इसराइल की राजनीति लंबे समय से अस्थिरता, विरोध और आरोप-प्रत्यारोप के दौर से गुजर रही है, लेकिन जिस विवाद ने हाल के दिनों में सत्ता के गलियारों से लेकर आम जनता तक बेचैनी बढ़ा दी है, वह है क़तरगेट। यह मामला केवल एक राजनीतिक विवाद नहीं रह गया है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति, मीडिया की स्वतंत्रता और सत्ता की नैतिकता से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन चुका है।

प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू पहले ही कई कानूनी और राजनीतिक चुनौतियों से घिरे हुए हैं। ऐसे में क़तरगेट ने उनकी मुश्किलों को और गहरा कर दिया है। इस प्रकरण ने इसराइल के भीतर यह बहस छेड़ दी है कि क्या देश की सर्वोच्च सत्ता के आसपास बैठे लोगों पर विदेशी प्रभाव हावी हो सकता है और यदि हां, तो इसके परिणाम कितने खतरनाक हो सकते हैं।
क़तरगेट की पृष्ठभूमि और विवाद की शुरुआत
क़तरगेट की कहानी उस वक्त सामने आई जब इसराइली मीडिया में ऐसी रिपोर्टें आने लगीं कि प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े कुछ वरिष्ठ सलाहकारों और सहयोगियों ने कथित तौर पर क़तर के हितों को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई। आरोप यह हैं कि इन लोगों ने न केवल राजनीतिक स्तर पर बल्कि मीडिया के जरिए भी क़तर की सकारात्मक छवि गढ़ने की कोशिश की।
यह सब ऐसे समय में सामने आया जब इसराइल ग़ज़ा युद्ध, बंधकों की रिहाई, अंतरराष्ट्रीय दबाव और आंतरिक असंतोष जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दों से जूझ रहा था। ऐसे हालात में किसी भी विदेशी देश के पक्ष में कथित गतिविधियों के आरोप अपने आप में गंभीर माने जाते हैं।
सरकार के भीतर से उठी जांच की मांग
इस विवाद को और गंभीर बना दिया इसराइल के प्रवासी मामलों के मंत्री अमिखाई चिकली के बयान ने। वह मौजूदा सरकार के पहले मंत्री बने जिन्होंने सार्वजनिक रूप से क़तरगेट की पूरी और निष्पक्ष जांच की मांग की। उनके इस बयान ने यह संकेत दिया कि मामला केवल विपक्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्ता पक्ष के भीतर भी बेचैनी बढ़ रही है।
रेडियो इंटरव्यू में चिकली ने क़तरगेट को चौंकाने वाला बताया और कहा कि ऐसे आरोपों का बचाव नहीं किया जा सकता। उन्होंने क़तर को दुश्मन देश की संज्ञा देते हुए यह सवाल उठाया कि क्या इसराइल की नीति और जनमत को प्रभावित करने की कोशिश की गई।
विपक्ष का तीखा हमला और इस्तीफे की मांग
क़तरगेट को लेकर विपक्ष ने प्रधानमंत्री नेतन्याहू पर सीधा हमला बोल दिया है। पूर्व प्रधानमंत्री नेफ़्टाली बेनेट ने इस मामले में नेतन्याहू से इस्तीफे की मांग कर दी। बेनेट का कहना है कि यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विश्वास के साथ किया गया विश्वासघात है।
बेनेट ने आरोप लगाया कि युद्ध के दौरान प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े लोगों ने लालच के चलते क़तर के हितों को प्राथमिकता दी। उन्होंने इसे इसराइल के इतिहास में देशद्रोह का सबसे गंभीर मामला बताया और कहा कि नेतन्याहू खुद इस मामले को दबाने की कोशिश कर रहे हैं।
क़तरगेट क्या है और आरोपों का मूल
क़तरगेट नाम उस कथित नेटवर्क को दिया गया है, जिसमें आरोप है कि प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकारों को क़तर से जुड़े प्रतिनिधियों के जरिए फंडिंग मिली। इस फंडिंग का उद्देश्य इसराइली मीडिया में क़तर के पक्ष में माहौल बनाना बताया जा रहा है।
इन आरोपों ने आम नागरिकों के बीच भी गुस्सा पैदा किया है। कई लोग इसे हितों के टकराव और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मान रहे हैं। खास बात यह है कि क़तर पर लंबे समय से हमास के नेताओं को शरण देने और उन्हें आर्थिक मदद पहुंचाने के आरोप लगते रहे हैं, जिससे इस मामले की संवेदनशीलता और बढ़ जाती है।
शिन बेट की भूमिका और विवाद की तीव्रता
इस मामले की जांच सबसे पहले इसराइल की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी शिन बेट ने शुरू की थी। बाद में जब नेतन्याहू ने शिन बेट प्रमुख को हटाने की कोशिश की, तो इस विवाद ने और तूल पकड़ लिया। आलोचकों का कहना है कि यह कदम जांच को कमजोर करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
नेतन्याहू ने हालांकि इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए इसे राजनीतिक शिकार अभियान बताया है। उनका कहना है कि यह सब उन्हें सत्ता से हटाने की साजिश का हिस्सा है।
मीडिया, लॉबिंग और प्रभाव की आशंका
जांच से जुड़े दस्तावेजों और रिपोर्टों में यह संकेत मिले हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े कुछ लोगों और एक क़तरी लॉबिस्ट के बीच संपर्क था। आरोप यह भी हैं कि पत्रकारों तक ऐसे संदेश पहुंचाए गए जिन्हें इस तरह पेश किया गया जैसे वे इसराइल के वरिष्ठ अधिकारियों की राय हो।
इसने इसराइल में मीडिया की स्वतंत्रता और पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि मीडिया को प्रभावित करने की कोशिश हुई है, तो इसका असर लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर पड़ना तय है।
गिरफ्तारी, रिहाई और कानूनी पेच
इस साल मार्च में दो प्रमुख नामों की गिरफ्तारी ने मामले को और सनसनीखेज बना दिया। हालांकि बाद में उन्हें कुछ शर्तों के साथ रिहा कर दिया गया। बचाव पक्ष का कहना है कि जो फंड मिले, वे संचार सेवाओं के लिए थे और उनका क़तर से कोई सीधा संबंध नहीं था।
दूसरी ओर पुलिस का दावा है कि जांच अभी जारी है और सभी पहलुओं को ध्यान में रखा जा रहा है। यह भी जांच का विषय है कि क्या किसी तीसरे व्यक्ति ने पर्दे के पीछे से इस नेटवर्क को संचालित किया।
मिस्र और क़तर की भूमिका पर सवाल
ग़ज़ा में युद्धविराम के प्रयासों में मिस्र और क़तर दोनों मध्यस्थ रहे हैं। लेकिन आरोप यह हैं कि क़तर की भूमिका को जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया ताकि उसे मिस्र से अधिक प्रभावशाली दिखाया जा सके।
क़तर ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि वह मिस्र के साथ मिलकर काम कर रहा है और यह सब उसे बदनाम करने की कोशिश है।
क़तर का पक्ष और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
क़तर की सरकार का कहना है कि उस पर लगाए गए आरोप निराधार हैं और यह कोई नई बात नहीं है कि उसे राजनीतिक उद्देश्यों के लिए निशाना बनाया जा रहा है। क़तर के अधिकारियों का दावा है कि कुछ ताकतें ग़ज़ा युद्ध का अंत नहीं चाहतीं और इसी कारण इस तरह के विवाद खड़े किए जा रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस मामले को गंभीरता से देखा जा रहा है, क्योंकि इससे मध्य पूर्व की कूटनीति और शक्ति संतुलन पर असर पड़ सकता है।
इसराइल की राजनीति के लिए क्या मायने रखता है क़तरगेट
क़तरगेट केवल एक घोटाले का नाम नहीं रह गया है, बल्कि यह इसराइल की राजनीतिक संस्कृति, सत्ता के केंद्रीकरण और विदेशी प्रभाव को लेकर चल रही बहस का केंद्र बन चुका है। आने वाले समय में यह मामला चुनावी राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है।
यदि आरोप साबित होते हैं, तो इसका असर प्रधानमंत्री के भविष्य, सरकार की विश्वसनीयता और देश की विदेश नीति पर पड़ेगा। वहीं यदि आरोप खारिज होते हैं, तब भी यह सवाल बना रहेगा कि इतनी बड़ी आशंका कैसे पैदा हुई।
निष्कर्ष: जांच से ही निकलेगा सच
क़तरगेट ने इसराइल को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां पारदर्शिता और जवाबदेही की परीक्षा हो रही है। सत्ता में बैठे लोगों के लिए यह समय खुद को निर्दोष साबित करने का है, जबकि जनता के लिए यह जानने का कि उनके नाम पर फैसले कैसे और किसके प्रभाव में लिए जाते हैं।
