मध्यप्रदेश के नर्मदापुरम वन मंडल की छीपीखापा बीट, जो कि बाघ और तेंदुए जैसे जंगली जानवरों का प्राकृतिक निवास स्थान है, में पिछले कुछ समय में पर्यावरण और वन्यजीवन के लिए गंभीर खतरा पैदा करने वाली घटना सामने आई है। रिपोर्टों के अनुसार, यहाँ 1242 सागौन के पेड़ और 38 सतकटा के पेड़ काटे गए, जिनकी अनुमानित कीमत लगभग 2.82 करोड़ रुपये बताई जा रही है।
यह घटना न केवल वन विभाग की जिम्मेदारी और पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करती है, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी और वन्यजीवन को भी गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है।

घटना का विवरण
छीपीखापा बीट न केवल वन्यजीवन के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह क्षेत्र बाघ और तेंदुए जैसे संकटग्रस्त प्रजातियों का प्राकृतिक आवास भी है। वन अधिकारियों की मौन स्वीकृति से यह पेड़ काटे गए। स्थानीय कर्मचारियों के अनुसार, कटाई की रिपोर्ट ऐसी बनाई गई कि छोटे कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराया जा सके।
वन क्षेत्र के आसपास के ग्रामीणों का कहना है कि कटाई के दौरान जंगल का प्राकृतिक स्वरूप पूरी तरह बिगड़ गया। पेड़ काटने के बाद जमीन उजाड़ जैसी दिख रही है और वन्यजीवों के आवास में कमी आई है।
वन्यजीवन और पारिस्थितिकी पर प्रभाव
वन्यजीवन विशेषज्ञों का कहना है कि छीपीखापा बीट में इतनी मात्रा में पेड़ काटने से बाघ, तेंदुए, बंदर और कई अन्य जीवों के रहने की जगह प्रभावित हुई है। पेड़ों की कटाई से जंगल का तापमान बढ़ता है, मिट्टी की उर्वरता कम होती है और वर्षा का पैटर्न भी प्रभावित होता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की घटनाएं पारिस्थितिकी तंत्र को असंतुलित कर देती हैं। पेड़ काटने से न केवल जीव-जंतु प्रभावित होते हैं, बल्कि स्थानीय लोगों की जल आपूर्ति और कृषि पर भी असर पड़ता है।
वन विभाग की भूमिका और रिपोर्टिंग
जानकारी के अनुसार, कटाई विभाग की मौन स्वीकृति के साथ यह कार्य किया गया। अधिकारियों ने इसे औपचारिक रूप से वैध दिखाने के लिए दस्तावेज तैयार किए, लेकिन कई छोटे कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की गई।
वन अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रशासन और उच्च अधिकारी पारदर्शी नहीं हैं और अक्सर स्थानीय कर्मचारियों को फंसाकर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करते हैं।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय लोग और पर्यावरण संगठन इस घटना से बेहद नाराज हैं। उन्होंने वन विभाग और राज्य सरकार से अपील की है कि पेड़ों की कटाई की जांच हो और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि इस क्षेत्र में जंगल काटने की यह कार्रवाई बाघ और तेंदुए जैसी प्रजातियों के लिए खतरे का संकेत है। वन्यजीव लगातार उनके खेतों और गांवों में आने लगे हैं क्योंकि उनका प्राकृतिक आवास कम हो गया है।
कानूनी और पर्यावरणीय दृष्टिकोण
कानून के अनुसार, वन क्षेत्र में इस प्रकार की कटाई के लिए औपचारिक अनुमति और पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन आवश्यक है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर नियमों का पालन नहीं किया गया, तो यह अपराध के दायरे में आता है।
पर्यावरणीय दृष्टिकोण से, छीपीखापा बीट जैसी जगहें जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण हैं। इनकी सुरक्षा न केवल वन्यजीवन के लिए बल्कि मानव जीवन के लिए भी आवश्यक है।
भविष्य की दिशा और सिफारिशें
विशेषज्ञों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का सुझाव है कि राज्य सरकार को इस घटना की गहन जांच करनी चाहिए। दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के साथ-साथ जंगल की पुनर्स्थापना के उपाय किए जाने चाहिए।
स्थानीय समुदाय को भी जंगल की सुरक्षा में शामिल करना चाहिए। जागरूकता अभियान, वन्यजीव संरक्षण और कटाई की निगरानी के लिए तकनीकी साधनों का उपयोग किया जा सकता है।
