आध्यात्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विश्वासों से भरी भारतीय भूमि पर धार्मिक आयोजन सिर्फ अनुष्ठान मात्र नहीं होते, बल्कि वह समाज के भीतर सांझा भावना और सामूहिक ऊर्जा को उजागर करते हैं। रायसेन शहर इन दिनों इसी आध्यात्मिक उत्साह का केंद्र बन चुका है, जहां नर्मदा महापुराण कथा का भव्य आयोजन आरंभ हुआ है। बाबा भारती परिसर तथा रामलीला मैदान भक्तिमय वातावरण में पूरी तरह रंग चुका है। यह आयोजन 5 दिसंबर से 11 दिसंबर तक संचालित किया जाएगा। इस दौरान प्रतिदिन कथा प्रवचन, धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ, भजन संध्या और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।

कथा प्रारंभ होने से पूर्व शुक्रवार की सुबह शहर को आध्यात्मिकता की धारा में प्रवाहित करने वाली कलश शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा में महिलाओं, साधु-संतों, भजन मंडलियों और श्रद्धालुओं ने सम्मिलित होकर एक अद्भुत दृश्य निर्मित किया। सिर पर सजे देव कलश, शंख, ढोल, घंटों की ध्वनियां और भजन-कीर्तन का सुर वातावरण में गूंज उठा। नगर के प्रमुख मार्गों से गुजरती इस यात्रा में हजारों की संख्या में भक्त शामिल हुए। कई स्थानों पर पुष्पवर्षा की गई। यात्रियों का स्वागत दक्षिणा, माल्यार्पण और चरण सेवा से किया गया।
नर्मदा महापुराण कथा का विषय इस वर्ष विशेष रूप से नर्मदा पवित्रता, नदी संस्कृति, आध्यात्मिक शक्ति और पर्यावरण संरक्षण पर केंद्रित बताया गया है। कथा के माध्यम से संत-वक्ताओं ने यह समझाने की कोशिश की कि नर्मदा नदी सिर्फ प्राकृतिक धारा नहीं है, बल्कि सनातन संस्कृति की शाश्वत धरोहर है। कथा वाचकों ने कहा कि नर्मदा को जीवनधारा कहा गया है क्योंकि इसके तट से अनेक प्राचीन नगर, तपोस्थल और देवालय जुड़े हैं।
रायसेन का इतिहास धार्मिक दृष्टि से सदैव समृद्ध रहा है। यहां प्राचीन मठ, सिद्ध स्थान, मंदिर एवं देवस्थल लोगों के विश्वास का आधार रहे हैं। इस आयोजन के माध्यम से लोगों का ध्यान पुनः उन आध्यात्मिक परंपराओं पर गया जो आज भी इस भूभाग की संस्कृति को जीवंत बनाए हुए हैं। कथा स्थल पर प्रातःकाल विशेष पूजन होता है, जिसके बाद उपस्थित लोग संतों की वाणी में कथा सुनते हैं। दोपहर में भोग और प्रसाद वितरण किया जा रहा है।
आयोजन समिति ने बताया कि इस कथा का उद्देश्य केवल धार्मिक रस देना नहीं, बल्कि नगर के युवाओं को भारतीय परंपरा, तत्वज्ञान और सदाचरण से जोड़ना भी है। आयोजन स्थल पर अलग से युवा मंडप बनाया गया है जिसमें बच्चों के लिए संस्कार शिविर, संस्कृति परिचय, कथा सार और भारतीय इतिहास संबंधी जानकारी प्रदान की जा रही है। कई शिक्षाविद् और आध्यात्मिक विशेषज्ञ प्रतिदिन विभिन्न सत्र ले रहे हैं।
कथा के दौरान सप्त नर्मदा महात्म्य पर व्याख्यान दिए जा रहे हैं। इसमें नर्मदाष्टक, नर्मदा परिक्रमा यात्रा, नर्मदा कुंभ परिवेश और इस नदी के तटों पर हुए ऋषि-तप, देवी-आराधना और वैदिक अनुष्ठान से जुड़े प्रसंग सुनाए जा रहे हैं। श्रद्धालुओं के अनुसार कथा सुनते-सुनते ऐसा लगा जैसे कोई ऐतिहासिक युग पुनः जीवंत हो उठा हो, जहां साधना-तप और संस्कृति का उदात्त स्वरूप दिखाई देता है।
कई भक्त जिनका संबंध अमरकंटक क्षेत्र से रहा है, इस आयोजन में शामिल होने पहुंचे। उनका मानना है कि ऐसी कथा उन भावनाओं को फिर से जगाती है जो नर्मदा तट से जुड़ी हुई हैं। अधिकतर लोगों ने कहा कि यह आयोजन सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि मानसिक स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जाओं का प्रसार कर रहा है।
समिति के सदस्यों ने जानकारी दी कि कथा के साथ-साथ प्रतिदिन हवन और वैदिक यज्ञ भी संपन्न हो रहा है। हवन स्थल पर विशेष पर्यावरण-अनुकूल सामग्री का उपयोग किया जा रहा है। यज्ञ में गिलोय, गायघृत, नैसर्गिक धूप, चंदन, गुग्गल आदि का प्रयोग होने की बात सामने आई है ताकि वातावरण और अधिक पवित्र हो सके।
कथा में नर्मदा नदी से जुड़े प्रचलित लोक-कथानक, पुराणिक प्रसंग, जनमान्यता और तीर्थ यात्रा की परंपरा पर विशेष रूप से प्रकाश डाला गया। वाचकों ने कहा कि नर्मदा तट पर समाधिस्थ कई युगपुरुषों की तप-कर्मभूमि को वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना गया है। विभिन्न अध्ययनों में यह सामने आया है कि नर्मदा घाटी की मिट्टी औषधीय तत्वों से भरपूर है, जिसे लोग पारंपरिक उपचार में भी उपयोग में लाते रहे हैं।
आयोजन स्थल पर देर शाम को विशाल आरती की व्यवस्था है। स्थानीय नागरिक, महिलाएं, युवा और बुजुर्ग बड़ी संख्या में एक स्थान पर एकत्रित होकर दीपक जलाते हैं। दूर-दूर तक फैली दीपमालिका का दृश्य आकर्षण का केंद्र बन रहा है। भक्तों का कहना है कि यह दृश्य उनके भीतर एक अद्भुत शांति उत्पन्न करता है।
जन-सहयोग और सामाजिक सहभागिता इस आयोजन की सबसे मजबूत नींव बनकर सामने आ रही है। कई स्थानीय स्वयंसेवी संगठनों ने यातायात व्यवस्था, पेयजल वितरण, सुरक्षा व्यवस्था और चिकित्सा सहायता के लिए अलग-अलग टीमें तैनात की गई हैं। आयोजन स्थल पर चिकित्सकीय वाहन उपलब्ध हैं, ताकि किसी असुविधा होने पर तुरंत सहायता मिल सके।
कथा के समापन दिवस पर विशाल भंडारे का आयोजन किया जाना है। समिति ने बताया कि समुदाय को जोड़ने वाले ऐसे आयोजनों का महत्व केवल धार्मिक भावनाओं तक सीमित नहीं है बल्कि इसका उद्देश्य सामाजिक सौहार्द, नैतिकता और एकात्मता को प्रोत्साहित करना भी है।
इस महापुराण कथा ने रायसेन में धार्मिक और सांस्कृतिक संदेशों का ऐसा समागम उत्पन्न किया है, जो आने वाले वर्षों तक याद रखा जाएगा। शहर में भक्ति, आस्था, पारंपरिक संस्कार और सामूहिकता का स्वरूप एक नए रूप में स्थापित हुआ है। आने वाले दिनों में कथा और अधिक रोचक होगी, जब धार्मिक विषयों के साथ-साथ आध्यात्मिक अनुभवों और जीवन की मूल चुनौतियों पर भी चर्चा की जाएगी।
