भोपाल के काजी कैंप की तंग गलियों में रहने वाली 60 वर्षीय रजिया बी इन दिनों ऐसी मानसिक पीड़ा से गुजर रही हैं, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। जवानी के दिनों से लेकर आज तक उन्होंने इस देश में एक आम नागरिक की तरह जीवन जिया, वोट डाला, दस्तावेज़ बनवाए, सरकारी योजनाओं का लाभ उठाया, और तमाम सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाया। लेकिन अब, अचानक शुरू हुई एसआईआर की प्रक्रिया और मतदाता सूची में अपना नाम न मिलने के कारण उनके भीतर एक गहरी भय और असुरक्षा की भावना घर कर गई है।

बारिश के बाद की ठंडी शाम थी जब रजिया बी ने पहली बार अपने पड़ोसियों से सुना कि कई लोगों को चुनाव आयोग की तरफ से नोटिस मिला है। वह यह सुनकर घबरा गईं कि जिनके दस्तावेज़ अधूरे पाए जाएंगे या जिनका नाम मतदाता सूची से गायब होगा, उन्हें अपनी नागरिकता साबित करनी पड़ेगी। अगले ही दिन वह दस्तावेजों का पुलिंदा लेकर अपने बेटे के साथ मतदान केंद्र की जानकारी लेने पहुंचीं। उनके मन में एक ही बात घूमती रही कि जिनके पास सबूत होंगे उनके लिए यह प्रक्रिया आसान होगी, लेकिन जिनके नाम सूची में नहीं होंगे, उनके लिए बड़ी परेशानी खड़ी हो सकती है।
रजिया बी के हाथों में आज भी वह पुराना वोटर आईडी कार्ड मौजूद है जो उन्हें 1995 में जारी हुआ था। उस समय मतदाता पहचान पत्र का स्वरूप अलग था, कागज की मोटी शीट पर छपा, बिना किसी भारी सुरक्षा फीचर के, लेकिन उस कार्ड को वह आज भी अपनी पहचान का मजबूत आधार मानती हैं। उन्होंने उस कार्ड को कई बार सरकारी कामों में दिखाया है, कभी किसी ने सवाल नहीं उठाया। लेकिन जब उन्हें 2003 की मतदाता सूची में अपना नाम न मिलने की बात पता चली तो उनके पैरों तले जमीन खिसकती हुई महसूस हुई।
घर लौटते समय उनकी आंखों में अजीब डर साफ झलक रहा था। वह बार-बार अपने बेटे से पूछती रहीं कि अगर उनका नाम सूची में नहीं है तो क्या होगा। बेटे ने उन्हें भरोसा दिलाने की कोशिश की, मगर रजिया बी के मन में एक ही डर धड़क रहा था कि कहीं उन्हें किसी और देश से जुड़ा न समझ लिया जाए। यह डर उनके दिल पर इतना भारी पड़ा कि धीरे-धीरे वह तनाव में डूबने लगीं। रातों की नींद गायब हो गई, भूख कम हो गई और चिंता लगातार बढ़ती चली गई।
कुछ ही दिनों में स्थिति इतनी बिगड़ी कि परिजन उन्हें अस्पताल लेकर गए। डॉक्टरों ने बताया कि अधिक तनाव के कारण उनकी तबीयत बिगड़ी है और उन्हें आईसीयू में भर्ती करना पड़ा। अस्पताल के बिस्तर पर लेटी रजिया बी की आंखों में जो डर तैर रहा था, वह इस बात का संकेत था कि उन्हें अपनी भारतीय पहचान पर ही शक होने लगा है। आईसीयू में भर्ती होने के बाद भी वह लगातार एक ही सवाल पूछती रहीं कि अगर उनका नाम सूची में नहीं मिला तो क्या उन्हें कहीं और भेज दिया जाएगा।
परिजन बताते हैं कि वह अक्सर रोते हुए कहती हैं कि अगर उनका नाम मतदाता सूची में नहीं है तो कहीं उन्हें बांग्लादेश भेजने की बात न उठ जाए। यह सुनकर परिवार के सभी लोग विचलित हो जाते हैं। कोई भी यह समझ नहीं पा रहा कि एक साधारण नागरिक, जिसने कभी अपने देश से बाहर कदम तक नहीं रखा, उसके मन में यह भय क्यों इतना गहरा बैठ गया है। शायद इसलिए कि हाल के वर्षों में दस्तावेज़ों और सूचियों को लेकर जो वातावरण बना है, उससे आम जनता में असुरक्षा बढ़ी है, खासकर बुजुर्गों में जिनकी यादों में पुराने दस्तावेज़ ही उनकी पहचान का आधार हैं।
रजिया बी के पति का कई साल पहले निधन हो चुका है। परिवार में उनके दो बेटे और एक बेटी हैं जो मजदूरी और छोटे-मोटे कामों से घर का खर्च चलाते हैं। काजी कैंप इलाके में रहने वाले अधिकतर लोग निम्न आय वर्ग से आते हैं और सरकारी प्रक्रियाओं की जटिलता को लेकर अक्सर परेशान रहते हैं। यहां रहने वाले कई परिवारों को एसआईआर नोटिस का भय सताने लगा है। कुछ लोग अपने पुराने दस्तावेज़ ढूंढ रहे हैं, तो कुछ नए प्रमाण बनवाने की कोशिश कर रहे हैं। इस बीच रजिया बी की हालत ने पूरे मोहल्ले को दुखी कर दिया है।
रजिया बी उन बुजुर्गों में से हैं जिनकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा इसी शहर में गुजरा है। उनकी यादों में पुराने त्योहारों की रौनक, आसपास के लोगों से भाईचारा, और इस देश की मिट्टी से जुड़ाव के अनगिनत किस्से समाए हैं। उनके मुताबिक, 1995 में जब उन्होंने अपना पहला वोटर आईडी कार्ड लिया था, तब उन्हें ऐसा लगा था कि उन्होंने देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आधिकारिक रूप से कदम रख दिया है। वह हर चुनाव में वोट डालने जाती थीं और इस बात पर गर्व महसूस करती थीं कि वह अपने देश की आवाज़ का हिस्सा हैं।
लेकिन आज जब उनके सामने यह सवाल खड़ा है कि उनका नाम 2003 की सूची में क्यों नहीं मिला, तो वह बेहद असहाय महसूस कर रही हैं। अस्पताल में भर्ती होने के बाद भी वह डॉक्टरों से पूछती रहती हैं कि क्या उनके दस्तावेज़ ठीक पाए जाएंगे। बेटे बताते हैं कि मां को दिलासा देना मुश्किल हो गया है क्योंकि वह जो डर मन में पाले हुए हैं, उसे निकालना आसान नहीं। एक बार विश्वास टूट जाए तो उसे दोबारा जोड़ना बहुत कठिन होता है, खासकर तब जब उम्र ढल चुकी हो।
इस बीच मोहल्ले के लोग उनके घर पहुंचते रहते हैं। महिलाएं उनके परिवार की मदद कर रही हैं, बच्चे दवाइयां लाने में हाथ बंटा रहे हैं और कुछ लोग दस्तावेजों की जांच में सहायता कर रहे हैं। हर कोई यही चाहता है कि रजिया बी जल्द ठीक हों और उनके मन से यह भय निकले कि कोई उन्हें कहीं भेजने वाला नहीं है। अस्पताल के डॉक्टरों ने भी परिवार से कहा है कि उनके तनाव को कम करने के लिए उनसे सकारात्मक बातें करें।
रजिया बी की कहानी आज उन हजारों लोगों की आवाज़ बन गई है जो दस्तावेज़ों और पहचान से जुड़े नियमों में बदलाव के बीच खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। यह कहानी सिर्फ एक महिला के डर की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की है जिसे बदलने की जरूरत है। क्योंकि लोकतंत्र की असली शक्ति उसके नागरिक होते हैं और नागरिकों को अपने ही देश में डर के साए में जीना पड़े, यह किसी भी समाज के लिए सही संकेत नहीं।
अब परिवार यह उम्मीद कर रहा है कि अधिकारियों द्वारा दस्तावेजों की सही जांच के बाद रजिया बी का नाम सूची में सुरक्षित रूप से पाया जाएगा। उम्मीद है कि इस प्रक्रिया के पूरा होते ही उनके मन का भय दूर होगा और वह अपने सामान्य जीवन में लौट सकेंगी।
रजिया बी की यह स्थिति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि पहचान से जुड़ी सरकारी प्रक्रियाओं को लेकर जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है, खासकर बुजुर्गों और कम शिक्षित वर्ग के बीच। दस्तावेज़ों की सुरक्षा और आसान सत्यापन की व्यवस्था नागरिकों के जीवन में तनाव कम कर सकती है। समाज के हर व्यक्ति को यह भरोसा दिया जाना चाहिए कि कोई भी प्रक्रिया उसे उसकी जड़ों से अलग करने के लिए नहीं, बल्कि उसकी पहचान मजबूत करने के लिए होती है।
