भारतीय राजनीति में पारिवारिक विरासत कोई नई बात नहीं है। दशकों से देश की राजनीति में ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिले हैं, जहां पिता के बाद पुत्र या पुत्री ने सियासी कमान संभाली। लेकिन क्या केवल विरासत मिल जाने से राजनीति आसान हो जाती है? क्या पार्टी की बागडोर संभालते ही जनता का भरोसा, संगठन की ताकत और नेतृत्व की धार अपने आप मिल जाती है? हाल के वर्षों में समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव के राजनीतिक सफर ने इन सवालों को और गहरा कर दिया है।

पार्टी चलाना किसी साधारण प्रशासनिक जिम्मेदारी जैसा नहीं होता। यह निरंतर संघर्ष, सामरिक सोच, संगठनात्मक पकड़ और जनभावनाओं को समझने की कला का संगम है। जब किसी पार्टी की नींव किसी करिश्माई नेता ने रखी हो, तब उत्तराधिकारी के सामने चुनौती कई गुना बढ़ जाती है। तुलना स्वाभाविक होती है और अपेक्षाएं असाधारण।
व्यक्तिपूजा की राजनीति और उत्तराधिकार की जटिलता
भारतीय राजनीति में कई दल ऐसे रहे हैं, जिनकी पहचान किसी एक चेहरे से जुड़ी रही है। ऐसी पार्टियों में संगठन अक्सर नेता की छाया में पनपता है, स्वतंत्र रूप से विकसित नहीं हो पाता। जब वही नेता हाशिए पर जाता है या सक्रिय राजनीति से दूर होता है, तब पार्टी का ढांचा कमजोर पड़ने लगता है।
समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल दोनों ही दलों की राजनीति लंबे समय तक अपने संस्थापकों के इर्द-गिर्द घूमती रही। मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव न केवल अपने दलों के अध्यक्ष थे, बल्कि वे पार्टी, संगठन और रणनीति—तीनों के केंद्र में थे। ऐसे में उनके बाद नेतृत्व संभालना किसी भी नए नेता के लिए आसान नहीं हो सकता।
अखिलेश यादव का अनुभव: शिक्षा, आधुनिकता और सीमित प्रभाव
अखिलेश यादव ने विदेश में पढ़ाई की, आधुनिक राजनीति की समझ के साथ राजनीति में कदम रखा और अपेक्षा की गई कि वे समाजवादी पार्टी को नई दिशा देंगे। शुरुआती दौर में उन्हें युवा नेता के रूप में देखा गया, लेकिन समय के साथ पार्टी की पकड़ कमजोर होती चली गई।
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और जटिल राज्य में पार्टी को एकजुट रखना आसान नहीं होता। संगठनात्मक अनुशासन, कार्यकर्ताओं से संवाद और गठबंधन की राजनीति में संतुलन बनाना अनिवार्य होता है। अखिलेश यादव इन मोर्चों पर पूरी तरह सफल नहीं हो पाए। नतीजतन समाजवादी पार्टी का जनाधार कमजोर हुआ और भाजपा लगातार सत्ता में अपनी पकड़ मजबूत करती चली गई।
यह अनुभव इस बात का प्रमाण है कि केवल विरासत, आधुनिक सोच और युवा छवि राजनीति में स्थायी सफलता की गारंटी नहीं होती।
अब तेजस्वी यादव की बारी: उम्मीदें, आशंकाएं और सवाल
बिहार की राजनीति एक बार फिर संक्रमण काल से गुजर रही है। लालू प्रसाद यादव की सक्रिय राजनीति सीमित होने के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि राष्ट्रीय जनता दल की कमान पूरी तरह तेजस्वी यादव को सौंपी जाएगी। उम्र के लिहाज से तेजस्वी युवा हैं, लेकिन राजनीतिक अनुभव और प्रभाव के मामले में उनकी तुलना सीधे लालू यादव से की जा रही है।
यह तुलना ही उनकी सबसे बड़ी चुनौती है। लालू यादव की राजनीति केवल सत्ता तक सीमित नहीं रही। उन्होंने सामाजिक समीकरणों को साधा, विरोधियों को मात दी और विपरीत परिस्थितियों में भी सत्ता को संभाले रखा।
विपरीत हालात में लालू यादव की राजनीतिक दृढ़ता
लालू यादव भारतीय राजनीति के उन नेताओं में शामिल रहे हैं, जिन्होंने सत्ता को केवल संख्या बल से नहीं, बल्कि रणनीतिक कौशल से संभाला। 1988 में अनुभवी नेताओं को पीछे छोड़कर नेता प्रतिपक्ष बनना हो या 1990 में अल्पमत सरकार चलाना—हर मोर्चे पर उन्होंने अपनी राजनीतिक क्षमता का परिचय दिया।
भाजपा, वाम दल, झामुमो और निर्दलीयों के सहयोग से सरकार चलाना आसान नहीं था। गठबंधन की राजनीति में संतुलन साधना, सहयोगियों को नाराज किए बिना सत्ता बनाए रखना और विरोधियों को लगातार घेरना—यह सब लालू यादव की राजनीतिक विशेषता रही।
उन्होंने पांच बार सरकार चलाई, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। इससे पहले कई दिग्गज नेता भी पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए थे।
तेजस्वी यादव और गठबंधन की राजनीति की चुनौती
2025 के विधानसभा चुनावों में तेजस्वी यादव ने अनौपचारिक रूप से कई अहम फैसले लिए। लेकिन अनुभव की कमी साफ नजर आई। महागठबंधन के घटक दलों की वास्तविक ताकत और उनकी जमीनी राजनीति का सही आकलन नहीं हो सका।
चुनावी रणनीति में जातीय समीकरणों पर अत्यधिक भरोसा किया गया, लेकिन उनकी जमीनी हकीकत की गहन जांच नहीं हुई। परिणामस्वरूप ऐसे नेता, जिनका खुद का जनाधार सीमित था, गठबंधन में हावी होते चले गए। कांग्रेस जैसे दलों ने मुख्यमंत्री चेहरे के मुद्दे पर दबाव बनाया और तेजस्वी यादव निर्णायक भूमिका में नजर नहीं आए।
यह सब दर्शाता है कि गठबंधन की राजनीति केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि नेतृत्व के प्रभाव और नियंत्रण से चलती है।
संगठन की कमजोरी और नेतृत्व का संकट
राजनीतिक इतिहास गवाह है कि कमजोर संगठन और कमजोर नेतृत्व किसी भी पार्टी को धीरे-धीरे हाशिए पर ले जाते हैं। बिहार में कभी मजबूत रही सीपीआई इसका उदाहरण है। 1970 के दशक में उसके पास दर्जनों विधायक थे, लेकिन संगठनात्मक कमजोरी और नेतृत्व के अभाव में पार्टी सिमटती चली गई।
यहां तक कि कैडर आधारित दल भी अगर समय के साथ खुद को मजबूत नहीं करते, तो उनका पतन तय हो जाता है। केवल विचारधारा या जातीय आधार पर राजनीति करने वाली पार्टियों का जीवन लंबा नहीं होता।
राजद की संरचना: करिश्मा बनाम संगठन
लालू यादव के दौर में राजद में संगठन औपचारिक रूप से मौजूद था, लेकिन वास्तविक ताकत लालू यादव के व्यक्तित्व में निहित थी। निर्णय, रणनीति और दिशा—सब कुछ एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द केंद्रित था।
जब तक चुनावी जीत मिलती रही, संगठन की कमजोरी छिपी रही। लेकिन लगातार चुनावी हार के बाद अब यह कमी खुलकर सामने आ रही है। तेजस्वी यादव के नेतृत्व में पार्टी को यह अहसास हुआ है कि केवल जातीय आधार पर्याप्त नहीं है।
संगठन को मजबूत करना, कार्यकर्ताओं को महत्व देना और स्थानीय स्तर पर नेतृत्व विकसित करना अनिवार्य है। राजनीति केवल नेताओं से नहीं, बल्कि जमीनी कार्यकर्ताओं से चलती है।
