नर्मदापुरम जिले से सामने आई यह घटना केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई भर नहीं है, बल्कि यह समाज की उस संवेदनशील जिम्मेदारी पर भी सवाल खड़े करती है, जो विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के भविष्य से जुड़ी होती है। हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी स्थित मंगल भवन में संचालित एक मूकबधिर विशेष विद्यालय के संचालन को लेकर प्रशासन और समाज कल्याण विभाग ने गंभीर आपत्तियां दर्ज की हैं। जांच के बाद विद्यालय संचालक के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया है, जिससे पूरे जिले में हलचल मच गई है।

यह मामला उस समय उजागर हुआ, जब शिकायतों के आधार पर संबंधित विभाग ने विद्यालय का निरीक्षण कराया। निरीक्षण के दौरान जो तथ्य सामने आए, वे न केवल नियमों के उल्लंघन को दर्शाते हैं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा और भविष्य को लेकर भी चिंता पैदा करते हैं।
बिना नवीनीकरण के चल रहा था विद्यालय
जांच में यह स्पष्ट हुआ कि जिस संस्था के तहत यह मूकबधिर विद्यालय संचालित किया जा रहा था, उसका आवश्यक लाइसेंस निर्धारित अवधि के बाद नवीनीकृत नहीं कराया गया था। इसके बावजूद विद्यालय का संचालन जारी रखा गया। नियमों के अनुसार, विशेष विद्यालयों को तय मानकों और शर्तों का पालन करना अनिवार्य होता है, ताकि बच्चों को सुरक्षित और उपयुक्त वातावरण मिल सके।
लाइसेंस नवीनीकरण की प्रक्रिया केवल एक औपचारिकता नहीं होती, बल्कि इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि संस्था शैक्षणिक, संरचनात्मक और सुरक्षा मानकों पर खरी उतर रही है या नहीं। बिना नवीनीकरण के विद्यालय चलाया जाना प्रशासनिक लापरवाही के साथ-साथ गंभीर कानूनी उल्लंघन भी माना जाता है।
जर्जर भवन में बच्चों की जान जोखिम में
निरीक्षण के दौरान यह भी सामने आया कि जिस भवन में विद्यालय संचालित हो रहा था, उसकी स्थिति अत्यंत खराब थी। दीवारों में दरारें, कमजोर छत, पर्याप्त रोशनी और वेंटिलेशन का अभाव जैसी समस्याएं साफ नजर आईं। यह भवन विशेष बच्चों के लिए बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं माना जा सकता।
मूकबधिर बच्चों के लिए संचालित विद्यालयों में संरचनात्मक सुरक्षा का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि ऐसे बच्चों को आपात स्थिति में स्वयं निर्णय लेने या प्रतिक्रिया देने में कठिनाई हो सकती है। ऐसे में जर्जर भवन में विद्यालय का संचालन सीधे तौर पर बच्चों की जान को खतरे में डालने जैसा है।
प्रशासनिक जांच और कार्रवाई
शिकायत मिलने के बाद समाज कल्याण विभाग और स्थानीय प्रशासन की संयुक्त टीम ने विद्यालय का निरीक्षण किया। जांच रिपोर्ट में नियमों के कई उल्लंघन दर्ज किए गए। इसके आधार पर संबंधित थाने में विद्यालय संचालक के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई।
प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई किसी व्यक्तिगत दुर्भावना के तहत नहीं, बल्कि बच्चों के हित और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए की गई है। विशेष विद्यालयों के संचालन में किसी भी तरह की लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
अभिभावकों की चिंता और असमंजस
इस कार्रवाई के बाद सबसे अधिक चिंता उन अभिभावकों को हुई, जिनके बच्चे इस विद्यालय में अध्ययनरत थे। कई माता-पिता ने बताया कि उन्होंने अपने बच्चों को बेहतर भविष्य और विशेष देखभाल की उम्मीद में इस विद्यालय में दाखिला दिलाया था। अब अचानक सामने आए तथ्यों ने उन्हें असमंजस में डाल दिया है।
कुछ अभिभावकों का कहना है कि उन्हें विद्यालय की आंतरिक स्थिति की पूरी जानकारी नहीं थी। वे केवल इस भरोसे पर निर्भर थे कि संस्था नियमों के अनुसार संचालित हो रही होगी। इस घटना ने अभिभावकों और समाज के बीच भरोसे की भावना को भी आघात पहुंचाया है।
विशेष बच्चों की शिक्षा और समाज की जिम्मेदारी
मूकबधिर और अन्य विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा केवल एक सेवा नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। ऐसे बच्चों के लिए बनाए गए विद्यालयों को सामान्य स्कूलों से कहीं अधिक संवेदनशीलता, संसाधन और अनुशासन की जरूरत होती है।
यदि इन संस्थानों में लापरवाही बरती जाती है, तो इसका असर केवल प्रशासनिक आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह बच्चों के मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक विकास को भी प्रभावित करता है। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हम विशेष बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा को लेकर पर्याप्त गंभीर हैं।
कानून का सख्त संदेश
विद्यालय संचालक के खिलाफ दर्ज आपराधिक प्रकरण एक स्पष्ट संदेश देता है कि शिक्षा के नाम पर नियमों की अनदेखी अब स्वीकार्य नहीं होगी। प्रशासन का यह कदम भविष्य में अन्य संस्थाओं के लिए भी चेतावनी साबित हो सकता है, जो मानकों का पालन किए बिना संचालन कर रही हैं।
कानून का उद्देश्य दंड देना भर नहीं, बल्कि व्यवस्था को सुधारना भी होता है। इस कार्रवाई से उम्मीद की जा रही है कि अन्य विशेष विद्यालय अपने दस्तावेजों, भवनों और व्यवस्थाओं की समीक्षा करेंगे।
आगे की कार्रवाई और संभावनाएं
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, इस मामले में आगे भी जांच जारी रह सकती है। यदि अन्य गंभीर अनियमितताएं सामने आती हैं, तो कार्रवाई का दायरा बढ़ाया जा सकता है। साथ ही, यह भी प्रयास किया जा रहा है कि प्रभावित बच्चों को वैकल्पिक सुरक्षित शिक्षण व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए।
हरिगीत प्रवाह की तरह यह मामला भी व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता की ओर संकेत करता है, जहां संवेदनशील मुद्दों पर लापरवाही की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
निष्कर्ष
नर्मदापुरम का यह मामला केवल एक विद्यालय या एक संचालक तक सीमित नहीं है। यह पूरी व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का विषय है। विशेष बच्चों की शिक्षा से जुड़े संस्थानों को यह समझना होगा कि उनका कार्य केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व है। नियमों का पालन, सुरक्षित भवन और पारदर्शी संचालन ही बच्चों और अभिभावकों का भरोसा बनाए रख सकता है।
