मध्यप्रदेश का कृषि ढांचा वर्षों से देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में उल्लेखनीय योगदान देता रहा है। गेहूं, सोयाबीन, दाल और प्याज यहां की प्रमुख फसलें हैं। लेकिन वर्तमान में जो स्थिति प्याज उत्पादकों के लिए बनी है, उसने खेती-किसानी की वास्तविकता एक बार फिर सामने ला दी है। सीहोर जिले के किसानों का दर्दनाक दृश्य अब पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय है। अपनी मेहनत से उगाई गई फसल जब मात्र 40 पैसे किलो के भाव में बिकने लगी, तो यह केवल आर्थिक झटका नहीं था, बल्कि उस मेहनत और उम्मीदों का अपमान भी था, जिनके सहारे किसान एक साल तक खेत में लगा रहता है।

सीहोर मंडी का वह दिन जिसने कई किसानों को असहाय महसूस कराया
एक किसान जब ट्रैक्टर-ट्रॉली में भरकर अपनी प्याज मंडी में लेकर पहुंचा, तो उसके चेहरे पर उम्मीद की चमक थी। बाजार में मांग उम्मीद से भले कम रही हो, लेकिन किसान इस उम्मीद में था कि कम से कम लागत भर निकल आए। 50 कट्टियों में करीब 2000 किलो प्याज उसकी मेहनत की कहानी थी। खेत की जुताई से लेकर बीज, उर्वरक, कीटनाशक, सिंचाई और कटाई तक लगभग तीन महीनों की मेहनत उसमें शामिल थी।
पर जब मंडी में भाव तय हुआ, तो गणना ही खत्म हो गई। 40 किलो की एक बोरी पर मात्र 10 रुपये। प्रति किलो सिर्फ 40 पैसे। यह सुनते ही किसान की आंखों में जो लाचारी उभरी, उसने आसपास खड़े अन्य लोगों को भी मौन कर दिया।
इससे बड़ा कटाक्ष यह था कि मंडी पहुंचाने में जो ट्रैक्टर किराया लगा, वह भी इन 10 रुपये से अधिक था। इससे स्पष्ट होता है कि किसान उत्पादन लागत से कई गुना घाटे में था।
खेत से मंडी तक का सफर और फिर सड़क पर बिखरी मेहनत
किसान ने अपने प्याज को मंडी परिसर के अंदर बेचने के बजाय ट्रॉली से ही उतारकर रास्ते पर उसी स्थान पर फेंक दिया। यह कदम शांतिपूर्ण विरोध नहीं था, बल्कि एक ऐसी चीख थी जो बिना आवाज के पूरे प्रदेश में सुनाई दी। सड़क पर सड़ने के लिए छोड़ी गई प्याज की प्रत्येक बोरी मानो यह साबित कर रही थी कि वर्तमान आर्थिक व्यवस्था में किसान को अपनी फसल बेचना भी बोझ बन गया है।
इस घटना के बाद सीहोर और आसपास के इलाकों में किसानों के मन में रोष और निराशा दोनों देखी गई। कम से कम मूल्य की मांग करना उनका अधिकार है। लेकिन जब वह भी नहीं मिला, तो फसल बर्बाद करने के अलावा विकल्प नहीं बचा।
उत्पादन लागत और वास्तविक नुकसान की वास्तविकता
एक एकड़ में प्याज की खेती करने में किसान को कम से कम 20 से 30 हजार रुपये तक की लागत आती है। इसमें मजदूरी, दवा, खाद, सिंचाई, तुलाई, परिवहन और पैकिंग शामिल हैं। कटाई के बाद बोरियों में भरकर मंडी तक लाने का खर्च भी अलग से जुड़ता है। लेकिन जब मंडी में प्रति कट्टी कीमत 10 रुपये तय की गई, तब कुल आय उस मूल्य से भी कम रही जो किसान ने केवल ट्रांसपोर्ट में खर्च की।
यदि कोई किसान 100 बोरी प्याज लेकर मंडी आए और उसे 1000 रुपये मिलें, तो यह राशि उसके खेत में केवल एक बार सिंचाई की लागत भी पूरी नहीं करती।
प्याज की कीमतें इतनी नीचे क्यों गईं
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार राज्य में इस वर्ष उत्पादन सामान्य से अधिक हुआ। साथ ही पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र और गुजरात में भी बड़े पैमाने पर प्याज मौजूद है। मंडियों में आवक बढ़ने से मांग-आपूर्ति संतुलन बिगड़ गया।
कहा जा रहा है कि सरकारी खरीद अभी तक पर्याप्त स्तर पर नहीं हुई। किसानों को राहत मिले, इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि किसान अपनी लागत बचा सके।
किसानों की टूटती उम्मीद
किसान का हताश होना गलत नहीं क्योंकि वह लगातार बढ़ती लागत के साथ अपनी आय को सिकुड़ते देख रहा है। वह उम्मीद करता है कि हर सीजन बेहतर भाव मिलेगा, लेकिन वास्तविकता उलटी हो रही है।
किसानों ने यह भी कहा कि यदि उचित दाम नहीं मिले तो अगली बार प्याज लगाने का मन नहीं होगा। इससे उत्पादन में गिरावट आएगी और सीधे बाजार में भविष्य का संकट उत्पन्न होगा।
समाज और प्रशासन की भूमिका
फिलहाल किसान की समस्या किसानों की ही समस्या बनी हुई है। जबकि पूरा देश उसकी उपज पर आधारित है। यदि किसान खेती छोड़ देता है, तो महंगाई का असल स्वरूप आम जनता को झेलना पड़ता है।
प्रशासनिक स्तर पर स्थाई नीति आवश्यक है जिसमें MSP आधारित खरीद, भंडारण सुविधा, सीधी मंडी मूल्य सूचना प्रणाली और फसल बीमा सुधार शामिल हों।
भावनात्मक आघात का असर
किसान केवल आर्थिक रूप से नहीं, मनोवैज्ञानिक नुकसान भी झेल रहा है। लगातार नुकसान के कारण परिवारिक जिम्मेदारियां, ऋण, अगला सीजन और घर खर्च उसके लिए मानसिक बोझ बन जाते हैं।
