संसद के शीतकालीन सत्र में गुरुवार का दिन पूरी तरह उस ‘धुएं’ के नाम रहा, जिसने विधायी चर्चाओं को पीछे छोड़ दिया और पूरे सदन को हलचल में डाल दिया। यह धुआं किसी आर्थिक बहस, किसी चुनौतीपूर्ण बिल या किसी बड़े राजनीतिक विवाद का नहीं था, बल्कि ई सिगरेट की गंध और उसके बाद सांसदों की जवाबी कार्रवाइयों से उपजा अनोखा तमाशा था, जिसने वातावरण को इतना गर्म कर दिया कि इस एक मामले ने दिनभर की सारी राजनीतिक हलचल पर भारी पड़ गया। ऐसा कम ही होता है जब सदन की कार्यवाही के दौरान सांसदों की गतिविधियां बहस के केंद्र में आ जाएं और विधायी कामकाज पीछे छूट जाए। लेकिन इस बार ऐसा ही हुआ।

दिन की शुरुआत अन्य दिनों की तरह शांतिपूर्वक हुई थी। सांसद अपनी सीटों पर थे, सदन में कार्यवाही चल रही थी। लेकिन कुछ ही देर बाद वातावरण में कुछ अलग सा महसूस हुआ। हमीरपुर से सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने अचानक अपनी सीट से उठकर स्पीकर का ध्यान एक ऐसी बात की ओर खींचा, जिसने पूरा सदन चौंका दिया। उन्होंने दावा किया कि सदन के भीतर ई सिगरेट की गंध महसूस की जा रही है और कुछ धुआं भी देखा गया है। यह एक सामान्य शिकायत नहीं थी, बल्कि ऐसा आरोप था, जिसने सभी की भौहें तनकर रख दीं।
अनुराग ठाकुर ने इस मसले को बेहद गंभीरता से उठाया और कहा कि जिस देश में साल 2019 से ई सिगरेट का निर्माण, आयात और बिक्री पूरी तरह प्रतिबंधित है, उसी देश की संसद के भीतर इस प्रतिबंधित वस्तु का उपयोग किसी भी रूप में नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि संसद देश का सर्वोच्च विधायी मंच है और उसके भीतर यदि कानून तोड़े जाते दिखें, तो यह न सिर्फ नियमों का उल्लंघन है, बल्कि संसद की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली बात भी है। उनका यह कहना बाकी सांसदों के बीच हलचल पैदा करने के लिए पर्याप्त था।
इस आरोप के बाद सदन में कुछ पल के लिए सन्नाटा पसर गया। किसी का नाम नहीं लिया गया था, इसलिए शक की सुई इधर से उधर घूमती रही। लेकिन राजनीतिक हलचल का केंद्र तुरंत तृणमूल कांग्रेस के सांसदों की ओर इशारा करने लगा, क्योंकि बयान के संकेत वहां की तरफ जाते दिख रहे थे। हालांकि ठाकुर ने किसी का सीधे नाम नहीं लिया, लेकिन राजनीतिक वातावरण इतना संवेदनशील था कि मामला तुरंत तूफान का रूप ले बैठा।
लोकसभा अध्यक्ष ने भी इस मुद्दे को हल्के में नहीं लिया। सूत्रों के अनुसार उन्होंने तत्काल सदन के सीसीटीवी फुटेज मंगवाए, ताकि आरोप की पुष्टि की जा सके। हालांकि बाद में उन्होंने सभी सांसदों से सदन की मर्यादा और नियमों का पालन करने की अपील की और मामला फिलहाल शांत किया, लेकिन यह आग अभी बुझी नहीं थी।
सदन के अंदर का यह विवाद शांत भी नहीं हुआ था कि बाहर परिसर में एक और दृश्य सामने आ गया, जिसने वातावरण को और अधिक गरमा दिया। तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय संसद परिसर में खुले में सिगरेट पीते हुए दिखाई दिए। उसी समय केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह और जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत वहां से गुजर रहे थे। उन्होंने सौगत रॉय को देखते ही इस पर टिप्पणी की, और बाद में यह वीडियो गलियारों में चर्चा का विषय बन गया।
भाजपा नेताओं ने इसे संसद की गरिमा के खिलाफ बताया और कहा कि एक सांसद होने के नाते कम से कम अनुशासन और मर्यादा का पालन करना चाहिए। उधर, सौगत रॉय ने इस सवाल पर नाराजगी जताते हुए कहा कि संसद भवन के अंदर सिगरेट पीना मना जरूर है, लेकिन परिसर के खुले हिस्सों में इसकी मनाही नहीं है। उन्होंने कहा कि गजेंद्र सिंह शेखावत कोई स्पीकर नहीं हैं और इसलिए उन्हें जवाब देने की कोई बाध्यता नहीं है।
दोनों पक्षों के बयान एक बार फिर बहस को हवा देते रहे और देखते ही देखते यह मामला सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चा का विषय बन गया। भाजपा इसे विपक्ष की गंभीरता की कमी बता रही थी, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने इसे सरकार द्वारा मुद्दों को भटकाने का तरीका बताकर पलटवार किया।
राजनीति में ऐसी घटनाएं अक्सर दलों को एक दूसरे के कटघरे में खड़ा कर देती हैं। लेकिन इस बार विवाद कानून, संसद की मर्यादा और सांसदों के व्यवहार जैसे गंभीर विषयों से जुड़ा था। सदन में ई सिगरेट का उपयोग न सिर्फ प्रतिबंधित है बल्कि सार्वजनिक स्थान पर किसी भी प्रकार की सिगरेट या इलेक्ट्रॉनिक धूम्रपान उपकरण का उपयोग संविधान और नियमों के विरुद्ध है। ऐसे में यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि क्या सांसदों को खुद के लिए कोई विशेष छूट मिल जाती है, जबकि वही आम लोगों के लिए कानून बनाते और उन्हें पालन करने के लिए कहते हैं।
शीतकालीन सत्र के इस धुएंदार विवाद ने एक बार फिर इस बात को रेखांकित किया कि संसद में नियमों की अवहेलना के मामले समय-समय पर सामने आते रहते हैं। लेकिन जब यह उल्लंघन उन लोगों द्वारा किया जाता है, जो कानून और नियमों के संरक्षक माने जाते हैं, तब यह और अधिक गंभीर बन जाता है।
यह पूरा विवाद केवल ई सिगरेट तक सीमित नहीं था। इसके पीछे यह चिंता भी छिपी हुई थी कि संसद का वातावरण, उसकी प्रतिष्ठा और उसकी गरिमा किस तरह से बनाए रखी जाए। यह वही संस्था है जहां से देश की दिशा तय होती है, जहां से बड़ी नीतियां बनती हैं और जहां हर कार्रवाई का प्रतीकात्मक महत्व होता है। ऐसे में धूम्रपान जैसे मामूली दिखने वाले व्यवहार भी बड़े राजनीतिक अर्थ ले लेते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने इस बात की भी ओर संकेत किया कि राजनीतिक दल अपने-अपने पक्ष को मजबूती देने में कोई कसर नहीं छोड़ते। भाजपा ने इसे विपक्ष की गंभीरता पर सवाल उठाने का मौका माना, वहीं तृणमूल कांग्रेस ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह असल मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है। हर पक्ष अपने तर्क लेकर आया और कुछ ही घंटों में यह विवाद संसद की बहसों की राह पकड़ चुका था।
हालांकि स्पीकर ने मामले को शांत करने की कोशिश की, लेकिन इस घटना ने सांसदों के आचरण पर एक नई बहस को जन्म दे दिया। प्रश्न यह उठता है कि क्या केवल नियम बनाना पर्याप्त है, या उन्हें पालन करवाने के लिए सख्त निगरानी और कठोर रवैया अपनाना भी जरूरी है। सदन की गरिमा केवल भाषणों या सत्रों से नहीं बनती, बल्कि उस माहौल से भी बनती है जिसमें सांसद अपना व्यवहार प्रदर्शित करते हैं।
सत्र समाप्त होने के बाद भी चर्चा खत्म नहीं हुई। राजनीतिक विशेषज्ञों ने टिप्पणी की कि ई सिगरेट और धुएं का यह विवाद भले ही छोटा दिखे, लेकिन इसके भीतर बड़े सवाल छिपे हुए हैं। संसद की गरिमा, सांसदों का अनुशासन, नियमों का पालन और राजनीतिक जवाबदेही जैसे मुद्दे इस घटना के माध्यम से एक बार फिर उभरकर सामने आए हैं।
शीतकालीन सत्र के इस एक दिन ने यह साबित कर दिया कि संसद केवल कानून पारित करने की जगह नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेशों का मंच भी है। यहां किया गया हर कार्य और यहां बोले गए हर शब्द का अपना महत्व होता है। इसलिए जब कोई सांसद ऐसा व्यवहार करता है जो नियमों के अनुरूप नहीं होता, तो वह केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे सदन की गरिमा का प्रश्न बन जाता है।
ई सिगरेट की गंध से शुरू हुआ विवाद अब पूरी तरह से एक राजनीतिक बहस में बदल चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस मामले पर कोई औपचारिक कार्रवाई होगी या यह केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रह जाएगा। लेकिन इतना तय है कि इस घटना ने संसद की मर्यादा को बनाए रखने की जिम्मेदारी को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है और इसने यह सोचने पर मजबूर किया है कि जनता जिन प्रतिनिधियों को चुनकर संसद भेजती है, उनसे वह कितना अनुशासन और जिम्मेदारी की उम्मीद रख सकती है।
