भी कम होगी।
यूपीएससी की तर्ज पर समयबद्ध नियुक्ति की मांग
अभ्यर्थी यह भी मांग कर रहे हैं कि यूपीएससी की तरह विज्ञापन जारी होने के एक साल के भीतर पूरी चयन प्रक्रिया और नियुक्ति सुनिश्चित की जाए। उनका कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में कई बार परीक्षाएं, परिणाम और नियुक्तियां वर्षों तक खिंच जाती हैं, जिससे अभ्यर्थियों का मानसिक और आर्थिक संतुलन बिगड़ जाता है।
युवाओं का तर्क है कि समयबद्ध प्रक्रिया से न केवल प्रशासनिक व्यवस्था सुधरेगी, बल्कि युवाओं का भरोसा भी कायम रहेगा।
वन टाइम फीस का प्रस्ताव
सभी परीक्षाओं के लिए 100 रुपये की वन टाइम फीस लागू करने की मांग भी इस आंदोलन का हिस्सा है। अभ्यर्थियों का कहना है कि बार-बार आवेदन शुल्क देना आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों के लिए भारी पड़ता है। वन टाइम फीस से यह समस्या काफी हद तक हल हो सकती है और अधिक से अधिक योग्य उम्मीदवार परीक्षाओं में शामिल हो सकेंगे।
न्याय यात्रा-2.0: सिर्फ आंदोलन नहीं, एक संदेश
नेशनल एजुकेटेड यूथ यूनियन के नेतृत्व में चल रही यह न्याय यात्रा-2.0 केवल एमपीपीएससी तक सीमित नहीं है। यह उस पूरे सिस्टम पर सवाल है, जो युवाओं से मेहनत, धैर्य और समर्पण तो मांगता है, लेकिन बदले में समय पर न्याय नहीं दे पाता।
धरने पर बैठे कई अभ्यर्थियों का कहना है कि यह आंदोलन तब तक जारी रहेगा, जब तक उनकी मांगों पर ठोस और लिखित निर्णय नहीं लिया जाता। वे साफ शब्दों में कह रहे हैं कि अब वे आधे-अधूरे आश्वासनों से पीछे हटने वाले नहीं हैं।
प्रशासन और समाज की निगाहें
इस आंदोलन पर न केवल प्रशासन, बल्कि पूरे प्रदेश की निगाहें टिकी हुई हैं। सर्द रातों में जलते अलाव, हाथों में तख्तियां और आंखों में उम्मीद लिए बैठे ये अभ्यर्थी उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जो अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ संघर्ष में विश्वास रखती है।
यह देखना अब महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले दिनों में आयोग और सरकार इस आवाज़ को किस तरह सुनती है और क्या इस बार वाकई युवाओं को वह न्याय मिल पाता है, जिसके लिए वे वर्षों से इंतजार कर रहे हैं।
