बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे आने से पहले राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की धार्मिक यात्राओं ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। चुनावी परिणामों के ठीक पहले उनका मंदिर, गुरुद्वारा और मजार पर जाकर मत्था टेकना केवल आस्था का मामला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे एक गहरे राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

बीते एक हफ्ते में नीतीश कुमार ने पटना से लेकर नालंदा, गया, हाजीपुर और भागलपुर तक कई धार्मिक स्थलों का दौरा किया। उन्होंने भगवान विष्णु मंदिर, हनुमान मंदिर, पटना साहिब गुरुद्वारा और कई सूफी मजारों पर जाकर श्रद्धा व्यक्त की। इस दौरान उनके साथ जेडीयू (JDU) के प्रमुख नेता, स्थानीय विधायक और प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहे।
लेकिन सवाल यह है —
क्या यह दौरे केवल व्यक्तिगत आस्था से जुड़े हैं, या फिर यह बिहार के सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर किया गया राजनीतिक कैलकुलेशन है?
धार्मिक यात्राओं का समय और सियासी मायने
बिहार में चुनाव नतीजों से पहले इस तरह का धार्मिक दौरा कोई साधारण बात नहीं है। नीतीश कुमार की छवि हमेशा एक संयमी, विकासवादी और धर्मनिरपेक्ष नेता की रही है। उन्होंने पिछले दो दशकों में बार-बार कहा है कि राजनीति को जाति और धर्म से ऊपर होना चाहिए।
फिर अचानक यह धार्मिक सक्रियता क्यों?
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह दौर “संतुलित आस्था रणनीति” (Balanced Faith Strategy) का हिस्सा है। इसमें न तो किसी एक समुदाय को प्राथमिकता दी जा रही है, न किसी अन्य को अलग-थलग किया जा रहा है। बल्कि एक ऐसा संदेश देने की कोशिश है —
“मैं सबका हूं — हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई — सबकी आस्था का सम्मान मेरा धर्म है।”
बिहार का सामाजिक समीकरण और नीतीश का गणित
बिहार की राजनीति सदैव जातीय और धार्मिक समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। यादव, कुशवाहा, मुसलमान, महादलित और सवर्ण — सभी समुदाय चुनावी परिणाम तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
नीतीश कुमार ने लंबे समय तक “समता के सूत्र” पर राजनीति की, जिसमें उन्होंने महादलितों और महिलाओं को अपनी प्रमुख वोटबैंक के रूप में साधा।
लेकिन इस बार तस्वीर अलग है —
- आरजेडी (RJD) ने युवाओं और पिछड़े वर्गों में अपनी पकड़ मजबूत की है।
- बीजेपी (BJP) हिंदू एकता और राष्ट्रवाद की लहर पर सवार है।
- वहीं नीतीश कुमार इस बार एक “संतुलित आस्था” की छवि बनाकर मध्य मार्ग तलाश रहे हैं।
गुरुद्वारा और मजार पर जाकर दिया ‘समरसता’ का संदेश
नीतीश कुमार ने हाल ही में पटना साहिब गुरुद्वारा में मत्था टेका और सिख समुदाय के प्रमुख नेताओं से मुलाकात की। उन्होंने कहा —
“गुरु गोविंद सिंह जी की धरती बिहार के लिए गर्व का विषय है। सिख परंपरा हमें सेवा, साहस और समानता का संदेश देती है।”
इसके कुछ घंटे बाद ही वे फुलवारी शरीफ की मजार पहुंचे, जहाँ उन्होंने सूफी संतों की शिक्षाओं को “मानवता की मिसाल” बताया।
इन दोनों दौरों को एक साथ रखने पर स्पष्ट होता है कि नीतीश ‘धार्मिक एकता और सद्भाव’ का संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं।
मंदिरों में आस्था और राजनीति की जुड़वाँ रेखा
नीतीश ने नालंदा में विष्णुपद मंदिर और गया के महाबोधि मंदिर में भी पूजा-अर्चना की। दोनों स्थान ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
विष्णुपद मंदिर हिंदू परंपरा का प्रतीक है, जबकि महाबोधि मंदिर बौद्ध धर्म का केंद्र।
इन दोनों जगहों का चयन यह दर्शाता है कि नीतीश बहु-धार्मिक सांस्कृतिक धरोहरों को राजनीतिक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं — पर एक सकारात्मक तरीके से।
नीतीश की रणनीति: धर्म से विकास की ओर पुल बनाना
राजनीतिक विशेषज्ञ डॉ. सुनील त्रिपाठी कहते हैं —
“नीतीश कुमार जानते हैं कि आज के बिहार में सिर्फ जातीय समीकरण से चुनाव नहीं जीते जा सकते। उन्हें विकास और धर्म के बीच संतुलन साधना होगा।”
इसलिए वे धार्मिक स्थानों का दौरा करते हुए हर जगह ‘सद्भाव और विकास’ का संदेश दोहरा रहे हैं।
वे कहते हैं —
“आस्था और विकास विरोधी नहीं हैं, बल्कि दोनों मिलकर समाज को स्थिर और समृद्ध बनाते हैं।”
‘समावेशी बिहार’ का नया नारा
नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने अपने हालिया बयान में कहा कि मुख्यमंत्री की धार्मिक यात्राएं किसी धर्म विशेष के लिए नहीं, बल्कि “समावेशी बिहार” की दिशा में एक कदम हैं।
पार्टी प्रवक्ता ने कहा —
“नीतीश जी का मानना है कि बिहार की ताकत उसकी विविधता में है। वे सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं।”
यह बयान स्पष्ट करता है कि इन यात्राओं का राजनीतिक एजेंडा ध्रुवीकरण नहीं, बल्कि समरसता है।
विपक्ष के आरोप और सियासी बयानबाज़ी
वहीं, विपक्षी दलों ने इसे “चुनावी स्टंट” बताया है।
आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने कहा —
“जब जनता बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य की बात कर रही है, तब मुख्यमंत्री को मंदिरों का ध्यान आया है।”
हालांकि बीजेपी के कुछ नेताओं ने नीतीश की इस पहल की सराहना की। उनका कहना है कि “सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव राजनीति से ऊपर की बात है।”
ऐसे में, नीतीश के ये दौरे भाजपा और जेडीयू के बीच संभावित राजनीतिक पुनर्संयोजन (realignment) के संकेत भी हो सकते हैं।
नीतीश का राजनीतिक संदेश — “सबका साथ, सबकी आस्था”
यह स्पष्ट होता जा रहा है कि नीतीश का उद्देश्य सिर्फ धार्मिक छवि बनाना नहीं, बल्कि ‘समरस समाज’ की अवधारणा को फिर से केंद्र में लाना है।
वे बिहार के सामाजिक ताने-बाने को यह संदेश देना चाहते हैं कि राजनीति अब विभाजन नहीं, संवाद और सम्मान की राजनीति होनी चाहिए।
नीतीश का व्यक्तित्व और बिहार की उम्मीदें
70 वर्ष से अधिक उम्र के नीतीश कुमार भारतीय राजनीति के सबसे अनुभवी और व्यवहारिक नेताओं में गिने जाते हैं।
उन्होंने पहले भी गठबंधन राजनीति में कई बार पलटवार किया है — लेकिन हर बार अपनी संतुलित छवि को बनाए रखा है।
उनकी यह “धार्मिक यात्राओं की राजनीति” उसी छवि का विस्तार है, जहाँ वे खुद को किसी भी अतिवाद से दूर रखते हुए एक “मध्य मार्गी नेता” के रूप में स्थापित करना चाहते हैं।
भविष्य की रणनीति और संदेश
भले ही चुनाव नतीजे क्या लाएँ, पर यह तय है कि नीतीश कुमार इस दौर में भी अपनी पहचान एक विचारशील, संयमी और संतुलित राजनेता के रूप में बनाए रखना चाहते हैं।
उनकी यह धार्मिक यात्राएँ बिहार की राजनीति में एक नया विमर्श पैदा कर चुकी हैं —
“क्या आस्था और राजनीति मिलकर सद्भाव की राह बना सकती हैं?”
