भारतीय फ़िल्म उद्योग अक्सर ग्लैमर, वंश परंपरा और प्रतिष्ठा के भार में डूबा दिखाई देता है। यहां आने वाला हर कलाकार केवल अभिनय नहीं लाता, बल्कि अपने पीछे एक सामाजिक छवि, खानदानी दबाव और एक अदृश्य अपेक्षा लेकर चलता है। ऐसी स्थिति में किसी भी अभिनेता से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपने परिवार की मुकम्मल उपलब्धियों को संभाले और उसी भार के साथ अपने करियर को आगे बढ़ाए। यही संदर्भ तब और दिलचस्प हो जाता है जब चर्चा रणबीर कपूर जैसे कलाकार की हो, जिनके पीछे चार पीढ़ियों की महान विरासत खड़ी है।

उधर दूसरी ओर, एक ऐसी कला और सोच के व्यक्ति हैं—पीयूष मिश्रा। वह अभिनय हों, थिएटर हो, लेखन हो या संगीत—हर विधा में अलग सांचे के कलाकार हैं। जब ऐसा व्यक्ति किसी और कलाकार के व्यक्तित्व पर टिप्पणी करता है, तो वह सामान्य राय नहीं रहती, बल्कि गहरी समझ और अनुभव की उपज बन जाती है।
हाल ही में पीयूष मिश्रा ने रणबीर कपूर के व्यक्तित्व, उनके व्यवहार और उनकी सरलता को लेकर एक ऐसा बयान दिया, जिसने पूरे मनोरंजन जगत में चर्चा का नया विषय खोल दिया। उनकी बात में केवल सराहना नहीं थी, बल्कि एक अनोखे अंदाज में वर्णन था, जिसने पाठकों को यह महसूस कराया कि संभवतः रणबीर की वह छवि सामने ही पहली बार आई है, जिसपर शायद ही कभी गंभीरता से विचार किया गया हो।
कपूर खानदान: चार पीढ़ियों की विरासत का भार
भारतीय सिनेमा का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, तो उसमें कपूर परिवार का उल्लेख केवल पारिवारिक कथा नहीं बल्कि सांस्कृतिक प्रभाव के रूप में दर्ज होगा।
पृथ्वीराज कपूर, जिन्होंने थिएटर और शुरुआती फ़िल्म उद्यम में अभिनय को नए स्तर पर स्थापित किया।
उसके बाद राज कपूर—जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सिनेमा का चेहरा कहा गया।
फिर ऋषि कपूर, जिनका अभिनय, ऊर्जा और स्क्रीन प्रेज़ेंस 80 और 90 के दशक में भारतीय रोमांस की पहचान बनी।
ऐसे घर में जन्म लेने वाले रणबीर कपूर के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि वह आने वाली पीढ़ियों की तुलना के बोझ से बाहर निकलें।
और उन्होंने ऐसा किया भी।
रणबीर ने कभी यह नहीं जताया कि वह इस विरासत को ढोते हैं। बल्कि इन्होंने अभिनय को एक स्वतंत्र यात्रा की तरह लिया। यही बात पीयूष मिश्रा के कथन में बड़े विस्तार से सामने आई।
पीयूष मिश्रा की बात: नंगेपन की परिभाषा और कलाकार का स्वभाव
पीयूष मिश्रा ने कहा—
“इतना नंगा-बेशर्म आदमी मैंने आज तक नहीं देखा।”
यह कथन बाहरी अर्थ में नहीं, बल्कि व्यवहारिक आज़ादी की व्याख्या थी।
जब कोई कलाकार कैमरे के सामने होता है तो उसे संवाद, भाव, दबाव और निर्देशन का पालन करना होता है, लेकिन शूट खत्म होते ही अधिकांश कलाकार उसी किरदार में मानसिक रूप से टिके रहते हैं। कई बार यह थकान, तनाव और व्यक्तित्व परिवर्तन तक ले जाता है।
लेकिन रणबीर उससे अलग हैं।
पीयूष के अनुसार कैमरा बंद होते ही रणबीर एकदम सहज, बिल्कुल मुक्त होकर घूमते हैं। ना घमंड, ना छवि, ना सम्मान का दिखावटी वजन—सिर्फ एक सामान्य, बिंदास इंसान।
ऐसे कलाकार कम मिलते हैं।
यह बात पीयूष ने केवल प्रशंसा में नहीं कही, बल्कि कलाकार की दुर्लभ प्रकृति के रूप में कही।
रणबीर के व्यवहार में एक और आकर्षण यह है कि वह अपने परिवार के सम्मानों, उपलब्धियों या उपाधियों को अपने व्यवहार में, अपनी बातचीत में, या अपने आचरण में परिवर्तित नहीं करते।
उनके व्यवहार में यह नहीं दिखाई देता कि वह पृथ्वीराज, राज या ऋषि कपूर के वारिस हैं।
बल्कि वे केवल रणबीर हैं — एक अभिनेता, एक सहकर्मी, एक सामान्य व्यक्ति।
रॉकस्टार से तमाशा तक का अनुभव
पीयूष और रणबीर ने दो फिल्मों में साथ काम किया:
- रॉकस्टार
- तमाशा
दोनों फिल्में अभिनय आधारित, भावुकता से गढ़ी गई और नाटकीय ढांचे वाली फ़िल्में थीं।
रॉकस्टार में रणबीर के किरदार जॉर्डन का भावनात्मक उफान और संघर्ष था। वहीं तमाशा में उनकी मनोवैज्ञानिक उलझन और स्वयं की पहचान का सवाल।
ऐसे किरदार एक कलाकार से भावनात्मक रूप से गहरे समर्पण की मांग करते।
पीयूष ने बताया कि सेट पर वह अत्यंत अनुशासित और गंभीर होते थे। कैमरे पर आते ही वे दूसरे व्यक्ति में तब्दील हो जाते।
लेकिन कट होने के बाद?
फिर स्वतंत्रता की चरम सीमा।
वे हँसते, खेलते, चुटकुले सुनाते, किसी दबाव में नहीं।
यह भावनात्मक दूरी ही एक कलाकार की मानसिक सुरक्षा का तरीका हो सकती है।
इरफान खान का जिक्र: संवेदनशील विराम
जब बातचीत इरफान खान तक पहुँची, तो पीयूष शांत हो गए।
उन्होंने कहा—
“इरफान बहुत जल्दी चले गए… दुख आज भी होता है।”
इरफान जैसे कलाकार दुर्लभ होते हैं।
वे अभिनय नहीं करते थे, बल्कि उसमें प्रवाह बन जाता था।
यहां पीयूष ने स्वीकार किया कि वह और इरफान अत्यंत करीबी नहीं थे। लेकिन उनके बीच पारस्परिक सम्मान था।
“तुमने अच्छा काम किया”—बस इतना कहकर ही एक रिश्ता बन गया था।
रणबीर का वर्तमान सफ़र: स्वतंत्र पहचान की राह
आज रणबीर कपूर अनेक बड़े प्रोजेक्ट में हैं।
- लव एंड वॉर
- रामायणम्
दोनों फिल्में अपने पैमाने और किरदारों में भारी और संवेदनशील हैं।
रणबीर अब उन किरदारों की ओर बढ़ रहे हैं, जो संक्रमणशील समाज और मिथकीय भावनाओं की कथा कहें।
उनकी वर्तमान स्थिति यह बताती है कि वह स्टार नहीं, अभिनेता हैं।
उनके संघर्ष दिखते नहीं, लेकिन उनके चुनाव दिखते हैं।
यही उनके व्यक्तित्व की भूमि है।
