कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को यह सिखाया कि किसी भी नए वायरस को हल्के में लेना कितना खतरनाक हो सकता है। जिस संक्रमण को शुरुआत में सीमित माना गया था, वही कुछ महीनों में वैश्विक आपदा बन गया। अब एक बार फिर वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ने लगी है। इस बार आशंका का केंद्र पालतू सुअर हैं, जिनमें पाए जाने वाले आंत्र और इन्फ्लुएंजा वायरस लगातार अपना स्वरूप बदल रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इन वायरसों की समय रहते निगरानी और वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया गया, तो ये इंसानों में नई संक्रामक बीमारी का कारण बन सकते हैं।

इसी संभावित खतरे को देखते हुए भोपाल स्थित राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशुरोग संस्थान, जिसे निहसाद के नाम से जाना जाता है, देश की जैव सुरक्षा में एक अहम भूमिका निभाने जा रहा है। यह संस्थान अब ऐसे अनुसंधान कार्यों का केंद्र बनेगा, जिनका उद्देश्य भविष्य की किसी भी महामारी को जन्म लेने से पहले ही रोकना है।
सुअरों के वायरस क्यों बन रहे हैं खतरे की घंटी
वैज्ञानिक शोधों में सामने आया है कि सुअरों में पाए जाने वाले कई वायरस इंसानों के वायरस से जैविक रूप से काफी मिलते-जुलते हैं। यही कारण है कि सुअर को कई बार ‘मिक्सिंग वेसल’ कहा जाता है, जहां अलग-अलग वायरस आपस में मिलकर नया और ज्यादा खतरनाक रूप ले सकते हैं। आंत्र वायरस और इन्फ्लुएंजा वायरस विशेष रूप से चिंता का विषय हैं क्योंकि ये तेजी से म्यूटेशन करते हैं।
म्यूटेशन का अर्थ है वायरस का बार-बार अपना जेनेटिक ढांचा बदलना। जब वायरस ऐसा करता है, तो इंसानी इम्यून सिस्टम उसे पहचानने में समय लेता है। इसी दौरान संक्रमण तेजी से फैल सकता है। यही वह स्थिति थी, जिसने अतीत में कई घातक महामारियों को जन्म दिया।
भोपाल का निहसाद बनेगा सुरक्षा कवच
इन खतरों को भांपते हुए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने अपने नेशनल वन हेल्थ मिशन के तहत निहसाद को दो महत्वपूर्ण शोध परियोजनाएं सौंपी हैं। ये परियोजनाएं केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं होंगी, बल्कि जमीनी स्तर पर मानव और सुअर के बीच संपर्क से जुड़े हर पहलू का अध्ययन करेंगी।
निहसाद, जो पहले से ही उच्च सुरक्षा मानकों वाली प्रयोगशालाओं के लिए जाना जाता है, अब इस दिशा में देश का प्रमुख अनुसंधान केंद्र बनने जा रहा है। यहां होने वाला शोध भविष्य की वैक्सीन रणनीतियों और महामारी रोकथाम की नीति तय करने में निर्णायक साबित हो सकता है।
मानव और सुअर के बीच बढ़ता संपर्क, बढ़ता जोखिम
भारत के कई ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में सुअर पालन आजीविका का एक महत्वपूर्ण साधन है। इन इलाकों में इंसानों और सुअरों का संपर्क बेहद नजदीकी होता है। यही नजदीकियां वायरस के इंसानों में प्रवेश का रास्ता बन सकती हैं।
पहली शोध परियोजना का फोकस इसी मानव-शूकर इंटरफेस पर रहेगा। वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश करेंगे कि क्या सुअरों में मौजूद जूनोटिक आंत्र वायरस अब इंसानी कोशिकाओं को संक्रमित करने की क्षमता विकसित कर चुके हैं। अगर ऐसा पाया गया, तो यह संकेत होगा कि जानवरों से इंसानों में फैलने वाली नई बीमारी की नींव पड़ चुकी है।
इस अध्ययन के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से सुअरों के नमूने एकत्र किए जाएंगे। इन नमूनों को भोपाल लाकर निहसाद की अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं में जांचा जाएगा।
इन्फ्लुएंजा वायरस पर गहन वैज्ञानिक नजर
दूसरी शोध परियोजना इन्फ्लुएंजा वायरस की विविधता और उसके जेनेटिक स्वरूप को समझने पर केंद्रित होगी। इन्फ्लुएंजा वायरस को दुनिया के सबसे चालाक और तेजी से बदलने वाले वायरसों में गिना जाता है। यही कारण है कि हर साल फ्लू के नए स्ट्रेन सामने आते हैं और वैक्सीन को भी लगातार अपडेट करना पड़ता है।
निहसाद के वैज्ञानिक इन वायरसों की जेनेटिक मैपिंग करेंगे। इसका उद्देश्य यह जानना है कि वायरस किस दिशा में विकसित हो रहा है और आगे चलकर वह कितना खतरनाक रूप ले सकता है। इस शोध से मिलने वाली जानकारी के आधार पर भविष्य की वैक्सीन रणनीति तैयार की जाएगी।
वैक्सीन रणनीति पर क्यों है खास जोर
कोरोना महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि वैक्सीन ही किसी भी बड़े संक्रमण से निपटने का सबसे प्रभावी हथियार है। लेकिन वैक्सीन तभी कारगर होती है, जब वह वायरस के मौजूदा और संभावित स्वरूप के अनुरूप हो।
निहसाद में चलने वाली यह रिसर्च इसी दिशा में काम करेगी। वैज्ञानिक पहले ही यह समझने की कोशिश करेंगे कि वायरस आगे चलकर किस तरह म्यूटेट कर सकता है। इससे समय रहते ऐसी वैक्सीन विकसित की जा सकेगी, जो बड़े प्रकोप से पहले ही सुरक्षा प्रदान कर सके।
अत्याधुनिक लैब और उच्च सुरक्षा मानक
इन दोनों परियोजनाओं पर काम निहसाद की बायो-सेफ्टी लेवल-3 प्रयोगशालाओं में किया जाएगा। यह वह स्तर होता है, जहां अत्यधिक संक्रामक वायरसों पर सुरक्षित तरीके से शोध किया जा सकता है। यहां वैज्ञानिक पूरी सुरक्षा के साथ वायरस की संक्रमण क्षमता, उसकी ताकत और इंसानों पर संभावित असर का आकलन करेंगे।
निहसाद की यह क्षमता उसे देश के गिने-चुने संस्थानों में शामिल करती है, जहां इस स्तर का संवेदनशील शोध संभव है।
विशेषज्ञों की चेतावनी और उम्मीद
निहसाद के वरिष्ठ वैज्ञानिकों का मानना है कि सुअरों में वायरस का म्यूटेशन इस बात का संकेत है कि प्रकृति में कुछ बड़े बदलाव हो रहे हैं। जब कोई वायरस जानवरों से इंसानों में छलांग लगाता है, तो वह अक्सर ज्यादा खतरनाक साबित होता है क्योंकि इंसानी शरीर उसके लिए तैयार नहीं होता।
इसीलिए यह शोध केवल वैज्ञानिक महत्व का नहीं, बल्कि मानवता की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। समय रहते किए गए ये अध्ययन भविष्य में लाखों जिंदगियों को बचा सकते हैं।
भविष्य की महामारियों से बचाव की दिशा में बड़ा कदम
देशभर के अलग-अलग केंद्रों से सुअरों के नमूने इकट्ठा कर भोपाल लाए जाएंगे। यहां उनका गहन विश्लेषण किया जाएगा। यह पूरी प्रक्रिया आने वाले वर्षों में भारत की महामारी रोकथाम नीति की नींव मजबूत करेगी।
कोरोना जैसी किसी भी भयानक स्थिति से दोबारा न गुजरना पड़े, इसके लिए यह शोध बेहद आवश्यक है। भोपाल का निहसाद अब केवल एक शोध संस्थान नहीं, बल्कि संभावित महामारियों के खिलाफ देश की ढाल बनता जा रहा है।
