मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले की धरती एक बार फिर इतिहास के पन्नों को पलटने जा रही है। यहां अब ऐसे जीवाश्मों की खोज की तैयारी चल रही है, जो करोड़ों वर्ष पुराने जीवन के अस्तित्व को सामने ला सकते हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वन विभाग को निर्देश दिया है कि नर्मदापुरम के नर्मदा नदी क्षेत्र में डायनासोर के अवशेषों की खोज की जाए।
यह निर्णय तब लिया गया जब मुख्यमंत्री की जर्मनी यात्रा के दौरान जर्मन शोधकर्ता डॉ. संजुक्ता चक्रवर्ती से मुलाकात हुई। डॉ. चक्रवर्ती ने अपने शोध में बताया कि नर्मदा घाटी में कभी राजासौरस नामक प्रजाति के विशाल मांसाहारी डायनासोर विद्यमान थे। यह प्रजाति लगभग 25 करोड़ वर्ष पहले धरती पर विचरण करती थी।

डॉ. मोहन यादव ने इस मुलाकात के बाद राज्य के वन विभाग के उच्चाधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि नर्मदापुरम क्षेत्र में वैज्ञानिक स्तर पर डायनासोर अवशेषों की खोज शुरू की जाए।
नर्मदा घाटी — भारत का ‘जुरासिक ज़ोन’
नर्मदा घाटी केवल मध्य प्रदेश की जीवनरेखा ही नहीं, बल्कि यह भारत की प्राचीन जैव विविधता की गवाही भी देती है। इस घाटी में पहले भी डायनासोर के जीवाश्म मिले हैं — जिनमें सीहोर, धार और डिंडौरी जिले प्रमुख हैं।
धार जिले में वर्ष 2017 से 2020 के बीच पुरातत्व वैज्ञानिकों ने शाकाहारी डायनासोर के अंडों का घोंसला खोजा था, जिसने वैज्ञानिक समुदाय को चकित कर दिया था। अब, उसी दिशा में आगे बढ़ते हुए, नर्मदापुरम में मांसाहारी डायनासोर के अवशेषों की खोज की जाएगी।
इतिहासकारों का मानना है कि भारत में डायनासोर के अस्तित्व के सबसे पहले प्रमाण इन्हीं क्षेत्रों से मिले थे। यही कारण है कि भारत के वैज्ञानिक इस क्षेत्र को ‘भारतीय डायनासोर हॉटस्पॉट’ कहते हैं।
राजासौरस — भारत का ‘Royal Lizard’
राजासौरस नाम का अर्थ ही है ‘राजसी छिपकली’। यह प्रजाति क्रेटेशियस काल की थी, जो लगभग 25 करोड़ वर्ष पहले पृथ्वी पर विचरती थी। यह एक विशाल मांसाहारी डायनासोर था, जिसकी लंबाई लगभग 9 मीटर और ऊँचाई 3 मीटर तक थी। इसके जबड़ों में इतने शक्तिशाली दांत थे कि यह आसानी से अन्य जीवों का शिकार कर सकता था।
राजासौरस का जीवाश्म नर्मदा घाटी के ऊपरी हिस्सों में मिला था। इस खोज ने भारत को विश्व के उन चुनिंदा देशों में शामिल कर दिया था जहाँ मांसाहारी डायनासोर के अवशेष मिले हैं।
नर्मदापुरम में नई खोज की तैयारी
मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद नर्मदापुरम जिला प्रशासन और वन विभाग ने खोज का खाका तैयार करना शुरू कर दिया है। वन विभाग ने भौगोलिक सर्वे, सॉइल टेस्टिंग, और पुरातात्विक मानचित्रण की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है।
वैज्ञानिक टीम ने बताया कि नर्मदा के किनारे स्थित चट्टानी परतों में विशेष प्रकार के जीवाश्म मिलने की संभावना है। यहां की मिट्टी का संघटन, नमी और खनिजों की मात्रा ऐसे हैं, जो जीवाश्म संरक्षण के लिए आदर्श वातावरण तैयार करते हैं।
वैज्ञानिकों का मानना — “यह खोज भारत के इतिहास को नया आयाम देगी”
पुरातत्व वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि नर्मदापुरम में डायनासोर के अवशेष मिलते हैं, तो यह खोज भारत के प्राचीन जीव विकास इतिहास को एक नया मोड़ देगी।
डॉ. चक्रवर्ती ने बताया कि भारत कभी गोंडवाना महाद्वीप का हिस्सा था, जो बाद में टूटकर अलग-अलग भूभागों में विभाजित हुआ। इस महाद्वीप के दक्षिणी भाग में मौजूद भारत के क्षेत्र में डायनासोर की कई प्रजातियाँ फली-फूलीं।
राजासौरस इसी भूभाग का राजा माना जाता है। माना जाता है कि इस डायनासोर का सिर शेर की तरह चौड़ा और ऊँचाई में उभरा हुआ था।
धार का डायनासोर पार्क — नर्मदापुरम का अगला कदम
धार जिले में डायनासोर पार्क का निर्माण कार्य चल रहा है, जो गुजरात के बालासिनोर डायनासोर पार्क की तर्ज पर बनाया जा रहा है। अब नर्मदापुरम में भी इसी तरह का पार्क प्रस्तावित है।
यदि यहां अवशेष मिलते हैं, तो नर्मदापुरम न केवल पुरातात्विक महत्व का केंद्र बनेगा बल्कि यह पर्यटन के लिए भी एक नया आकर्षण बन जाएगा।
नर्मदा घाटी — इतिहास, भूगोल और विज्ञान का संगम
नर्मदा घाटी केवल भूगोल का चमत्कार नहीं, बल्कि विज्ञान और इतिहास का जीवंत प्रमाण है। यहां की नदी चट्टानों को काटती हुई जिस तरह से बहती है, उसने धरती की परतों को उजागर कर दिया है। इन्हीं परतों में करोड़ों वर्ष पुरानी पृथ्वी की कहानी दबी हुई है।
भूगर्भीय अध्ययन बताते हैं कि इस घाटी में सेंडस्टोन और लाइमस्टोन की परतें जीवाश्मों को सुरक्षित रखने में मदद करती हैं। यही कारण है कि यहां कई बार माइक्रोफॉसिल्स यानी सूक्ष्म जीवाश्म भी मिले हैं।
शिक्षा और शोध के लिए नया अध्याय
राज्य सरकार की योजना है कि नर्मदापुरम की खोज को शोध संस्थानों और विश्वविद्यालयों से जोड़ा जाए। इससे विद्यार्थियों को भूविज्ञान और पुरातत्व के क्षेत्र में व्यावहारिक अनुभव मिलेगा।
मुख्यमंत्री ने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में इंदौर या भोपाल विश्वविद्यालयों में ‘डायनासोर अध्ययन केंद्र’ खोले जा सकते हैं।
स्थानीय लोगों की उम्मीदें
नर्मदापुरम के ग्रामीणों और स्थानीय निवासियों का कहना है कि यदि यह खोज सफल होती है, तो क्षेत्र में रोज़गार और पर्यटन के नए अवसर खुलेंगे। होटल, गाइड सेवा, और स्थानीय हस्तशिल्प से लोगों की आय बढ़ेगी।
पर्यावरणीय दृष्टि से सावधानी भी आवश्यक
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि खोज कार्य के दौरान पर्यावरणीय संतुलन का ध्यान रखा जाए। नर्मदा क्षेत्र जैव विविधता से समृद्ध है, इसलिए खुदाई या निर्माण से पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े, इसके लिए सतत विकास के सिद्धांतों का पालन आवश्यक है।
