दुनिया के कई देशों में लाखों पाकिस्तानी नागरिक रोज़गार, बेहतर जिंदगी और सुरक्षित भविष्य की तलाश में खाड़ी देशों का रुख करते हैं। इनमें सबसे बड़ा गंतव्य है सऊदी अरब, जहां निर्माण, सुरक्षा, घरेलू सेवाओं, परिवहन और श्रम आधारित उद्योगों में बड़ी संख्या में पाकिस्तानी काम करते हैं। लेकिन कड़ी सच्चाई यह है कि इन प्रवासियों की शांत दुनिया के पीछे एक ऐसी काली हकीकत दबी हुई है, जिसने पिछले एक दशक में हजारों परिवारों को दर्द, अपमान और असुरक्षा से भर दिया है।

हाल के वर्षों में सामने आई कई रिपोर्टें बताती हैं कि सऊदी जेलों में बंद विदेशी कैदियों में पाकिस्तानियों की संख्या सबसे अधिक है। जो प्रवासी अपने घरों से उम्मीदों के साथ जाते हैं, वे कई बार कानून, भाषा, संस्कृति और न्यायिक प्रक्रियाओं की खाई में ऐसा गिरते हैं कि बाहर निकल पाना लगभग असंभव हो जाता है।
सऊदी अरब की जेलों में बढ़ती मौतें: निष्पादन का कठोर पैटर्न
दस वर्ष का समय किसी भी राष्ट्र की नीतियों और न्याय व्यवस्था के रुझान को समझने के लिए पर्याप्त होता है। इस अवधि में सऊदी अरब द्वारा पाकिस्तान के नागरिकों को दी गई सज़ाओं का ग्राफ लगातार ऊपर गया है। हत्या, ड्रग्स तस्करी, यौन अपराध और अन्य गंभीर आरोपों के मामलों में पाकिस्तानी नागरिकों को सबसे अधिक फाँसियों का सामना करना पड़ा है।
सऊदी कानून कठोर है और वहां के कानून के मुताबिक गंभीर अपराधों में मौत की सजा दी जाती है। लेकिन चिंता का विषय यह है कि कई मामलों में निष्पादन न्यायिक असंतुलन, भाषा बाधाओं और कानूनी सहायता की कमी से प्रभावित दिखाई देता है।
दस वर्षों का आंकड़ा दर्शाता है कि 2014 के बाद से सऊदी अरब में सौ से अधिक पाकिस्तानी फांसी पर लटका दिए गए। हर वर्ष संख्या बदलती रही है, लेकिन यह प्रवृत्ति रुकने का नाम नहीं ले रही।
सऊदी जेलों में 7000 से अधिक पाकिस्तानी: भीषण हालात, लंबित मामले
जेलों में बंद 7000 से अधिक पाकिस्तानी नागरिकों की कहानी सिर्फ आंकड़ों की भाषा में नहीं समझी जा सकती।
हर एक कैदी के पीछे एक बूढ़े माता-पिता, एक परिवार, कई अधूरी उम्मीदें और टूटती दुनिया की दास्तान है।
इन कैदियों में से कई को लंबित मुकदमों का सामना करना पड़ रहा है, कुछ को वर्षों से सुनवाई नहीं मिली, और कई ऐसे भी हैं जो मामूली अपराधों में बंद हैं लेकिन जुर्माना या कानूनी प्रतिनिधित्व न मिल पाने के कारण अपनी सज़ा से तीन–चार गुना अधिक समय जेलों में गुजार रहे हैं।
मानवाधिकार संगठनों ने कई बार इन कैदियों की दुर्दशा पर चिंता जताई है। अत्यधिक भीड़, सीमित भोजन, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और परिवारों से लंबे समय तक मुलाकात न हो पाने जैसी समस्याएँ पाकिस्तानियों के लिए और भी कठिन हो जाती हैं क्योंकि वे भाषा व संस्कृति से पूरी तरह भिन्न पृष्ठभूमि से आते हैं।
महिलाओं की स्थिति और भी भयावह
रिपोर्ट्स से पता चलता है कि सऊदी जेलों में 22 पाकिस्तानी महिलाएं भी बंद हैं। इनमें से दो को मौत की सज़ा तक दी जा चुकी है।
पाकिस्तानी महिलाओं का विदेश जाना पहले ही समाज में सीमित होता है, और जो महिलाएं रोजगार की तलाश में घरों से बाहर निकलती हैं, वे कई परतों के जोखिमों का सामना करती हैं – मानव तस्करी, एजेंटों की धोखाधड़ी, किसी दूसरे देश की सांस्कृतिक संरचना में सामंजस्य, श्रम शोषण और कानूनी अनिश्चितताएँ।
जब कोई महिला सऊदी जैसे कठोर कानून वाले देश में किसी मामले में फंस जाती है, तो उसके लिए न्यायिक सहायता और दूतावास से मदद प्राप्त करना और भी जटिल हो जाता है।
पाकिस्तान सरकार का रवैया: उदासीनता या असमर्थता?
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतने बड़े पैमाने पर अपने नागरिकों की गिरफ्तारी, फांसी और बंदी का सामना करने वाली पाकिस्तान सरकार आखिर कर क्या रही है।
ज़िम्मेदारियों का दायरा स्पष्ट है: दूतावास को कानूनी सहायता मुहैया करानी चाहिए, वकीलों से संपर्क करवाना चाहिए, परिवारों को सूचित करना चाहिए और जरूरत पड़ने पर कूटनीतिक प्रयास करने चाहिए।
लेकिन पिछले एक दशक में प्रवासी पाकिस्तानियों ने बार-बार यह शिकायत की है कि दूतावास के दरवाजे उनके लिए मुश्किल से खुलते हैं। कई परिवारों ने बताया कि उन्हें जेल में बंद अपने प्रियजनों की स्थिति के बारे में महीनों तक कोई सूचना नहीं मिली।
ऐसा प्रतीत होता है कि पाकिस्तान सरकार की कई चुनौतियाँ – आंतरिक राजनीतिक तनाव, आर्थिक संकट, कमजोर प्रशासनिक ढांचा – विदेशों में फंसे अपने लोगों तक ध्यान नहीं पहुंचने देतीं।
अपराध, एजेंसी और सऊदी कानून: मूल कारण क्या हैं?
सऊदी अरब में दर्ज मामलों की प्रकृति देखने पर पता चलता है कि कई पाकिस्तानी नागरिक पूरी तरह अपराधी नहीं होते।
इनमें से कई सीधे-साधे मजदूर होते हैं जिन्हें एजेंट गलत जानकारी देकर भेज देते हैं।
कई लोग नए देश के कानूनों से अनभिज्ञ रहते हैं।
कुछ मामलों में ट्रैवल एजेंसियां, मानव तस्करी करने वाले दल, और अवैध व्यवहार कराने वाले गिरोह इन प्रवासियों को अपराधों में धकेल देते हैं।
लेकिन यह भी सच है कि कुछ प्रतिशत लोग ड्रग्स के अवैध कारोबार और संगठित अपराध से जुड़े पाए जाते हैं, जिसका पूरा दंश हजारों निर्दोष प्रवासियों को भी झेलना पड़ रहा है।
फांसी के मामलों में कानूनी सहायता की कमी
सऊदी अरब में जब किसी विदेशी पर गंभीर आरोप लगता है तो उसे जिस समर्थन की आवश्यकता होती है, वह अक्सर उपलब्ध नहीं होता।
भाषा समझ न आने से अदालत में बयान गलत हो जाते हैं।
कई लोगों को यह पता ही नहीं होता कि वे जो दस्तावेज़ साइन कर रहे हैं, उसमें क्या लिखा हुआ है।
वकील नियुक्त न होने या उचित अनुवादक न मिलने से मुकदमा एकतरफा हो जाता है।
और जब निर्णय सुनाया जाता है, तब परिवार को अक्सर यह जानकारी बहुत देर से मिलती है।
खाड़ी देशों में पाकिस्तानियों की बदलती छवि
पिछले दशक में सऊदी अरब, यूएई और अन्य खाड़ी देशों ने बार-बार पाकिस्तानियों के बढ़ते अपराधों पर चिंता जताई है।
इससे पाकिस्तानी पासपोर्ट पर संदेह बढ़ा है, वीजा प्रतिबंधों में इजाफा हुआ है, और रोजगार के अवसर भी सिकुड़ रहे हैं।
कुछ वर्षों पहले तक जिस पासपोर्ट पर मध्य पूर्व के कई देशों में प्रवेश सरल था, आज वही पासपोर्ट कई सुरक्षा जांचों में फंस जाता है।
पाकिस्तानियों का दर्द: प्रवासी जीवन से टूटते रिश्ते
कई पाकिस्तानी परिवारों के लिए यह त्रासदी सिर्फ जेल या सज़ा तक सीमित नहीं रहती।
फांसी की खबरें परिवार की दुनिया पलट देती हैं।
जिन परिवारों का एकमात्र कमाने वाला सदस्य सऊदी में फंस जाता है, वे आर्थिक, सामाजिक और मानसिक रूप से टूट जाते हैं।
कई मां-बाप अपने बेटों के शव तक नहीं देख पाते क्योंकि सऊदी अरब फांसी के बाद शव अक्सर परिवार को नहीं सौंपता।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका और आगे का रास्ता
यह विषय सिर्फ पाकिस्तान और सऊदी के संबंधों तक सीमित नहीं है।
मानवाधिकार संगठन लगातार जोर दे रहे हैं कि विदेशी कैदियों को पर्याप्त कानूनी सहायता, पारदर्शी सुनवाई और दूतावास की मदद मिलनी चाहिए।
भविष्य में यह आवश्यक है कि पाकिस्तान सरकार अपने नागरिकों के लिए प्रभावी कूटनीतिक व्यवस्था बनाए, प्रवासियों को भेजने से पहले प्रशिक्षण और कानूनी जानकारी प्रदान करे, और विदेशी जेलों में बंद लोगों की निगरानी का सिस्टम विकसित करे।
