देश की संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होते ही विपक्ष के हंगामे और स्थगनों ने इसे विवादास्पद बना दिया। सोमवार को लोकसभा और राज्यसभा दोनों ही सदनों में चर्चा का क्रम शुरू हुआ, लेकिन विपक्ष के विरोध और SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन) पर जोरदार नारेबाजी के कारण सदन को बार-बार स्थगित करना पड़ा। इसका सीधा असर यह हुआ कि पूरे दिन का निर्धारित समय बर्बाद हो गया और कई महत्वपूर्ण विधायिका कार्य रुक गए।

संसद का यह शीतकालीन सत्र पहले से ही राजनीतिक दृष्टिकोण से संवेदनशील माना जा रहा था, क्योंकि इसमें वित्तीय और प्रशासनिक मामलों पर बहस होना तय था। हंगामे के कारण न केवल कार्यवाही बाधित हुई, बल्कि जनता का महत्वपूर्ण धन भी व्यर्थ चला गया। यह स्थिति पिछले मानसून सत्र की तरह ही कम उत्पादकता और बढ़ते हंगामे की याद दिलाती है।
मानसून सत्र का सबक
मानसून सत्र में भी लोकसभा और राज्यसभा की उत्पादकता काफी कम रही थी। लोकसभा में 37.1 घंटे और राज्यसभा में 49.9 घंटे ही काम हुआ, जबकि अपेक्षित समय 126 घंटे था। इसका मतलब यह हुआ कि लोकसभा में 88.9 घंटे और राज्यसभा में 76.1 घंटे कार्यवाही के लिए बर्बाद हो गए। प्रश्नकाल, विधायकी कार्य और अन्य गैर-विधायकी कार्यों के दौरान भी हंगामे ने समय को प्रभावित किया।
संसद के प्रत्येक घंटे का खर्च भी बेहद महंगा है। पूर्व संसदीय कार्य मंत्री के अनुसार, लोकसभा के एक मिनट का खर्च लगभग 2.5 लाख रुपये और राज्यसभा का 1.25 लाख रुपये होता है। इस हिसाब से केवल मानसून सत्र में ही लोकसभा में 133 करोड़ 35 लाख और राज्यसभा में 57 करोड़ रुपये बर्बाद हुए थे।
शीतकालीन सत्र में हंगामा
शीतकालीन सत्र के पहले दिन, सोमवार को लोकसभा में श्रद्धांजलि के बाद SIR पर नारेबाजी हुई। दोपहर 12 बजे शुरू हुई कार्यवाही दोपहर 2:12 बजे स्थगित कर दी गई। वित्त मंत्री ने मणिपुर जीएसटी (दूसरा संशोधन) बिल पेश किया, जो पास हो गया, लेकिन विपक्ष की हंगामेदार प्रतिक्रिया ने सामान्य कामकाज बाधित कर दिया।
मंगलवार को भी स्थिति अनुकूल नहीं रही। सुबह 11 बजे शुरू हुई बैठक कुछ ही मिनटों में विपक्ष के ‘वोट चोरी’ नारों के कारण स्थगित हो गई। संसदीय कार्य मंत्री ने कहा कि SIR पर चर्चा पर विचार किया जा रहा है, लेकिन समय सीमा तय नहीं की जा सकती। विपक्ष और सरकार के बीच लगातार टकराव ने यह दर्शाया कि राजनीतिक संघर्ष जनता के पैसे और समय की बर्बादी का कारण बन रहा है।
हंगामे का वित्तीय प्रभाव
संसद में हंगामा सिर्फ समय की बर्बादी ही नहीं है, बल्कि इसका आर्थिक नुकसान भी भारी है। लोकसभा और राज्यसभा में हर घंटे खर्च होने वाला धन जब अनावश्यक स्थगनों और हंगामे में चला जाता है, तो यह सीधे जनता के टैक्स का दुरुपयोग है। इस शीतकालीन सत्र के दो दिनों में ही लगभग 190 करोड़ 42.5 लाख रुपये का नुकसान हो चुका है।
यह नुकसान केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी चिंताजनक है। जनता की अपेक्षा होती है कि सांसद समय पर विधायिका कार्य पूरा करें और महत्वपूर्ण नीतियों पर निर्णय लें, लेकिन बार-बार स्थगन और हंगामा इसे असंभव बना देता है।
विपक्ष और सरकार की स्थिति
विपक्ष का कहना है कि SIR एक प्रकार का वोट चोरी का हथकंडा है और इस पर खुलकर चर्चा होना चाहिए। वहीं सरकार इस पर चर्चा टाल रही है, जिससे दोनों पक्षों के बीच टकराव बढ़ रहा है। राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, इस स्थिति से संसद की उत्पादकता पर स्थायी प्रभाव पड़ सकता है और जनता का विश्वास भी कमजोर हो सकता है।
संसद में यह स्थिति इस बात का प्रमाण है कि बिना सहमति और संवाद के, राजनीतिक असहमति केवल हंगामे और समय की बर्बादी की ओर ले जाती है। विपक्ष और सरकार दोनों को अब संयम और समझदारी से कार्यवाही करनी होगी, ताकि आर्थिक और राजनीतिक नुकसान को रोका जा सके।
सामाजिक और मीडिया प्रभाव
संसद में हंगामे और स्थगनों की खबरें मीडिया और सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं। जनता इस पर अपनी राय व्यक्त कर रही है और राजनीतिक जागरूकता बढ़ रही है। मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह निष्पक्ष और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग करे, ताकि अफवाहें और गलत सूचनाएं न फैलें।
सामाजिक दृष्टिकोण से यह स्थिति चिंता का विषय है। जनता अपेक्षा करती है कि उनके प्रतिनिधि समय पर कार्य करें और महत्वपूर्ण निर्णय लें। हंगामे और स्थगनों से यह विश्वास कमजोर हो रहा है।
निष्कर्ष
संसद का शीतकालीन सत्र यह साबित करता है कि राजनीतिक असहमति और हंगामा केवल समय और धन की बर्बादी ही नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की उत्पादकता और जनता की अपेक्षाओं पर भी प्रभाव डालता है। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में हंगामा और स्थगन के कारण लाखों करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है।
इस समय राजनीतिक नेताओं और सांसदों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे संवाद, समझदारी और संयम से कार्य करें। जनता की अपेक्षाओं और संसदीय प्रक्रिया की गरिमा को बनाए रखना ही देश की लोकतांत्रिक प्रणाली की मजबूती का प्रतीक है।
यह घटना राजनीतिक विश्लेषकों, आम जनता और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। भविष्य में यह देखना आवश्यक होगा कि सांसद हंगामे को कम करके अपने दायित्वों को पूरा करने की दिशा में कदम उठाते हैं या नहीं।
