देश की आर्थिक राजधानी और सपनों की नगरी कही जाने वाली मुंबई में अपने नाम का घर खरीदना अब आम परिवारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। जिस शहर में कभी मध्यम वर्ग अपने सीमित बजट में भी एक छोटा सा आशियाना खरीदने का सपना देख सकता था, वहां अब एक करोड़ रुपये का बजट भी अपर्याप्त साबित होने लगा है। ताजा रियल एस्टेट रिपोर्ट्स इस बात की गवाही दे रही हैं कि मुंबई में सस्ते और मध्यम कीमत वाले घर धीरे-धीरे बाजार से गायब होते जा रहे हैं, जबकि करोड़ों रुपये के महंगे और लग्जरी मकानों की बिक्री में लगातार तेजी देखी जा रही है।

रियल एस्टेट सेक्टर से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, नवंबर 2025 में मुंबई में संपत्ति रजिस्ट्रेशन के ट्रेंड ने साफ संकेत दिया है कि शहर में अफोर्डेबल हाउसिंग का दायरा सिकुड़ रहा है। एक करोड़ रुपये से कम कीमत वाले घरों की हिस्सेदारी में साल दर साल गिरावट आई है, वहीं दो करोड़, पांच करोड़ और उससे ऊपर के घरों की मांग में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह बदलाव केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मुंबई की सामाजिक और आर्थिक संरचना में भी गहरे परिवर्तन का संकेत देता है।
एक करोड़ से कम कीमत वाले घर क्यों हो रहे हैं गायब
बीते कुछ वर्षों में मुंबई में जमीन की कीमतों, निर्माण लागत और प्रीमियम सुविधाओं की मांग में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। इसका सीधा असर घरों की कीमतों पर पड़ा है। नवंबर 2025 में दर्ज किए गए प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन में एक करोड़ रुपये से कम कीमत वाले घरों की हिस्सेदारी घटकर 42 प्रतिशत रह गई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 46 प्रतिशत था। यह गिरावट बताती है कि अब डेवलपर्स भी कम बजट वाले घरों के निर्माण में रुचि कम दिखा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती निर्माण लागत और बेहतर मुनाफे की चाह में बिल्डर्स अब हाई-एंड और प्रीमियम प्रोजेक्ट्स पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि मिडिल क्लास के लिए उपयुक्त घरों की सप्लाई लगातार घटती जा रही है और कीमतें आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं।
मिड बजट से प्रीमियम सेगमेंट की ओर झुकाव
मुंबई के रियल एस्टेट बाजार में अब खरीदारों का रुझान भी तेजी से बदल रहा है। एक से दो करोड़ रुपये के बीच कीमत वाले घरों की हिस्सेदारी नवंबर 2025 में बढ़कर 33 प्रतिशत हो गई है, जो पिछले साल 31 प्रतिशत थी। इसका मतलब यह है कि जो लोग पहले एक करोड़ रुपये के भीतर घर खरीदने की योजना बनाते थे, वे अब मजबूरी में अपने बजट को बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं।
वहीं दो से पांच करोड़ रुपये के बीच कीमत वाले घरों की हिस्सेदारी लगभग स्थिर बनी हुई है, लेकिन पांच करोड़ रुपये से अधिक कीमत वाले घरों की मांग में उल्लेखनीय उछाल देखने को मिला है। नवंबर 2025 में इस सेगमेंट की हिस्सेदारी बढ़कर 7 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो पिछले वर्ष 5 प्रतिशत थी। यह रुझान साफ दर्शाता है कि मुंबई में लग्जरी और अल्ट्रा-लग्जरी हाउसिंग अब बाजार का अहम हिस्सा बनती जा रही है।
अफोर्डेबल हाउसिंग की कमी और बढ़ती असमानता
एक करोड़ से कम कीमत वाले घरों की हिस्सेदारी में गिरावट का सबसे बड़ा अर्थ यह है कि शहर में अफोर्डेबल हाउसिंग की उपलब्धता कम होती जा रही है। मध्यम आय वर्ग और पहली बार घर खरीदने वाले लोगों के लिए विकल्प सीमित होते जा रहे हैं। बढ़ती कीमतों के कारण कई परिवार अब अपने घर का सपना या तो टाल रहे हैं या फिर शहर के बाहरी इलाकों की ओर रुख कर रहे हैं।
रियल एस्टेट विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति लंबे समय में सामाजिक असमानता को और बढ़ा सकती है। मुंबई जैसे महानगर में यदि केवल उच्च आय वर्ग ही घर खरीदने में सक्षम रहेगा, तो इससे शहर का सामाजिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। कामकाजी वर्ग को रोजाना लंबी दूरी तय करनी पड़ेगी, जिससे ट्रैफिक, प्रदूषण और जीवनशैली पर भी असर पड़ेगा।
वेस्टर्न सबर्ब्स बने खरीदारों की पहली पसंद
घर खरीदने के मामले में मुंबई के वेस्टर्न सबर्ब्स अभी भी सबसे आगे हैं। नवंबर 2025 में कुल प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन का 56 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र से आया। बेहतर कनेक्टिविटी, विकसित सामाजिक ढांचा और अपेक्षाकृत ज्यादा विकल्पों के कारण वेस्टर्न सबर्ब्स खरीदारों की प्राथमिकता बने हुए हैं।
इसके बाद सेंट्रल सबर्ब्स का स्थान आता है, जहां 29 प्रतिशत रजिस्ट्रेशन दर्ज किए गए। साउथ मुंबई और सेंट्रल मुंबई की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम रही, जिसका मुख्य कारण वहां की अत्यधिक कीमतें हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि मिडिल क्लास खरीदार अब शहर के मुख्य क्षेत्रों से हटकर उपनगरों में बसना पसंद कर रहे हैं।
घर के साइज में भी दिख रहा है बदलाव
मुंबई में घरों की बढ़ती कीमतों का असर उनके साइज पर भी साफ दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, 500 से 1000 स्क्वायर फीट के घरों की सबसे ज्यादा मांग है। कुल रजिस्ट्रेशन में इस श्रेणी के घरों की हिस्सेदारी 46 प्रतिशत रही। इसका मतलब यह है कि लोग बड़े घरों के बजाय कॉम्पैक्ट और उपयोगी स्पेस वाले फ्लैट्स को प्राथमिकता दे रहे हैं।
दक्षिण मुंबई में रजिस्ट्रेशन का आंकड़ा महज 9 प्रतिशत रहना इस बात का संकेत है कि वहां की प्रॉपर्टी अब आम खरीदारों की पहुंच से बाहर हो चुकी है। ऊंची कीमतों और सीमित सप्लाई के कारण यह क्षेत्र केवल बेहद संपन्न वर्ग तक सिमटता जा रहा है।
क्या कहता है भविष्य का संकेत
मुंबई के रियल एस्टेट बाजार में मौजूदा रुझान यह संकेत देते हैं कि आने वाले वर्षों में अफोर्डेबिलिटी एक और बड़ा मुद्दा बन सकती है। यदि सस्ते और मध्यम कीमत वाले घरों की सप्लाई नहीं बढ़ाई गई, तो मिडिल क्लास के लिए घर खरीदना और भी मुश्किल हो जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि नीति निर्माताओं और डेवलपर्स को मिलकर ऐसे समाधान तलाशने होंगे, जिससे अफोर्डेबल हाउसिंग को बढ़ावा मिल सके। अन्यथा मुंबई केवल अमीरों का शहर बनकर रह जाएगी, जहां आम आदमी के लिए अपने नाम की छत खरीदना एक दूर का सपना होगा।
