मध्य प्रदेश की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे हैं, जिनकी एक छोटी-सी घोषणा भी पूरे राजनीतिक परिदृश्य को हिला देती है। पूर्व मुख्यमंत्री और लंबे समय से कांग्रेस के रणनीतिक स्तंभ माने जाने वाले दिग्विजय सिंह का नाम इसी श्रेणी में आता है। जब उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि वह तीसरी बार राज्यसभा नहीं जाएंगे, तो यह केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं रहा। यह बयान कांग्रेस संगठन, प्रदेश की सत्ता राजनीति और दिल्ली के सत्ता गलियारों तक गूंजने लगा।

दिग्विजय सिंह का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब तीन महीने बाद मध्य प्रदेश से राज्यसभा की एक सीट खाली होने जा रही है और संख्या बल के हिसाब से कांग्रेस के पास इस सीट को बचाने की पूरी संभावना है। लेकिन अब बड़ा सवाल यह नहीं है कि सीट किसके पास जाएगी, बल्कि यह है कि दिग्विजय सिंह के बाद कांग्रेस इस सीट के लिए किस चेहरे को आगे बढ़ाएगी। इसी सवाल ने प्रदेश कांग्रेस के भीतर नई हलचल और संभावित दावेदारों की चर्चा को जन्म दिया है।
दिग्विजय सिंह का फैसला और उसके मायने
दिग्विजय सिंह का राज्यसभा कार्यकाल अप्रैल 2026 में समाप्त हो रहा है। आमतौर पर यह माना जा रहा था कि पार्टी उन्हें तीसरी बार उच्च सदन भेज सकती है, क्योंकि वे राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस के सबसे अनुभवी और मुखर नेताओं में गिने जाते हैं। लेकिन उन्होंने स्वयं इस संभावना पर विराम लगा दिया।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह फैसला अचानक लिया गया निर्णय नहीं है। इसके पीछे एक लंबी राजनीतिक सोच और भविष्य की रणनीति छिपी है। दिग्विजय सिंह ने यह संकेत दिया है कि वह अब दिल्ली की बजाय मध्य प्रदेश की राजनीति और संगठन पर अधिक ध्यान देना चाहते हैं। 2028 में प्रस्तावित विधानसभा चुनावों को देखते हुए वे जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय भूमिका निभाने की योजना बना रहे हैं।
उनका यह संदेश साफ है कि सत्ता या पद से ज्यादा उनके लिए संगठन और प्रदेश की राजनीति प्राथमिकता है। यह फैसला कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए भी एक संकेत माना जा रहा है कि पार्टी को आने वाले वर्षों में नई पीढ़ी के नेतृत्व के लिए तैयार रहना होगा।
खाली होती राज्यसभा सीट और कांग्रेस की गणित
मध्य प्रदेश में राज्यसभा की कुल 11 सीटें हैं। इनमें से फिलहाल 8 सीटों पर भाजपा का कब्जा है और 3 सीटें कांग्रेस के पास हैं। इस वर्ष राज्यसभा की तीन सीटें खाली होने जा रही हैं। इनमें से एक सीट कांग्रेस के खाते से जुड़ी है, जिस पर दिग्विजय सिंह का कार्यकाल 9 अप्रैल 2026 को समाप्त हो रहा है।
संख्या बल के आधार पर कांग्रेस के पास इस सीट को बरकरार रखने की स्थिति है। यही वजह है कि दिग्विजय सिंह के पीछे हटते ही इस एक सीट के लिए कांग्रेस के भीतर संभावित दावेदारों के नामों की चर्चा तेज हो गई है। यह सीट अब केवल संसद पहुंचने का माध्यम नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन और भविष्य की राजनीति तय करने का अवसर बन गई है।
क्या कमलनाथ लौटेंगे दिल्ली की राजनीति में
दिग्विजय सिंह के फैसले के बाद जिस नाम की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह है मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ। कमलनाथ कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक हैं और केंद्र की राजनीति में उनका लंबा अनुभव रहा है। वे पहले भी कई बार दिल्ली की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा लंबे समय से चलती रही है कि कमलनाथ एक बार फिर केंद्र की राजनीति में लौटने की इच्छा रखते हैं। यदि वे राज्यसभा सीट के लिए दावेदारी करते हैं, तो उनका कद और अनुभव अन्य सभी संभावित दावेदारों पर भारी पड़ सकता है। उनके समर्थकों का मानना है कि राज्यसभा के जरिए कमलनाथ पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती दे सकते हैं।
हालांकि, यह भी सच है कि कमलनाथ मध्य प्रदेश की राजनीति में भी एक प्रभावशाली चेहरा बने हुए हैं। ऐसे में उनका फैसला पार्टी की रणनीति और शीर्ष नेतृत्व की सहमति पर निर्भर करेगा।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी की बढ़ती भूमिका
राज्यसभा की इस दौड़ में एक और नाम जो मजबूती से उभरकर सामने आ रहा है, वह है प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी। जीतू पटवारी ने बतौर विधायक विधानसभा में सक्रिय और आक्रामक भूमिका निभाई है। प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने संगठन को मजबूत करने और सरकार के खिलाफ मुद्दों को उठाने में भी आक्रामक तेवर दिखाए हैं।
पार्टी के भीतर एक वर्ग का मानना है कि यदि कांग्रेस भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखते हुए किसी अपेक्षाकृत युवा और सक्रिय चेहरे को राज्यसभा भेजना चाहती है, तो जीतू पटवारी एक मजबूत विकल्प हो सकते हैं। उनका चयन यह संकेत देगा कि पार्टी संगठनात्मक नेतृत्व को संसद में भी प्रतिनिधित्व देना चाहती है।
अरुण यादव और अजय सिंह की संभावनाएं
पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव का नाम भी इस रेस में चर्चा में है। अरुण यादव का संगठनात्मक अनुभव और राष्ट्रीय राजनीति में उनका कार्यकाल उन्हें इस पद के लिए एक स्वाभाविक दावेदार बनाता है। वे पहले भी पार्टी में कई अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं।
इसके अलावा पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह का नाम भी संभावित उम्मीदवारों में लिया जा रहा है। अजय सिंह लंबे समय से किसी बड़ी राजनीतिक जिम्मेदारी की प्रतीक्षा में हैं। यदि पार्टी संतुलन बनाने की रणनीति अपनाती है, तो उनका नाम भी अंतिम सूची में शामिल हो सकता है।
दिग्विजय सिंह के फैसले के पीछे की रणनीति
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दिग्विजय सिंह का राज्यसभा न जाने का फैसला केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। वे यह मानते हैं कि कांग्रेस को मध्य प्रदेश में संगठनात्मक मजबूती की जरूरत है और इसके लिए अनुभवी नेताओं की जमीन पर मौजूदगी जरूरी है।
दिग्विजय सिंह का यह कदम यह संदेश देता है कि वे अब पूरी तरह से मध्य प्रदेश के कार्यकर्ताओं और जनता के बीच रहकर काम करना चाहते हैं। इससे पार्टी के भीतर यह धारणा भी मजबूत होती है कि वरिष्ठ नेता पद छोड़कर संगठन को प्राथमिकता दे रहे हैं।
भाजपा की नजर और व्यापक सियासी संदर्भ
हालांकि इस पूरी चर्चा का केंद्र कांग्रेस की एक सीट है, लेकिन भाजपा भी इस घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए है। मध्य प्रदेश में भाजपा के भी दो राज्यसभा सांसदों का कार्यकाल इसी वर्ष समाप्त हो रहा है, जिनमें सुमेर सिंह सोलंकी और जॉर्ज कुरियन शामिल हैं।
भाजपा की रणनीति यह सुनिश्चित करने की होगी कि राज्यसभा में उसका संख्याबल किसी भी तरह कमजोर न हो। कांग्रेस के भीतर चल रही दावेदारी की खींचतान भाजपा के लिए राजनीतिक अवसर भी बन सकती है।
दिल्ली दरबार और संभावित लॉबिंग
दिग्विजय सिंह के पीछे हटने के बाद यह लगभग तय माना जा रहा है कि राज्यसभा की इस एक सीट के लिए कांग्रेस के भीतर दिल्ली स्तर पर लॉबिंग तेज होगी। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सामने कई नाम होंगे और हर दावेदार अपनी राजनीतिक उपयोगिता और भविष्य की भूमिका को रेखांकित करने की कोशिश करेगा।
यह प्रक्रिया केवल एक नाम तय करने तक सीमित नहीं होगी, बल्कि यह कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन, गुटबाजी और आगामी चुनावी रणनीति को भी प्रभावित करेगी।
