रूस में अरबपतियों की दुनिया आज एक अजीब विरोधाभास से गुजर रही है। एक तरफ आंकड़े बताते हैं कि यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस में अरबपतियों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है, तो दूसरी तरफ यही अमीर वर्ग अपने राजनीतिक प्रभाव और स्वतंत्र आवाज लगभग पूरी तरह खो चुका है। व्लादिमीर पुतिन के लगभग ढाई दशक लंबे शासन में रूस के तथाकथित ओलिगार्क अब केवल धनवान कारोबारी रह गए हैं, सत्ता के साझेदार नहीं।

यह कहानी केवल धन और राजनीति की नहीं है, बल्कि डर, नियंत्रण, पुरस्कार और दंड की उस व्यवस्था की है, जिसने रूस के सबसे अमीर लोगों को या तो खामोश समर्थक बना दिया या देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
युद्ध के बीच बढ़ती दौलत का विरोधाभास
यूक्रेन युद्ध ने रूस की अर्थव्यवस्था को गहरे झटके दिए, पश्चिमी प्रतिबंधों ने वित्तीय प्रणाली को हिला दिया और रूबल की कीमत भी कमजोर हुई। इसके बावजूद हालिया वर्षों में रूस में अरबपतियों की संख्या फिर से बढ़ी है। फोर्ब्स जैसे वैश्विक आकलनों के अनुसार, 2024 और 2025 तक रूस में अरबपतियों की संख्या 140 तक पहुंच गई, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है।
कुल संपत्ति का आंकड़ा भी चौंकाने वाला है। अरबपतियों की सामूहिक संपत्ति 580 अरब डॉलर के आसपास बताई गई, जो युद्ध से पहले के स्तर के लगभग बराबर है। यह तथ्य पहली नजर में पश्चिमी प्रतिबंधों की विफलता जैसा लगता है, लेकिन इसके पीछे की कहानी कहीं अधिक जटिल है।
पुतिन का मॉडल: इनाम और सजा की नीति
व्लादिमीर पुतिन ने सत्ता संभालने के बाद से ही एक स्पष्ट संदेश दिया था कि रूस में दौलत तभी सुरक्षित है, जब वह सत्ता के साथ तालमेल में हो। जो कारोबारी इस नियम का पालन करते हैं, उनके लिए अवसर खुले रहते हैं। जो सवाल उठाते हैं, उनके लिए रास्ते बेहद संकरे हो जाते हैं।
पूर्व बैंकिंग अरबपति ओलेग टिंकोव की कहानी इस नीति का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। यूक्रेन युद्ध को लेकर सोशल मीडिया पर की गई एक आलोचनात्मक टिप्पणी के बाद उन्हें तुरंत सत्ता के दबाव का सामना करना पड़ा। उनके बैंक पर सरकारी नियंत्रण की धमकी दी गई और उन्हें अपनी जीवन भर की मेहनत का फल बेहद कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा।
टिंकोव के अनुसार, यह सौदा किसी व्यावसायिक बातचीत जैसा नहीं, बल्कि बंधक जैसी स्थिति था। अंततः उन्हें अपनी अरबों डॉलर की संपत्ति गंवानी पड़ी और रूस छोड़कर विदेश में शरण लेनी पड़ी।
पुतिन से पहले ओलिगार्क का दौर
आज की स्थिति को समझने के लिए 1990 के दशक के रूस की ओर देखना जरूरी है। सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस में आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता का दौर था। सरकारी कंपनियों के निजीकरण और कमजोर नियमों के कारण कुछ लोग बेहद तेजी से अमीर बन गए। यही लोग ओलिगार्क कहलाए।
उस समय इन अमीरों के पास केवल पैसा ही नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रभाव भी था। वे सरकारों को प्रभावित कर सकते थे, नीतियों को मोड़ सकते थे और सत्ता के केंद्र में अपनी जगह बना सकते थे। बोरिस बेरेज़ोव्स्की जैसे नाम इस दौर के प्रतीक थे, जिन्होंने खुले तौर पर सत्ता के खेल में भूमिका निभाई।
सत्ता के समीकरण का पलटना
जब पुतिन सत्ता में आए, तो उन्होंने इस समीकरण को पूरी तरह बदल दिया। शुरुआती वर्षों में उन्होंने ओलिगार्क्स को एक स्पष्ट विकल्प दिया: राजनीति से दूर रहो और कारोबार करो, या परिणाम भुगतो। जिन्होंने इस समझौते को स्वीकार किया, वे बचे रहे। जिन्होंने विरोध किया, उन्हें या तो जेल जाना पड़ा, निर्वासन झेलना पड़ा या रहस्यमय परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
बोरिस बेरेज़ोव्स्की का अंत आज भी कई सवाल खड़े करता है। निर्वासन में रहते हुए उनकी मौत ने यह संकेत दिया कि सत्ता से टकराने की कीमत कितनी भारी हो सकती है।
युद्ध और अरबपतियों की खामोशी
24 फरवरी 2022 को जब यूक्रेन पर हमले का आदेश दिया गया, उसी दिन पुतिन ने रूस के सबसे बड़े कारोबारियों को क्रेमलिन बुलाया। उस बैठक का माहौल भय और अनिश्चितता से भरा हुआ था। उपस्थित लोगों के चेहरे पीले थे और भविष्य को लेकर आशंकाएं साफ झलक रही थीं।
पुतिन ने उनसे सहयोग की उम्मीद जताई और यह संदेश दिया कि नए हालात में भी व्यवस्था पहले की तरह चलेगी। इस बैठक के बाद लगभग सभी अरबपति सार्वजनिक रूप से खामोश हो गए। वे जानते थे कि युद्ध का विरोध करना केवल आर्थिक नुकसान ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत खतरे को भी न्योता देना होगा।
शुरुआती नुकसान और बाद का लाभ
युद्ध के पहले साल में रूसी अरबपतियों को भारी नुकसान झेलना पड़ा। प्रतिबंधों, कमजोर मुद्रा और बाजारों की अनिश्चितता के कारण उनकी संपत्ति में औसतन 27 प्रतिशत तक की गिरावट आई। कई अरबपति सूची से बाहर हो गए और रूस में अमीरों की संख्या घट गई।
लेकिन इसके बाद तस्वीर बदलने लगी। रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था ने रक्षा, निर्माण, ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में भारी सरकारी खर्च शुरू किया। इस खर्च से जुड़े कारोबारियों को बड़े ठेके मिले और मुनाफे के नए रास्ते खुले।
वॉर इकोनॉमी और नए अरबपति
युद्ध के चलते रूस में एक नई कारोबारी जमात उभरी। विदेशी कंपनियों के रूस छोड़ने से जो खाली जगह बनी, उसे सत्ता के करीबी व्यवसायियों ने भर दिया। सस्ती कीमतों पर संपत्तियां खरीदी गईं और कम समय में भारी मुनाफा कमाया गया।
विशेषज्ञों के अनुसार, केवल 2024 में ही इसी प्रक्रिया से 11 नए अरबपति उभरे। ये लोग सीधे या परोक्ष रूप से सैन्य आपूर्ति, बुनियादी ढांचे या ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े हुए थे।
पश्चिमी प्रतिबंध: उद्देश्य और परिणाम
पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगाते समय यह उम्मीद की थी कि आर्थिक दबाव से रूसी अरबपति पुतिन के खिलाफ खड़े होंगे। लेकिन हुआ इसका उलटा। संपत्तियों के फ्रीज होने और विदेशों में रास्ते बंद होने से अरबपतियों के पास विकल्प कम हो गए।
वे रूस के भीतर ही सिमट गए और सत्ता के साथ जुड़ना उनकी मजबूरी बन गया। इस तरह प्रतिबंधों ने अनजाने में पुतिन की पकड़ को और मजबूत कर दिया।
विरोध की कीमत
जो थोड़े बहुत अमीर लोग युद्ध के खिलाफ बोले, उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी। किसी को देश छोड़ना पड़ा, किसी की संपत्ति छिन गई और किसी का नाम रहस्यमय घटनाओं से जुड़ गया। यह संदेश पूरे कारोबारी वर्ग तक साफ पहुंच गया कि खामोशी ही सुरक्षा है।
मिखाइल खोदोरकोफ़्स्की की कहानी आज भी रूस में चेतावनी की तरह याद की जाती है। लोकतंत्र समर्थक गतिविधियों के बाद उन्हें जेल भेजा गया और उनकी कंपनी का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।
राजनीति से बाहर, लेकिन व्यवस्था के भीतर
आज के रूसी अरबपति राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित नहीं करते, लेकिन वे व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं। उनकी भूमिका अब सत्ता को चुनौती देने की नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने की है।
वे उत्पादन बढ़ाते हैं, आपूर्ति श्रृंखलाएं संभालते हैं और युद्ध अर्थव्यवस्था को गति देते हैं। बदले में उन्हें मुनाफा कमाने दिया जाता है, लेकिन राजनीतिक चुप्पी की कीमत पर।
डर और स्थिरता का संतुलन
पुतिन की नीति ने एक अजीब संतुलन बना दिया है। एक तरफ अरबपति जानते हैं कि सत्ता से टकराने का अंजाम खतरनाक हो सकता है। दूसरी तरफ वे यह भी जानते हैं कि वफादारी दिखाने पर उन्हें संरक्षण और अवसर मिल सकते हैं।
इस संतुलन ने रूस के अमीर वर्ग को नियंत्रित, अनुशासित और अपेक्षाकृत स्थिर बना दिया है। यही कारण है कि इतने बड़े युद्ध और प्रतिबंधों के बावजूद अंदरूनी विद्रोह की कोई बड़ी आवाज नहीं उठी।
भविष्य की अनिश्चितता
हालांकि यह मॉडल फिलहाल काम करता दिख रहा है, लेकिन इसका भविष्य अनिश्चित है। अगर युद्ध लंबा खिंचता है या आर्थिक दबाव और बढ़ता है, तो यह संतुलन टूट भी सकता है। अरबपतियों की बढ़ती दौलत के बावजूद उनका असंतोष भीतर ही भीतर जमा हो सकता है।
फिलहाल, रूस में अमीर होना सुरक्षित है, बशर्ते सत्ता के सामने सिर झुकाए रखा जाए।
निष्कर्ष
पुतिन के रूस में अरबपतियों की कहानी शक्ति और धन के पारंपरिक रिश्ते को उलट देती है। यहां धन तो बढ़ सकता है, लेकिन स्वतंत्र प्रभाव नहीं। यूक्रेन युद्ध ने इस सच्चाई को और स्पष्ट कर दिया है। रहस्यमय मौतें, निर्वासन, सस्ती बिक्री और खामोशी, यह सब उस व्यवस्था के हिस्से हैं, जिसमें सत्ता सर्वोपरि है।
