मध्यप्रदेश के रायसेन जिले की एक शांत, ठंडी और साधारण लगने वाली देर रात अचानक तेज आवाज से दहल उठी। मोहड़ गांव के पास से गुजरने वाले मुख्य मार्ग पर उस रात न अंधेरा अनजान था, न सड़क नई। कई वर्षों से लोग इस सड़क को पार करते आए थे—कभी पैदल, कभी मोटरबाइक से, और कभी बड़े वाहनों की गड़गड़ाहट के साथ। लेकिन उसी रास्ते पर सोमवार-बुधवार की दरमियानी रात को एक ऐसा हादसा हुआ जिसने न सिर्फ चालक की जान लगभग निगल ली, बल्कि गांव के लोगों के दिलों में भी डर और बेचैनी की रेखाएँ खींच दीं।
यह हादसा सिर्फ एक ट्रक के पुलिया से टकराने की कहानी नहीं है; यह इंसानी थकान, सड़क सुरक्षा की अनदेखी और रात के सन्नाटे में चलने वाले रसद ढोने वाले मजदूर-जैसे ड्राइवरों की कठिन जिंदगी का आईना भी है।

झपकी और तेज रफ्तार — मिनटों में बदला सब कुछ
घटना की शुरुआत होती है देवरी थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले मोहड़ गांव के लगभग एक किलोमीटर पहले। रात के 1:30 से 2 बजे के बीच का समय था। सड़क पर सन्नाटा पसरा हुआ था, केवल कभी-कभी गुजरने वाले वाहनों की दूर से आती रौशनी दिखाई दे रही थी। इसी दौरान एक आयशर ट्रक, जो सब्जियों और आवश्यक सामान से भरा हुआ बताया जाता है, उसी मार्ग से गुजर रहा था।
ट्रक का चालक कई घंटों से लगातार ड्राइव कर रहा था। लंबे सफर और लगातार जागते रहने की आदत हर चालक के भीतर होती है, लेकिन शरीर कब धोखा दे दे—यह कोई नहीं जानता। कहते हैं सड़क पर चलने वाले ड्राइवरों के लिए सबसे बड़ा दुश्मन ‘नींद’ है, जो कहीं भी, कभी भी, बिना चेतावनी के अचानक हमला कर सकती है। इस ड्राइवर के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
जैसे ही ट्रक मोहड़ गांव के मोड़ के पास पहुंचा, एक क्षणिक झपकी ने उसका संतुलन बिगाड़ दिया। भारी भार से लदा ट्रक धीरे-धीरे सड़क के किनारे जाते हुए पुलिया की दीवार से जोरदार टक्कर मार गया।
टक्कर की आवाज ने गांव को जगाया — हादसे का मंजर दिल दहला देने वाला
टक्कर इतनी जोरदार थी कि आसपास के खेतों में बने अस्थायी घरों और ढाबे में सो रहे लोगों की नींद टूटी। जब ग्रामीण मौके पर पहुंचे, उन्होंने देखा कि ट्रक का आगे का पूरा हिस्सा पुलिया में धंस चुका था। केबिन बुरी तरह टेढ़ा हो गया था और उसके भीतर चालक फंसा हुआ था।
घटना स्थल पर फैला मंजर बेहद खौफनाक था। ट्रक के अंदर से कराहने की आवाजें आ रही थीं। हवा में डीजल की गंध तैर रही थी। ट्रक का फ्रंट हिस्सा पुलिया के लोहे और कंक्रीट में इस तरह दबा था कि चालक के पैर और कमर बाहर निकालने की कोई गुंजाइश नहीं थी।
दो घंटे का संघर्ष — ड्राइवर का दर्द, ग्रामीणों की कोशिशें और बचाव दल का इंतजार
स्थानीय लोगों ने जैसे-तैसे केबिन का दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन ट्रक की बॉडी इतनी बुरी तरह मुड़ी हुई थी कि किसी भी औजार के बिना यह संभव नहीं था। एक ग्रामीण ने बताया कि ड्राइवर दर्द से चीख रहा था, कह रहा था—
“भैया जल्दी निकालो… सांस नहीं ले पा रहा…”
इस बीच ट्रक का क्लीनर बाहर निकल आया था। उसे सिर्फ हल्की चोटें आई थीं, लेकिन उसके चेहरे पर डर और सदमे के भाव साफ दिख रहे थे। वह कई बार रोते हुए कह रहा था कि यदि कुछ देर और हुई, तो ड्राइवर की जान जा सकती है।
1 घंटे से ज्यादा हो चुके थे। केबिन का एक हिस्सा जुड़ा था और दूसरा ट्रक की बॉडी के अंदर धंसा था। बचाव दल और पुलिस सूचना मिलने पर मौके की ओर बढ़ चुके थे, लेकिन गांव का यह इलाका थोड़ा अंदरूनी होने के कारण उन्हें पहुंचने में समय लग रहा था।
बचाव दल पहुंचा — लोहे काटने वाली मशीन से शुरू हुआ ऑपरेशन
करीब दो घंटे का दर्दनाक इंतजार खत्म हुआ जब पुलिस और बचाव दल घटनास्थल पर पहुंचे। तुरंत लोहे और कंक्रीट काटने वाली हाइड्रोलिक मशीनें निकाली गईं। चारों ओर एंबुलेंस की लाल-ब्लू लाइट चमकने लगी। ग्रामीणों को थोड़ा सुकून मिला कि अब स्थिति नियंत्रण में आ सकती है।
रेस्क्यू टीम ने केबिन को टुकड़ों में काटकर ड्राइवर को निकालने की कोशिश शुरू की। यह काम बेहद मुश्किल था क्योंकि ड्राइवर दर्द में कराह रहा था और उसके पैर बुरी तरह फंसे थे। बचाव दल को बेहद सावधानी बरतनी पड़ रही थी ताकि ड्राइवर को अतिरिक्त चोट न लगे।
लगभग 25 मिनट तक चले कठिन रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद आखिरकार चालक को बाहर निकाला गया। उसे स्ट्रेचर पर लिटाकर तुरंत एंबुलेंस में ले जाया गया। इस दौरान ग्रामीणों ने राहत की सांस ली।
ड्राइवर की हालत गंभीर — अस्पताल में भर्ती
एंबुलेंस चालक ने बताया कि ड्राइवर की हालत गंभीर है। उसके पैर में कई जगह फ्रैक्चर होने की आशंका है और शरीर के कई हिस्सों में गहरी चोटें आई हैं। उसे पहले देवरी के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद उसे रायसेन जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया।
उधर क्लीनर के शरीर पर केवल हल्की खरोंचें थीं, लेकिन मानसिक रूप से वह बेहद डरा हुआ था।
सड़क सुरक्षा पर फिर उठे सवाल — हर रात ऐसे हादसे
इस हादसे ने एक बार फिर यही सवाल उठाया कि क्या रात में भारी वाहनों की आवाजाही पर अतिरिक्त नियम नहीं होने चाहिए?
क्या ट्रक ड्राइवरों को अनिवार्य विश्राम के घंटे नहीं मिलने चाहिए?
क्या सड़कों पर चेतावनी संकेत और ब्रेकिंग लाइनें पर्याप्त नहीं हैं?
गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि यह सड़क हादसों का अड्डा बन चुकी है। पिछले दो वर्षों में कम से कम 12 बड़े हादसे इसी मार्ग पर हुए हैं। ट्रक, बस या कार—लगभग हर वाहन यहां दुर्घटना का शिकार हुआ है।
भविष्य में ऐसा न हो—स्थानीय लोगों की मांग
ग्रामीणों ने प्रशासन से दो मुख्य मांगें रखी हैं —
- पुलिया की सुरक्षा दीवार मजबूत की जाए।
- रात में भारी वाहनों के लिए स्पीड कंट्रोल और चेकिंग बढ़ाई जाए।
यह हादसा सिर्फ एक खबर नहीं — एक चेतावनी है
रायसेन का यह हादसा सिर्फ एक सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि याद दिलाने वाली घटना है कि सड़क सुरक्षा कितनी आवश्यक है। एक झपकी, एक पल की लापरवाही या थकान कई जिंदगियों को प्रभावित कर सकती है।
