मध्य प्रदेश से सामने आए एक तलाक और पितृत्व विवाद ने न सिर्फ कानून की दुनिया में बल्कि मेडिकल साइंस के क्षेत्र में भी एक गंभीर चर्चा छेड़ दी है। यह मामला पति और पत्नी के निजी रिश्ते से आगे बढ़कर अब उस सवाल तक पहुंच गया है, जिसे अक्सर लोग सहज रूप से समझ लेते हैं लेकिन वैज्ञानिक आधार पर कम ही परखते हैं। सवाल यह है कि क्या किसी महिला को पति से मिलने के केवल चार दिन बाद यह पता चल सकता है कि वह गर्भवती है?

यह मामला तब चर्चा में आया जब पति ने अदालत में दावा किया कि वह भारतीय सेना में कार्यरत है और लंबे समय तक पत्नी से दूर रहा। पत्नी के बुलावे पर वह अक्टूबर 2015 में कुछ दिनों के लिए घर आया। घर लौटने के महज चार दिन बाद पत्नी ने उसे बताया कि वह गर्भवती है। इसके आठ महीने बाद एक बच्ची का जन्म हुआ। पति ने इस पूरे घटनाक्रम को संदिग्ध बताते हुए बच्ची के डीएनए टेस्ट की मांग की, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
कोर्ट का नजरिया और संदेह का आधार
अदालत के सामने सबसे अहम सवाल यही था कि क्या चार दिन में गर्भावस्था की पुष्टि संभव है। कोर्ट ने इसे सामान्य मानवीय अनुभव और मेडिकल साइंस दोनों के आधार पर संदिग्ध माना। अदालत का कहना था कि अगर पति लंबे समय से पत्नी से नहीं मिला था, तो चार दिन में गर्भवती होने और फिर इसकी पुष्टि हो जाने का दावा सवाल खड़े करता है।
यही वजह रही कि कोर्ट ने पितृत्व की सच्चाई जानने के लिए डीएनए टेस्ट को जरूरी माना। लेकिन इस फैसले ने समाज में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर मेडिकल साइंस इस बारे में क्या कहता है।
प्रेग्नेंसी होने और पता चलने में फर्क
अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि जैसे ही शारीरिक संबंध बने, उसी समय प्रेग्नेंसी हो जाती है और तुरंत उसका पता भी चल सकता है। लेकिन हकीकत इससे काफी अलग है। मेडिकल साइंस के अनुसार गर्भ ठहरना एक प्रक्रिया है, जो कई चरणों में पूरी होती है।
डॉक्टरों का कहना है कि प्रेग्नेंट होने के लिए एक दिन का शारीरिक संबंध काफी हो सकता है, लेकिन यह कहना कि चार दिन में इसकी पुष्टि हो सकती है, वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है।
विशेषज्ञ की राय: मेडिकल साइंस क्या कहता है
इस पूरे विषय पर देश की जानी-मानी गायनेकोलॉजिस्ट और एम्स गायनी की पूर्व एचओडी डॉ. सुनीता मित्तल ने बेहद स्पष्ट और वैज्ञानिक जानकारी दी है। उनके अनुसार गर्भधारण और उसकी पुष्टि के बीच एक निश्चित समय लगता है, जिसे किसी भी आधुनिक टेस्ट से छोटा नहीं किया जा सकता।
डॉ. सुनीता बताती हैं कि जब पुरुष और महिला के बीच शारीरिक संबंध बनते हैं, तो स्पर्म महिला के शरीर में प्रवेश करता है। लेकिन उसी क्षण गर्भधारण नहीं होता। स्पर्म को अंडाणु तक पहुंचने, उसे निषेचित करने और फिर भ्रूण बनने में समय लगता है।
फर्टिलाइजेशन से इम्प्लांटेशन तक का सफर
मेडिकल साइंस के अनुसार स्पर्म और अंडाणु के मिलने के बाद जो कोशिका बनती है, उसे जाइगोट कहा जाता है। यह जाइगोट सबसे पहले फेलोपियन ट्यूब में लगभग दो दिन तक रहता है। इसके बाद यह धीरे-धीरे यूट्रस की ओर बढ़ता है।
यूट्रस में पहुंचने के बाद भी यह तुरंत नहीं चिपकता। यहां इसे दो से तीन दिन और लगते हैं। इसके बाद जो प्रक्रिया होती है, उसे इम्प्लांटेशन कहा जाता है, यानी भ्रूण का गर्भाशय की दीवार में चिपकना। यह प्रक्रिया भी चार से पांच दिन लेती है।
इस पूरी प्रक्रिया को जोड़ें तो शारीरिक संबंध के बाद गर्भ ठहरने में कम से कम आठ से दस दिन का समय लगता है।
प्रेग्नेंसी टेस्ट कब पॉजिटिव होता है
जब भ्रूण गर्भाशय में सफलतापूर्वक इम्प्लांट हो जाता है, तभी महिला के शरीर में एचसीजी हार्मोन बनना शुरू होता है। यही हार्मोन प्रेग्नेंसी टेस्ट में पकड़ में आता है।
डॉ. सुनीता के अनुसार चाहे टेस्ट कितना भी एडवांस क्यों न हो, इंटरकोर्स के दस दिन से पहले एचसीजी हार्मोन की मात्रा इतनी नहीं होती कि टेस्ट में साफ दिखाई दे। यही वजह है कि मेडिकल साइंस में चार दिन में प्रेग्नेंसी की पुष्टि संभव नहीं मानी जाती।
पीरियड मिस होना भी एक अहम संकेत
आमतौर पर महिलाओं को प्रेग्नेंसी का पहला संकेत पीरियड मिस होने से मिलता है। लेकिन पीरियड भी तभी मिस होता है जब इम्प्लांटेशन हो चुका हो और हार्मोनल बदलाव शुरू हो गए हों।
डॉ. सुनीता बताती हैं कि पीरियड मिस होने में भी शारीरिक संबंध के बाद कम से कम 10 से 14 दिन का समय लगता है। ऐसे में चार दिन में प्रेग्नेंसी का पता चलने का दावा मेडिकल साइंस के खिलाफ जाता है।
एडवांस टेस्ट और उनकी सीमाएं
आज बाजार में ऐसे कई प्रेग्नेंसी टेस्ट उपलब्ध हैं, जो पीरियड मिस होने से पहले भी गर्भावस्था का संकेत देने का दावा करते हैं। लेकिन डॉक्टरों के अनुसार ये टेस्ट भी इंटरकोर्स के दस दिन से पहले भरोसेमंद नहीं होते।
इसलिए यह कहना कि किसी महिला को पति से मिलने के चार दिन बाद ही यह पता चल गया कि वह गर्भवती है, एक असामान्य और चौंकाने वाला दावा है।
कोर्ट ने डीएनए टेस्ट को क्यों माना जरूरी
डॉ. सुनीता का कहना है कि अगर यह साबित नहीं होता कि पति बताई गई तारीख से पहले भी पत्नी से मिला था, तो यह गर्भावस्था संदिग्ध मानी जाएगी। यही कारण है कि कोर्ट ने डीएनए टेस्ट की अनुमति दी।
डीएनए टेस्ट आज के समय में पितृत्व तय करने का सबसे विश्वसनीय तरीका है। ऐसे मामलों में भावनाओं से ज्यादा वैज्ञानिक साक्ष्य मायने रखते हैं।
समाज में बढ़ते ऐसे विवाद
डॉ. सुनीता बताती हैं कि ऐसे मामले अब पहले से ज्यादा सामने आ रहे हैं। खासकर लिव-इन रिलेशनशिप के दौरान अगर महिला गर्भवती हो जाती है, तो कई बार परिस्थितियों के चलते जल्दबाजी में शादी हो जाती है।
कुछ मामलों में बाद में शादी किसी और से हो जाती है और बच्चे के पिता को लेकर विवाद खड़ा हो जाता है। ऐसे हालात में डीएनए टेस्ट ही सच्चाई सामने लाने का एकमात्र तरीका बनता है।
भावनाओं, कानून और विज्ञान का टकराव
इस तरह के मामलों में अक्सर भावनाएं, सामाजिक दबाव और कानूनी प्रक्रिया एक-दूसरे से टकराती हैं। महिला के लिए मातृत्व भावनात्मक मुद्दा होता है, वहीं पुरुष के लिए पितृत्व की सच्चाई जीवनभर का सवाल बन जाती है।
मेडिकल साइंस इन दोनों के बीच एक निष्पक्ष रास्ता दिखाता है, जहां तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर निर्णय लिया जाता है।
जागरूकता क्यों जरूरी है
इस पूरे विवाद से एक बात साफ होती है कि समाज में प्रेग्नेंसी और उसके वैज्ञानिक पहलुओं को लेकर जागरूकता की कमी है। लोग अक्सर अधूरी जानकारी के आधार पर निष्कर्ष निकाल लेते हैं।
जरूरी है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में अफवाहों और भावनाओं के बजाय विज्ञान और तथ्यों को महत्व दिया जाए।
निष्कर्ष: क्या चार दिन में पुष्टि संभव है
मेडिकल साइंस साफ तौर पर कहता है कि प्रेग्नेंट होने के लिए एक दिन का शारीरिक संबंध काफी हो सकता है, लेकिन चार दिन में इसकी पुष्टि संभव नहीं है। इसके लिए कम से कम दस दिन का समय जरूरी होता है।
इसी वैज्ञानिक आधार पर कोर्ट ने डीएनए टेस्ट को जायज माना है। आने वाले समय में ऐसे मामलों में विज्ञान और कानून की भूमिका और भी अहम होती जाएगी।
