पलामू जिले के किसानों के लिए आलू की बंपर पैदावार और अधिक मुनाफा कमाने की राह अब आसान हो गई है। कृषि विशेषज्ञ डॉ. अखिलेश शाह ने हाल ही में किसानों को जैविक खेती के महत्व और तकनीकों के बारे में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जैविक खेती केवल उत्पादन बढ़ाने का साधन नहीं है, बल्कि यह मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, स्वास्थ्य-सुरक्षित फसल उगाने और लंबे समय में किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में भी मदद करती है।

आलू भारत की प्रमुख नकदी फसलों में से एक है। पारंपरिक खेती में लागत अधिक होती है और समय के साथ मिट्टी की उर्वरता घटती जाती है। वहीं, जैविक खेती से लागत घटती है, उत्पादन बढ़ता है और मिट्टी हमेशा उपजाऊ रहती है। जैविक आलू बाजार में सामान्य आलू की तुलना में अधिक कीमत पर बिकते हैं, जिससे किसानों को अतिरिक्त लाभ होता है। बढ़ती शहरी मांग और रासायनिक मुक्त उत्पादों की लोकप्रियता से किसानों की आमदनी दोगुनी तक हो सकती है।
मिट्टी का तैयारी और जैविक खाद
डॉ. अखिलेश शाह ने बताया कि बंपर उत्पादन के लिए सबसे पहला कदम खेत की मिट्टी को जीवांश-समृद्ध बनाना है। खेत की जुताई के समय 20-25 क्विंटल प्रति एकड़ गोबर की सड़ी खाद (FYM), 5 किलो ट्राइकोडर्मा, 10 किलो नीमखली और 2 क्विंटल वर्मी कम्पोस्ट डालना चाहिए। इस प्रक्रिया से मिट्टी नरम, फूली और रोग-मुक्त बनती है। साथ ही, जैविक खाद मिट्टी में नमी बनाए रखने में मदद करती है, जिससे सिंचाई खर्च भी कम होता है।
उच्च गुणवत्ता वाले बीज का चयन
बंपर उत्पादन के लिए उचित बीज का चयन बेहद महत्वपूर्ण है। बीज का वजन 30-40 ग्राम होना चाहिए और यह चिकना तथा रोग-मुक्त होना चाहिए। बोने से पहले बीज को 10 लीटर पानी में 50 ग्राम ट्राइकोडर्मा, 50 मिली नीम तेल और 5 ग्राम स्यूडोमोनास मिलाकर 30 मिनट डुबोकर उपचार करना चाहिए। यह प्रक्रिया झुलसा, गलन और वायरस रोगों से सुरक्षा प्रदान करती है। जैविक उपचार की लागत कम होती है, लेकिन इसका लाभ अत्यधिक होता है।
सही रोपाई और पौधों की दूरी
आलू की रोपाई में सही दूरी का ध्यान रखना आवश्यक है। कतारों के बीच 45-60 सेंटीमीटर और पौधों के बीच 20-25 सेंटीमीटर की दूरी रखनी चाहिए। यह दूरी फसल को पर्याप्त धूप और हवा प्रदान करती है, जिससे रोग कम होते हैं। रोपाई के बाद मिट्टी में नमी बनाए रखना भी आवश्यक है, लेकिन खेत को अत्यधिक गीला न होने दें, क्योंकि इससे सड़न बढ़ सकती है।
जैविक पोषक घोल और फसल वृद्धि
आलू की बढ़वार और गांठ बनने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए जैविक पोषक घोल जैसे जीवामृत और बीजामृत का छिड़काव महत्वपूर्ण है। जीवामृत 200 लीटर प्रति एकड़ की दर से 30-35 दिन पर फसल में डालें। घनजीवामृत मिट्टी को सूक्ष्म जीवों से समृद्ध करता है। ह्यूमिक एसिड, समुद्री शैवाल घोल और गौमूत्र आधारित पोषक घोल की 2-3 बार स्प्रे से आलू की गांठें भारी बनती हैं और उत्पादन 20-25 प्रतिशत तक बढ़ सकता है।
कीट और रोग नियंत्रण
आलू में झुलसा रोग और कीट सबसे बड़ा नुकसान पहुंचाते हैं। जैविक उपाय सस्ते और प्रभावी हैं। 5 लीटर गौमूत्र, 5 लीटर नीम अर्क और 40 ग्राम ट्राइकोडर्मा का घोल हर 15 दिन में स्प्रे करें। इल्ली और पत्ते खाने वाले कीटों के लिए बवेरिया बेसियाना और नीम तेल का छिड़काव करें। फेरोमोन ट्रैप और पीले चिपचिपे कार्ड की मदद से कीट नियंत्रण किया जा सकता है। इन तरीकों से रासायनिक दवाओं का खर्च लगभग शून्य हो जाता है।
सिंचाई प्रबंधन और मल्चिंग
जैविक खेती में सिंचाई प्रबंधन अत्यंत महत्वपूर्ण है। बूंद-बूंद सिंचाई (ड्रिप) से पानी की बचत और उत्पादन दोनों बढ़ते हैं। इसके अलावा धान का पुआल या भूसा फैलाकर जैविक मल्चिंग करने से मिट्टी की नमी बनी रहती है, खरपतवार कम होते हैं और आलू की गांठें समान बनती हैं। मल्चिंग से उत्पादन 10-15 प्रतिशत बढ़ सकता है और श्रम खर्च कम होता है।
बाजार और बिक्री के अवसर
जैविक आलू की मांग शहरों और ऑनलाइन मार्केट में तेजी से बढ़ रही है। किसान यदि एफपीओ, किसान मंडी या डायरेक्ट मार्केट से बेचते हैं, तो कीमत सामान्य आलू से 20-40 प्रतिशत अधिक मिल सकती है। अच्छी पैकेजिंग, ग्रेडिंग और साफ-सुथरा रखकर बेचने से अतिरिक्त लाभ मिलता है। जैविक खेती में रासायनिक लागत न होने के कारण मुनाफा सामान्य खेती से दोगुना तक हो सकता है।
भविष्य की दिशा और लाभ
जैविक खेती न केवल किसानों की आमदनी बढ़ाती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, मिट्टी की उपजाऊ शक्ति और रासायनिक मुक्त फसल उपलब्ध कराकर स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव डालती है। पलामू जिले में इस दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे क्षेत्र में जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा और किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।
