हर महीने जब सैलरी खाते में आती है तो सबसे पहले नजर जाती है इन-हैंड रकम पर। यही वह आंकड़ा होता है जिससे घर का बजट बनता है, ईएमआई कटती है और भविष्य की योजनाएं तय होती हैं। लेकिन अब यह सोच बदलने वाली है। 1 अप्रैल से लागू होने वाला नया वेज कोड आपकी सैलरी स्लिप का पूरा गणित बदलने जा रहा है।

यह बदलाव ऐसा नहीं है कि आपकी कुल सैलरी यानी CTC अचानक कम हो जाएगी। असल में CTC वही रहेगी, लेकिन उसका बंटवारा पूरी तरह अलग तरीके से होगा। इसी वजह से कई कर्मचारियों को पहली नजर में झटका लग सकता है, क्योंकि इन-हैंड सैलरी पहले से कम दिखाई दे सकती है।
लेकिन इस बदलाव की असली तस्वीर सिर्फ आज की जेब से नहीं, बल्कि आने वाले 10–20 सालों के नजरिये से समझनी होगी। नया वेज कोड तुरंत अमीर नहीं बनाएगा, लेकिन रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी को ज्यादा सुरक्षित और स्थिर जरूर करेगा।
New Wage Code आखिर है क्या और इसे लाने की जरूरत क्यों पड़ी
नया वेज कोड भारत के नए श्रम कानूनों का एक अहम हिस्सा है। देश में दशकों से लागू 29 पुराने श्रम कानूनों को सरल और पारदर्शी बनाने के लिए उन्हें चार बड़े कोड्स में समेटा गया है। इनमें वेज से जुड़ा कानून Code on Wages कहलाता है, जिसे आम भाषा में New Wage Code कहा जा रहा है।
इस कानून को लाने के पीछे सरकार की मंशा यह रही है कि सैलरी स्ट्रक्चर में वर्षों से चल रही “जुगाड़ व्यवस्था” को खत्म किया जाए। लंबे समय से कंपनियां बेसिक सैलरी को जानबूझकर कम रखती थीं और अलग-अलग अलाउंस दिखाकर कुल सैलरी का आंकड़ा बढ़ा देती थीं।
इससे कर्मचारियों को तत्काल फायदा तो मिलता था, क्योंकि इन-हैंड सैलरी ज्यादा होती थी, लेकिन PF, ग्रेच्युटी और ओवरटाइम जैसी चीजों में नुकसान उठाना पड़ता था। नया वेज कोड इसी असंतुलन को ठीक करने की कोशिश है।
चार नए लेबर कोड और वेज कोड की भूमिका
भारत के नए श्रम सुधारों के तहत चार बड़े कोड बनाए गए हैं। इनमें वेज कोड सीधे तौर पर कर्मचारियों की सैलरी से जुड़ा है। बाकी कोड औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल की सुरक्षा से संबंधित हैं।
वेज कोड का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी कर्मचारियों के लिए न्यूनतम मजदूरी, समान वेतन और पारदर्शी सैलरी स्ट्रक्चर लागू हो। यही वजह है कि इसका असर हर उस व्यक्ति पर पड़ेगा, जो संगठित क्षेत्र में नौकरी करता है, चाहे वह प्राइवेट सेक्टर हो या पब्लिक।
सबसे बड़ा बदलाव: बेसिक सैलरी का नया नियम
नए वेज कोड का सबसे अहम और चर्चित प्रावधान यह है कि बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ता मिलाकर कुल CTC का कम से कम 50 प्रतिशत होना जरूरी होगा।
अभी तक कई कंपनियां बेसिक सैलरी को 30 या 35 प्रतिशत तक सीमित रखती थीं और बाकी रकम HRA, स्पेशल अलाउंस, ट्रैवल अलाउंस जैसे हेड्स में दिखा देती थीं। इससे कंपनी का PF और ग्रेच्युटी पर खर्च कम हो जाता था।
नए नियम के बाद ऐसा करना संभव नहीं रहेगा। कंपनियों को सैलरी स्ट्रक्चर दोबारा डिजाइन करना पड़ेगा और बेसिक सैलरी को बढ़ाना होगा।
CTC वही रहेगी लेकिन इन-हैंड क्यों घटेगी
यह सवाल लगभग हर कर्मचारी के मन में है कि अगर कुल सैलरी वही रहेगी तो इन-हैंड कम कैसे हो सकती है। इसका जवाब सैलरी के ब्रेकअप में छिपा है।
जब बेसिक सैलरी बढ़ेगी तो PF की गणना भी उसी बढ़े हुए बेसिक पर होगी। PF में कर्मचारी की हिस्सेदारी आमतौर पर बेसिक का 12 प्रतिशत होती है। इसी तरह ग्रेच्युटी की गणना भी बेसिक सैलरी से जुड़ी होती है।
इसका मतलब साफ है कि आपकी जेब से हर महीने PF के रूप में ज्यादा पैसा कटेगा। यही वजह है कि इन-हैंड सैलरी थोड़ी कम दिखेगी।
एक उदाहरण से समझिए नया गणित
मान लीजिए आपकी सालाना CTC 10 लाख रुपये है। पुराने सैलरी स्ट्रक्चर में कंपनी बेसिक सैलरी 3 लाख रुपये रखती थी और बाकी रकम अलाउंस में दिखा देती थी। इससे PF की कटौती कम होती थी और इन-हैंड ज्यादा मिलता था।
नए वेज कोड के बाद बेसिक और DA मिलाकर कम से कम 5 लाख रुपये दिखाने होंगे। अब PF 5 लाख के 12 प्रतिशत पर कटेगा। इससे हर महीने आपकी जेब से ज्यादा रकम PF में जाएगी।
नतीजा यह होगा कि इन-हैंड सैलरी कुछ हजार रुपये कम हो सकती है, लेकिन आपका PF फंड और ग्रेच्युटी का अमाउंट लंबे समय में काफी बड़ा हो जाएगा।
PF में बदलाव और इसका लॉन्ग टर्म फायदा
Provident Fund यानी PF को अक्सर कर्मचारी एक मजबूरी की कटौती मानते हैं। लेकिन असल में यह रिटायरमेंट की सबसे मजबूत नींव है।
नए वेज कोड के तहत PF की गणना बड़े बेसिक पर होगी। इसका मतलब है कि हर महीने PF में ज्यादा पैसा जमा होगा। इस पर मिलने वाला ब्याज और लंबी अवधि का कंपाउंडिंग प्रभाव आपके रिटायरमेंट फंड को कई गुना बढ़ा सकता है।
आज जो कटौती बोझ लग रही है, वही 20–25 साल बाद आर्थिक सुरक्षा का सबसे बड़ा सहारा बन सकती है।
ग्रेच्युटी में होने वाला बड़ा बदलाव
ग्रेच्युटी का फायदा आमतौर पर नौकरी छोड़ते समय या रिटायरमेंट के वक्त मिलता है। अभी तक कम बेसिक सैलरी की वजह से ग्रेच्युटी की रकम भी सीमित रह जाती थी।
नया वेज कोड इस स्थिति को बदल देगा। बेसिक सैलरी बढ़ने से ग्रेच्युटी की गणना भी ज्यादा रकम पर होगी। इसका मतलब है कि एक ही कंपनी में लंबे समय तक काम करने वाले कर्मचारियों को रिटायरमेंट पर कहीं ज्यादा ग्रेच्युटी मिल सकती है।
ओवरटाइम के नियमों में बदलाव
नए वेज कोड का असर सिर्फ ऑफिस में बैठकर काम करने वाले कर्मचारियों पर नहीं पड़ेगा, बल्कि फैक्ट्री और शिफ्ट आधारित कर्मचारियों पर भी होगा।
ओवरटाइम की गणना आमतौर पर बेसिक सैलरी के आधार पर होती है। जब बेसिक सैलरी बढ़ेगी तो ओवरटाइम का भुगतान भी उसी अनुपात में बढ़ जाएगा।
यह बदलाव खासतौर पर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और शॉप-फ्लोर वर्कर्स के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।
क्या हर कर्मचारी को नुकसान ही होगा
नया वेज कोड सुनकर कई लोगों को लगता है कि यह सिर्फ कर्मचारियों की जेब पर मार है। लेकिन तस्वीर इतनी एकतरफा नहीं है।
कॉरपोरेट सेक्टर में वे कर्मचारी, जिनकी सैलरी का बड़ा हिस्सा अलाउंस के रूप में दिखाया जाता था, उन्हें शुरुआती दौर में नुकसान महसूस हो सकता है।
वहीं दूसरी ओर, वे कर्मचारी जो लंबे समय तक नौकरी करने की योजना रखते हैं और रिटायरमेंट सिक्योरिटी को महत्व देते हैं, उनके लिए यह बदलाव बेहद फायदेमंद है।
30,000 रुपये सैलरी का उदाहरण
अगर किसी कर्मचारी की मंथली CTC 30,000 रुपये है और पुराने सिस्टम में बेसिक 35 प्रतिशत था, तो PF कटौती कम होती थी और इन-हैंड ज्यादा मिलती थी।
नए वेज कोड के तहत बेसिक 50 प्रतिशत होने पर PF कटौती बढ़ेगी। इससे इन-हैंड सैलरी कुछ सौ रुपये कम हो सकती है।
लेकिन इसी के साथ PF और ग्रेच्युटी का लाभ भी बढ़ जाएगा, जो लंबे समय में कहीं ज्यादा फायदेमंद साबित होगा।
सैलरी स्ट्रक्चर क्यों होगा ज्यादा पारदर्शी
नया वेज कोड सैलरी स्लिप को ज्यादा साफ और समझने लायक बनाएगा।
अब कंपनियों के लिए अलाउंस के नाम पर सैलरी छिपाना आसान नहीं रहेगा। कर्मचारियों को साफ तौर पर दिखेगा कि उनका बेसिक कितना है, PF कितना कट रहा है और भविष्य के लिए कितनी बचत हो रही है।
यह पारदर्शिता कर्मचारी और नियोक्ता दोनों के लिए फायदेमंद मानी जा रही है।
कंपनियों की HR रणनीति में बदलाव
नए नियम लागू होते ही कंपनियों को अपने ऑफर लेटर और HR पॉलिसी में बदलाव करना पड़ेगा।
नए जॉइनिंग ऑफर में CTC ब्रेकअप अलग नजर आएगा। HR को कर्मचारियों को यह समझाना होगा कि इन-हैंड भले कम दिख रही हो, लेकिन कुल लाभ ज्यादा है।
यह बदलाव पूरे रोजगार सिस्टम को ज्यादा व्यवस्थित बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
कर्मचारियों को क्या समझना चाहिए
नए वेज कोड के बाद कर्मचारियों को सिर्फ इन-हैंड सैलरी पर ध्यान देने के बजाय पूरे सैलरी स्ट्रक्चर को समझना होगा।
Basic और DA का अनुपात, PF कटौती और ग्रेच्युटी जैसे पहलुओं को समझकर ही सही फाइनेंशियल प्लानिंग की जा सकती है।
जॉब बदलते समय नए सैलरी स्ट्रक्चर के बारे में पहले से जानकारी लेना और उसकी तुलना करना भी जरूरी होगा।
Bottom Line: आज कम, कल ज्यादा सुरक्षित
नया वेज कोड कोई तात्कालिक जादू नहीं है। यह आपको रातों-रात अमीर नहीं बनाएगा।
लेकिन अगर आप इसे लंबे समय के नजरिये से देखते हैं तो यह बदलाव आपके पक्ष में है। आज इन-हैंड सैलरी थोड़ी कम दिख सकती है, लेकिन PF, ग्रेच्युटी और रिटायरमेंट सिक्योरिटी के रूप में भविष्य कहीं ज्यादा मजबूत होगा।
यह सुधार सिर्फ कर्मचारियों का नहीं, बल्कि पूरे रोजगार सिस्टम को ज्यादा निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक अहम कदम है।
